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संकटमोचन से तुलसीदास की पाण्‍डुलिपि चोरी, मंहत ने साधी चुप्‍पी, उठ रहे सवाल

: चोरी का पता लगाने में पुलिस असफल : विश्व प्रसिद्ध तुलसी घाट स्थित संकटमोचन के मंहत प्रो0 वीरभद्र मिश्र के आवास परिसर में स्थित हनुमान जी के मंदिर से गोस्वामी तुलसी द्वारा रचित रामचरित मानस की पांडुलिपि रहस्यमय ढंग से गत 22 दिसम्बर को दोपहर 12 से 3, जब मंदिर बंद होता है, के बीच चोरी चली गयी। इस घटना से न सिर्फ बनारस बल्कि पूर्वांचल के अन्य जिलों में भी कोहराम मच गया। लोग पांडुलिपि के बरामदगी के लिए बेचैन हो गये, किन्तु घटना के लगभग एक पखवारा बीतने को है लेकिन अभी तक न तो बरामदगी हुयी और न चोरो का अता-पता चला।

: चोरी का पता लगाने में पुलिस असफल : विश्व प्रसिद्ध तुलसी घाट स्थित संकटमोचन के मंहत प्रो0 वीरभद्र मिश्र के आवास परिसर में स्थित हनुमान जी के मंदिर से गोस्वामी तुलसी द्वारा रचित रामचरित मानस की पांडुलिपि रहस्यमय ढंग से गत 22 दिसम्बर को दोपहर 12 से 3, जब मंदिर बंद होता है, के बीच चोरी चली गयी। इस घटना से न सिर्फ बनारस बल्कि पूर्वांचल के अन्य जिलों में भी कोहराम मच गया। लोग पांडुलिपि के बरामदगी के लिए बेचैन हो गये, किन्तु घटना के लगभग एक पखवारा बीतने को है लेकिन अभी तक न तो बरामदगी हुयी और न चोरो का अता-पता चला।

सूचना मिलने पर स्थानीय पुलिस, एलआईयू, आईबी, एसओजी समेत आईजी, डीआईजी, ने भी मौके का मुआयना किया। जासूसी कुतिया भी आई और महंत वीरभद्र मिश्र के आवास का चक्कर काटकर खड़ी हो गयी। चोरी का पर्दाफाश करने के लिए पुलिस ने मंदिर के दो पुजारियों समेत आधा दर्जन लोगों को हिरासत में लिया है और इनको झूठ पकड़ने की मशीन (लाई डिटेक्‍टर) से सामना कराने के लिए दो दिन पूर्व हैदराबाद के लिए रवाना भी हो गयी है। दूसरी ओर इस घटना के बाबत प्रो0 वीरभद्र मिश्र लगातार मौनधारण किये हुए है, जबकि उनके ज्येष्ठ पुत्र छोटे महंत प्रो0 विश्वम्भर नाथ मिश्र ने चोरी के तत्काल बाद कहा था कि यह घटना अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है और इसमें साजिश की बू-आती है, यह भी बताया था कि संवत् 1680 में गोस्वामी तुलसी दास के गोलोकवासी होने के 24 वर्षों बाद गोस्वामी जी के किसी शिष्य ने यह पाण्डुलिपि तुलसी मंदिर को सौंपी थी, तब से इसकी देख-रेख महंत परिवार के ही जिम्मे है।

पाण्डुलिपि के साथ ही तुलसी दास की नाव की लकड़ी का कुछ अंश तथा उनकी खड़ाऊ आज भी चोरी गयी पाण्डुलिपि के समीप सुरक्षित है। चोर पाण्डुलिपि के साथ हनुमान जी का मुकुट, गदा और लड्डूगोपाल की मूर्ति भी ले गये किन्तु बाकी चीजें सुरक्षित है। अबतक की तफ्तीश के बाद पुलिस के आला अधिकारियों का कहना है कि यह चोरी मंदिर के दरवाजे का ताला चाभी से खोलकर की गयी है, जबकि इसे चोरी का रुप देने के लिए कुंडी को पेचकस से खोलना दिखाकर चोरी का रुप दिया गया है। पुलिस अधिकारियों का स्पष्ट मत है कि इस चोरी में महंत परिवार से जुड़े लोग अवश्य शामिल है। प्रो0 वीरभद्र मिश्र का मौन धारण भी इस संदेह को पुष्ट करता है। बनारस के कुछ संगठन, बुद्धजीवी और धार्मिक संगठनों ने इस चोरी को लेकर भीषण आक्रोश है, आक्रोश महंत परिवार को भी लेकर है। महंत जी की चुप्पी लोगों को लगातार उद्वेलित कर रही है। वाराणसी समेत पूर्वांचल का जनमानस इस धार्मिक और ऐतिहासिक रहस्यपूर्ण चोरी का पर्दाफाश कराने को बेताब है।

