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शिवप्रसाद जोशी : एक जिद्दी मगर शालीन वामपंथी

Amarendra Kishore : जैसे कुछ बातें दिल पर अपना असर छोड़ जातीं हैं वैसे ही कुछ चेहरे दिमाग पर अपना असर छोड़ जाते हैं । शिव उनमें से एक है। पूरा नाम शिवप्रसाद जोशी । हमारे बैच का सबसे गंभीर दिखने वाला एक मात्र शख्स (आज भी है), जिसका मानस विशुद्ध रूप से उत्तराखंड की संस्कृति से सरोबार था और आज भी है । क्यों की हम तमाम संगी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत लिए जनसंचार संस्थान में पढने और कुछ बनने के मंसूबों के साथ आये।

Amarendra Kishore : जैसे कुछ बातें दिल पर अपना असर छोड़ जातीं हैं वैसे ही कुछ चेहरे दिमाग पर अपना असर छोड़ जाते हैं । शिव उनमें से एक है। पूरा नाम शिवप्रसाद जोशी । हमारे बैच का सबसे गंभीर दिखने वाला एक मात्र शख्स (आज भी है), जिसका मानस विशुद्ध रूप से उत्तराखंड की संस्कृति से सरोबार था और आज भी है । क्यों की हम तमाम संगी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत लिए जनसंचार संस्थान में पढने और कुछ बनने के मंसूबों के साथ आये।

अपने बनने-बिगड़ने की ज़द्दोजहद में आज जो कुछ भी बने, मगर ऐसा महसूस होता है कि जब अपने शहर से चला था तो कुछ और था और आज कुछ और हैं। मगर शिव जैसा पहले था वैसा आज भी है। जब १५ साल बाद मैं उससे मिला (देहरादून में ) तो वही अंदाज, वही अदा, बात बात पर "मसलन", "दरअसल", "लिहाजा", "किन्तु", "परन्तु", "बहरहाल" आदि आदि। अच्छा लगा की शिव बदला नहीं– न अपनी आदतों से और न ही अपनी 'फितरतों' (सहपाठी होने के नाते ऐसा लिखने का मेरा अधिकार है) से। 'फितरतों' का मतलब सीधे तौर से लिखने का और कुछ बेहतर करने का ।

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के बहुत दूरदराज के गाँव जाख के मूल वाशिंदे शिव ने अपने काररिएर की शुरुआत (शायद) बिज़नस इंडिया टीवी से की थी और जी०टी०वी० के आउटपुट हेड, सहारा समय के उत्तरप्रदेश उत्तराखंड चैनल में बतौर ब्यूरो प्रमुख भी उसने काम किया । जर्मनी में रेडियो डायचे वेले के बॉन दफ़्तर में हिंदी सेवा में संपादक बने रहने का गौरव उसे है । डॉयचे वेले के अलावा (2006 से मार्च 2008 तक फिर 2009 में दोबारा शामिल) बी०बी०सी० वर्ल्ड सर्विस के लिए उत्तराखंड से ढाई वर्ष तक बतौर प्रतिनिधि संवाददाता रहे शिव प्रसाद जोशी अधिकतर समय टीवी और रेडियो माध्यमों में, समाज, राजनीति और संस्कृति के राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नियमित लेखन करता रहा है । इतना सब प्रयाप्त है एक सफल पत्रकार कहलाने केलिए।

संस्थान में रहते हुए जोशी की पहचान एक वामपंथी छौना के रूप में हो चुकी थी। हालाँकि उसके इस रूप से बहुतों को ऐतराज रहा होगा मगर मुझे बढ़िया लगता था उसका यह रूप और उसका निरंतर बढ़ता रुतबा। क्यों की जोशी की यह खासियत रही है कि जैसा वह है वैसा दिखता नहीं और जैसा वह चाहता है वैसा कहता नहीं। उसकी नजर और उसका निशाना सब सधा और सटीक रहा है और इसी वजह से उसने जो भी चाहा वह पाया। संस्थान के संगी मानें या न मानें।

