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संघ परिवार का ‘महामंथन’ : मोदी का रास्ता साफ, लेकिन तुनके रहे आडवाणी!

भाजपा और संघ नेतृत्व के बीच दो दिन तक समन्वय मंथन चलता रहा। इस महामंथन की कवायद के बाद गुजरात के बहुचर्चित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का रास्ता साफ हो गया है। यह तय कर लिया गया है कि 20 सितंबर के पहले भाजपा का संसदीय बोर्ड ‘पीएम इन वेटिंग’ के तौर पर मोदी के नाम पर मुहर लगा देगा। यह अलग बात है कि तमाम मनुहार के बावजूद बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी, मोदी के मुद्दे पर तुनके ही रहे। यद्यपि, उन्होंने मंत्रणा बैठकों में हिस्सेदारी की। लेकिन, वे तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी के मुद्दे पर ‘आम राय’ से सहमत नहीं हुए। उन्होंने यही तर्क रखा कि चार विधानसभा चुनावों के बाद मोदी का फैसला किया जाए, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन, उन्हें जल्दबाजी में यह फैसला करना ठीक नहीं लग रहा। आडवाणी को इस बात का भी रंज रहा कि पार्टी के कुछ जिम्मेदार नेता अंदर ही अंदर उनके खिलाफ विरोध का माहौल तैयार करा रहे हैं। यह तौर तरीका ठीक नहीं है।

भाजपा और संघ नेतृत्व के बीच दो दिन तक समन्वय मंथन चलता रहा। इस महामंथन की कवायद के बाद गुजरात के बहुचर्चित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का रास्ता साफ हो गया है। यह तय कर लिया गया है कि 20 सितंबर के पहले भाजपा का संसदीय बोर्ड ‘पीएम इन वेटिंग’ के तौर पर मोदी के नाम पर मुहर लगा देगा। यह अलग बात है कि तमाम मनुहार के बावजूद बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी, मोदी के मुद्दे पर तुनके ही रहे। यद्यपि, उन्होंने मंत्रणा बैठकों में हिस्सेदारी की। लेकिन, वे तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी के मुद्दे पर ‘आम राय’ से सहमत नहीं हुए। उन्होंने यही तर्क रखा कि चार विधानसभा चुनावों के बाद मोदी का फैसला किया जाए, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन, उन्हें जल्दबाजी में यह फैसला करना ठीक नहीं लग रहा। आडवाणी को इस बात का भी रंज रहा कि पार्टी के कुछ जिम्मेदार नेता अंदर ही अंदर उनके खिलाफ विरोध का माहौल तैयार करा रहे हैं। यह तौर तरीका ठीक नहीं है।

पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी की गिनती पार्टी के दिग्गज नेताओं में होती है। ऐसे में, संघ और भाजपा नेताओं की पूरी कोशिश रही कि मोदी के मुद्दे पर आडवाणी राजी हो जाएं। इसके लिए तमाम कवायद की गई। बैठक में संघ के एक बड़े नेता ने आडवाणी के योगदान का जमकर गुणगान किया। इसका समर्थन सभी लोगों ने किया। कोशिश यही रही कि इस ‘गुणगान’ से ‘लौह पुरुष’ का दिल कुछ पिघल जाए। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। सूत्रों के अनुसार, वे बैठक में जरूर उपस्थित रहे, लेकिन ज्यादातर मुद्दों पर उन्होंने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा। इस तरह से वे लगातार यही संकेत देते रहे कि मोदी के मुद्दे पर जो तैयारी चल रही है, उससे वे सहमत नहीं हो पा रहे हैं।

