30 अक्टूबर 2013 को राजधानी दिल्ली में राजनीति की बारिश में, बरसाती मेंढकों …..(माफ़ कीजिएगा)…. तीसरे मोर्चे की टर्र-टर्र सुनायी दी. टर्र-टर्र…ये आवाज़ इसलिए जानी पहचानी लगती है, क्योंकि ये मौसमी है. मौसम के हिसाब से टर-टराती है. इस आवाज़ की यही पहचान है. लेफ्ट पार्टियों की पहल पर जमा ये मौसमी … गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई कुनबा…."धर्म-निरपेक्ष मोर्चा". बिलकुल नया, तारो-ताज़ा नाम.
जी हाँ! यही नया नाम है, इस तथा-कथित तीसरे मोर्चे का, इस बार के चुनावी मौसम में. मज़े की बात ये कि मुजफ्फर-नगर दंगों के ज़रिये "शोहरत" बटोर चुके ध्रुवीकरण के पैरोकार…..मुल्ला-मुलायम सिंह इस के केंद्र में रहे. मोदी-विरोधी कैम्प के अगुवा, नीतीश कुमार भी जोश दिखाते नज़र आये. ए.आई.ए.डी.एम.के., बीजू जनता दल, जनता दल(सेक्युलर) सहित 17 क्षेत्रीय पार्टियों के आका या उनके प्रतिनिधि इस "चुनावी तमाशे" में जमा हुए. ऐसा तमाशा, जो हिन्दुस्तान की पब्लिक 1989 से पता नहीं, कितनी बार देख चुकी है.
इस तमाशे की ख़ास बात…..बन्दर बनने को कोई तैयार नहीं, सब-के-सब मदारी बनने की जुगत में ! चुनाव के पहले संयुक्त परिवार और चुनाव के बाद विभाजित परिवार, यही है इस मोर्चे का महा-गोपनीय और महा-सार्वजनिक एजेंडा. इतना हिडेन और इतना खुल्ला कि कोख में पल रहे राजनीतिक शिशु को भी समझ में आ जाए और इन्हें वोट देने वालों को समझ में ना आये.
इस मोर्चे को लगता है कि डेमोक्रेट और रिपब्लिकन की छाया बनती कांग्रेस और भाजपा अपरिहार्य नहीं है. पेट से ज़्यादा, कौम ज़रूरी है. मुर्दों की कीमत, जीते-जागते इंसान से कुछ ही कम है. बिजली-पानी-सड़क की बात बे-ईमानी है. अवसरवाद, इबादत का दूसरा नाम है. हिन्दू-मुसलमान का भेद, इन नेताओं की राजनीतिक उम्र में इज़ाफा करेगा. भूख-भय-भ्रष्टाचार के खात्मे की बात नहीं बल्कि कौम का उन्माद इन्हें राजनीति में ज़िंदा रखेगा. इस मोर्चे को लगता है कि हिन्दुस्तान की पब्लिक बेवकूफ है. कौम और कत्लेआम, इस मुल्क में, इनके वजूद को मरने नहीं देगा.
अल्लाह-ईश्वर तेरो नाम- सबको सन्मति दे भगवान् !
शुद्ध अवसरवाद की चाशनी में लिपटा….अशुद्ध धर्मनिरपेक्षतावाद ! ख़ुदा खैर करे !
अजित कुमार
+91-9594471363