ऊधर, महंत वीरभद्र मिश्र के परिवार से जुड़े और उनके प्रवक्ता बने सांध्य हिन्दी दैनिक सन्मार्ग के सम्पादक वरिष्ठ पत्रकार बाबू आनन्द बहादुर सिंह ने एक पखवारे के बीच इस मामले में दो किस्म के बयान मीडिया वाले को दिया। पहला बयान जो चोरी के तीसरे दिन आया उसमें बाबू आनन्द बहादुर सिंह ने कहा था कि चोरी शुभ मुहुर्त में हुयी है इसलिए बरामदगी जरुर होगी। उनके इस बयान के दो दिन बाद उनकी देख-रेख में रहने वाला आनन्द बाग स्थित स्वामी भाष्करानन्द की समाधि स्थल के गुम्बदों से आठ पीतल के कलश भी चोरी चले गये। बाबू साहब ने इस चोरी पर कोई हो हल्ला नहीं मचाया। अब पाण्डुलिपि चोरी होने के दस दिन बीत जाने के बाद आनन्द बहादुर सिंह ने अखबार वालों को नई जानकारी दी कहा कि गोस्वामी जी की पाण्डुलिपि पूरी तरह से सुरक्षित है, इसका कुछ अंश पूर्व काशी नरेश के किले में रखा गया है, जबकि कुछ अंश भारत कला भवन में है। उनका यह भी कहना है कि तुलसी मंदिर में रखी गयी पाण्डुलिपि गोस्वामी जी के मरने के 200 वर्षों बाद यहां रखी गयी। अब सवाल उठता है कि यह बात आनन्द बहादुर सिंह ने चोरी के तत्काल बाद क्यों नहीं बतायी। क्या तुलसी मंदिर से चोरी गयी पाण्डुलिपि फर्जी थी? अगर फर्जी थी तो इतने दिनों तक महंत परिवार ने उसे तुलसी दास की पाण्डुलिपि बताकर धार्मिक जनता को गुमराह क्यों किया? अभी लगभग एक माह पूर्व कुछ विदेशी लोगों ने इस मंदिर का और तुलसी दास की रखी सामग्रियों का फिल्मांकन भी किया था।

बताने वालों ने यह भी बताया कि उस वक्त महंत वीरभद्र मिश्र अपने आवास परिसर में मौजूद थे और फिल्मांकन के लिए उनकी अनुमति थी। जबकि आमलोगों के लिए मंदिर का फोटो लेना भी वर्जित रहा है। यह भी काबिले गौर है कि आनन्द बहादुर सिंह ने तुलसी दास की पाण्डुलिपि को विभिन्न स्थानों पर सुरक्षित तो जरुर बताया किन्तु तुलसी मंदिर के हनुमान मंदिर में रखी गयी पाण्डुलिपि, जो आनन्द बहादुर सिंह के कथना अनुसार गोस्वामी जी के देहावसान के दो सौ वर्षों बाद और छोटे महंत प्रो0 विश्वम्भर नाथ मिश्र के कथना अनुसार चौबीस वर्षों बाद रखी गयी, वह पाण्डुलिपि असली थी कि फर्जी थी इस विषय पर न तो आनन्द बहादुर सिंह ने प्रकाश डाला और न प्रो0 वीरभद्र मिश्र ने। वीरभद्र मिश्र तो सम्भवतः इतने मर्माहत हैं कि इस विषय में किसी से कुछ कहना-सुनना भी पसंद नहीं कर रहे हैं। अगर यह मंदिर असुरक्षित रहा है तो इसकी जिम्मेदारी भी महंत परिवार की ही है। यही असुरक्षा अब संकटमोचन मंदिर भी देखने को मिल जाती है, जहां प्रायः महिलाओं की चेन स्नेचिंग और पुरुषों की पाकेटमारी धड़ल्ले से हो रही है। मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था महंत जी के निजी सेवकों पर ही है। बहरहाल धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की इस चोरी का पर्दाफाश होना जरुरी है। इसमें महंत परिवार को चुप्पी त्यागकर सहयोग की आवश्यकता प्रशासन भी महसूस कर रहा है।

लेखक अजय कृष्‍ण त्रिपाठी बनारस में पत्रकार हैं तथा इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं.

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