दरअसल, अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से खास तौर पर चार राज्यों के चुनाव काफी महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के चुनाव में सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के ऐन पहले होने जा रहे ये चुनाव ‘सेमीफाइनल’ जैसे होंगे। ऐसे में, इन चुनाव परिणामों का खास असर लोकसभा के चुनाव पर पड़ना लाजमी माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मीडिया में इस आशय की खबरें आई थीं कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बात के लिए ‘लॉबिंग’ कर रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले मोदी के नाम का ऐलान न हो। क्योंकि, मोदी का नाम ऐलान होने से राज्य की 30 अल्पसंख्यक बाहुल्य सीटों पर पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है। इसके चलते चुनावी रणनीति को भारी झटका लगने का जोखिम है। मुख्यमंत्री चौहान ने कई दिनों पहले दिल्ली से लेकर नागपुर तक ‘लॉबिंग’ की थी। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी कहा था कि मोदी के नाम का ऐलान मध्य प्रदेश के चुनाव परिणाम आने का बाद ही किया जाए, तो अच्छा रहेगा।

यह अलग बात है कि जब इस आशय की खबरें मीडिया में प्रसारित हुईं कि चौहान, मोदी के रास्ते का रोड़ा बनने जा रहे हैं, तो चौहान ने साफ-सफाई वाला बयान भी जारी किया था। इसमें उन्होंने कह दिया था कि वे पीएम उम्मीदवारी के लिए मोदी के नाम का विरोध नहीं कर रहे हैं। इस तरह की बातों में कोई दम नहीं है। लेकिन, भाजपा सूत्रों का दावा है कि चौहान ने जमकर ‘लॉबिंग’ की थी। आडवाणी और सुषमा स्वराज ने संघ और भाजपा की समन्वय बैठक में बाकायदा चौहान की आपत्तियों का उल्लेख किया है। इसी आधार पर यह कहा गया कि यदि मोदी के नाम का ऐलान होने के बाद विधानसभा चुनाव में रणनीतिक तौर पर नुकसान हो गया, तो इसके लिए क्या किया जाएगा? सूत्रों के अनुसार, इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर किसी ने नहीं दिया। लेकिन, डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने अपनी चर्चा में कई बातें साफ-साफ कह डालीं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जब पूरा संघ परिवार मोदी के मुद्दे पर सहमत है, तो किसी को अंदेशे के टोटकों पर अटकने की   जरूरत नहीं है। राजनीति में हमेशा जोखिम की गुंजाइश रहती है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि अंदेशे से इतना डरा जाए कि उचित फैसला ही न किया जाए। यह बात उनके गले नहीं उतर रही।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने चर्चा के दौरान चाणक्य नीति का भी जिक्र करके कहा कि जनभावनाएं जिस नेता के पक्ष में उभरी हैं, उसको लेकर ‘किंतु-परंतु’ में ज्यादा उलझने की जरूरत कहां है? सूत्रों के अनुसार, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के कुछ कटाक्षों को लेकर आडवाणी खेमा काफी नाराज भी हुआ। बताया जा रहा है कि मोदी के पक्ष में जेटली ने एक तेज-तर्रार वकील की तरह तमाम तर्क दे डाले। यहां तक कह डाला कि इस फैसले के बीच जो लोग रोड़े डाल रहे हैं, उन्हें पार्टी क्या जमाना भी माफ नहीं करेगा। इस तरह की टिप्पणियों पर जोरदार बहस की भी नौबत आई। लेकिन, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मोदी के मुद्दे पर भाजपा के दिग्गजों में मनभेद पैदा न हों। दो दिन की समन्वय बैठक में संघ और भाजपा के अलावा संघ परिवार के सभी 13 घटकों के प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की। भाजपा के दो नेताओं को छोड़कर शायद ही किसी ने मोदी के गुणगान से परहेज किया हो।