उसके इस वामपंथी चेहरे को लेकर अक्सर अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो जाती थी। एक मजेदार घटना का जिक्र करना चाहूँगा। हिन्दी दिवस के दिन कक्षा में ही कविता पाठ का आयोजन था। रविश कुमार, विकास मिश्र, शालिनी जोशी और संगीता तिवारी के बाद जब जोशी की बारी आयी तो उसने वामपंथी कवि वीरेन डंगवाल की कुछेक कवितायें पढने की घोषणा की। वैसे तो पहले ही तय था कि संगी अपनी कवितायें ही सुनायेंगे। हम सब वाकिफ थे कि उम्र के हिसाब से जोशी एक बढ़िया कवि है और उसमें असीम संभावनाएं हैं। उसकी इस घोषणा के बाद एक और संगी नलिन चौहान ने भी लगे हाथ ऐलान किया कि वह हनुमान चालीसा पढेगा। खैर जैसे तैसे नलिन को समझाया गया और वह मान भी गया।

वैसे तो मुझसे उसकी बात न के बराबर होती थी, क्योंकि बिहार में हो रही नकसली हिंसा जैसे कई मामलों में हमारे बीच गहरा मतभेद था और इसी वजह से हमारे बीच एक सम्मानित दूरत्व था। जिसका निर्वाह हमने बेहतर तरीके से किया। जोशी की खासियत यही रही है कि वह शालीन है और अपनी जिद्द को भी वह शालीन अंदाज में प्रकट करना जानता है। पता नहीं उसने भारतीय साहित्य को कितना पढ़ा है मगर पाश्चात्य साहित्य और खासकर वामपंथी साहित्य को उसने अपने अन्दर जज्ब किया है और उन्ही के अनुरूप खुद को ढाला है। इनके वावजूद उसे अपनी माटी और वतन से प्यार है, तभी तो दिल्ली की तमाम संभावनाओं को छोड़कर उसने पहाड़ों में बसना बेहतर समझा।

देहरादून की वादियों में रहते हुए शिव प्रसाद जोशी ने "वन राइट्स टू कर्नल" (मार्केज़ की लंबी कहानी) का अंग्रेज़ी से अनुवाद किया और साथ में ओरहान पामुक के "स्नो" उपन्यास के एक अंश का अनुवाद कार्य को उसने पूरा किया है। 'आमने सामने', 'परंपरा की पुनर्खोज को पुरस्कार: पामुक, भूगोल के तहखाने में-टिहरी की याद, पानी की हवा: मार्केज़ के मकांदो में मुंबई, इज़ाबेल का अंग्रेज़ी से अनुवाद, 'आइन्श्टाइन से हॉकिंग तक हमारा समय', 'ब्रह्मांड और कविता में नया क्या', 'हम जहां पहुंचे क़ामयाब आए: बॉन के नोट्स', 'निर्जन द्वीप में संगीत', स्टीफ़न हॉकिंग के एक लंबे साक्षात्कार का अनुवाद कर शिव ने सच कहिये तो अपनी ज़िंदगी वह मुकाम हासिल किया है , जिसपर हम संगियों को गर्व होता है। हाल में शिवप्रसाद जोशी और उसकी धर्मपत्नी शालिनी जोशी की एक किताब आई है 'वेब पत्रकारिताः नया मीडिया नये रुझान'। शिव प्रसाद जोशी न्यूज़ एक्सप्रेस न्यूज़ उत्तराखंड हेड रह चके हैं।इधर उन्होंने हिलवाणी के नाम से एक वैबसाइट शुरू की है। शिव बढ़िया लिखते रहे, यही मेरी कामना है और उम्मीद है कि आने वाले सालों में साहित्य अकादमी के पुरस्कृत कवियों में उनका भी नाम होगा। उनकी राह उसी मंजिल की ओर है।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.


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