17 सितंबर को मोदी का जन्मदिन है। कुछ लोगों की यह राय भी रही कि जन्मदिन के अवसर पर ही मोदी को उम्मीदवारी का बड़ा ‘उपहार’ दिया जाए। उल्लेखनीय है कि 20 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में कोई शुभ काम की शुरुआत नहीं की जाती। ऐसे में, दबाव है कि 19 सितंबर के पहले ही मोदी के मुद्दे पर फैसला हो जाए। मोदी के एक करीबी माने जाने वाले महासचिव ने अनौपचारिक चर्चा में संकेत दिए हैं कि 14 सितंबर को मोदी के नाम का ऐलान हो सकता है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 13 सितंबर को ही संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाने का मन बनाया था। लेकिन, मोदी के ज्योतिष सलाहकारों ने कहा है कि 5 का अंक गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए ज्यादा शुभ रहता है। ऐसे में, अच्छा रहेगा कि 14 तारीख को ही बड़ा फैसला ले लिया जाए।

हालांकि, संसदीय बोर्ड की बैठक की तारीख अभी औपचारिक रूप से तय नहीं हुई है। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष की तरफ से संसदीय बोर्ड के सदस्यों को अनौपचारिक रूप से कह दिया गया है कि वे लोग 13 और 14 सितंबर को दिल्ली में ही रहने का कार्यक्रम रखें, तो अच्छा है। इस संकेत से यही समझा जा रहा है कि मोदी के एजेंडे पर ही इन तारीखों में संसदीय बोर्ड की बैठक होगी। यह भी तैयारी कर ली गई है कि यदि किसी ने विरोध की जिद ही कर ली, तो मोदी पर फैसला बहुमत से करा लिया जाएगा। इस आशय के संकेत आडवाणी खेमे को दे दिए गए हैं। संघ प्रवक्ता एमजी वैद्य ने समन्वय बैठक के समापन के बाद मीडिया से यही कहा है कि सोमवार को मोदी के मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई है। क्योंकि, इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं को ही फैसला करना है। संघ का इस बारे में जो नजरिया है, उसे शनिवार को ही पार्टी नेतृत्व को बता दिया गया था।

15 सितंबर को हरियाणा के रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों की एक बड़ी रैली आयोजित की गई है। इसमें मुख्य अतिथि की हैसियत से मोदी को न्यौता दिया गया है। इस रैली में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह सहित सेना के डेढ़ दर्जन मेजर जनरल रैंक के पूर्व अधिकारी भी होंगे। इस रैली के आयोजकों में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव कैप्टन अभिमन्यु सिंह भी हैं। उनका दावा है कि इस रैली में पूर्व सैनिकों की ऐतिहासिक भीड़ जुटेगी। कोशिश की जा रही है कि मोदी, इस रैली में ‘पीएम इन वेटिंग’ की हैसियत से ही हिस्सेदारी करें। जाहिर है इसके लिए जरूरी है कि 14 सितंबर को संसदीय बोर्ड मोदी के नाम पर मुहर लगा दे। संघ और भाजपा समन्वय समिति की बैठक में रामजन्म भूमि, धारा-370 व सामान्य नागरिक संहिता जैसे विवादित मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

इन मुद्दों पर आडवाणी और सुषमा जैसे नेताओं ने यही कहा कि गठबंधन राजनीति के जमाने में खांटी और विवादित मुद्दों को सिर पर लादकर चलना संभव नहीं है। इसको लेकर संघ के एक-दो नेताओं ने काफी नाराजगी भी जताई। लेकिन, स्पष्ट रूप से यह तय नहीं हो पाया कि इन मुद्दों को लेकर क्या करना है? बाद में, संघ नेताओं ने यही कहा कि व्यवहारिक कारणों से भाजपा इन मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में भले शामिल न करे, लेकिन इस तरह की बातें भी न करे कि उसका इन मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि, ऐसा करने से संघ परिवार के दूसरे घटकों का हौसला टूटता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के ताजा दंगों से सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है। इन दंगों में 31 लोग मरे हैं। इसकी भी अनौपचारिक चर्चा बैठक में हुई। संघ के नेताओं ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं को बहुसंख्यकों के पक्षधर भूमिका में रहना चाहिए। ताकि, सपा जैसे दलों का राजनीतिक छद्म सेक्यूलर खेल बिगड़ सके।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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