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संघ लोक सेवा आयोग की मूर्खतापूर्ण चालाकी ने उत्तर और दक्षिण की दीवारें गिरा दीं

पिछले सप्ताह भारतीय भाषाओं की जैसी विजय संसद में हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई। अंग्रेजी के वर्चस्व के विरुद्ध पहली बार उत्तर और दक्षिण, दोनों एक साथ खड़े हुए। संसद में अब तक चली भाषा संबंधी बहसों में देश बंटा हुआ दिखाई पड़ता था। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग को बधाई कि उसकी मूर्खतापूर्ण चालाकी ने उत्तर और दक्षिण की दीवारें गिरा दीं। संसद ने एक स्वर से अंग्रेजी को थोपने की निंदा की।

पिछले सप्ताह भारतीय भाषाओं की जैसी विजय संसद में हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई। अंग्रेजी के वर्चस्व के विरुद्ध पहली बार उत्तर और दक्षिण, दोनों एक साथ खड़े हुए। संसद में अब तक चली भाषा संबंधी बहसों में देश बंटा हुआ दिखाई पड़ता था। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग को बधाई कि उसकी मूर्खतापूर्ण चालाकी ने उत्तर और दक्षिण की दीवारें गिरा दीं। संसद ने एक स्वर से अंग्रेजी को थोपने की निंदा की।

1965-66 में जब स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज ने मुझे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रंथ मेरी मातृभाषा (हिंदी) में लिखने की अनुमति नहीं दी थी तो संसद में अपूर्व हंगामा हुआ था। संसद का काम-काज कई बार ठप हो गया था, इसलिए कि तब दक्षिण भारत के सांसदों ने उसे हिंदी बनाम भारतीय भाषाओं की लड़ाई का रूप दे दिया था। डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, हिरेन मुखर्जी, अटलबिहारी वाजपेयी, भागवत झा आजाद आदि ने द्रमुक के सांसदों को बहुत समझाया कि यह समस्त भारतीय भाषाओं की साझा लड़ाई है, लेकिन उस हिंदी-विरोधी माहौल में विवेक की इस वाणी को दक्षिण में किसी ने नहीं सुना, लेकिन इस बार संघ लोक सेवा आयोग ने जैसे ही 100 अंकों के अंग्रेजी पर्चे की अनिवार्यता घोषित की, दक्षिण के सांसद भी बिलबिला पड़े। वे इस औपनिवेशक कदम के वर्ग-चरित्र को समझ गए।
 
उन्हें तुरंत पता चल गया कि अंग्रेजी को अनिवार्य करने के पीछे असली इरादा क्या है? असली इरादा यह है कि सरकारी नौकरियों में ग्रामीणों, गरीबों, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के बच्चों को न घुसने दिया जाए। सरकारी नौकरियां सिर्फ उन वर्गो तक सीमित रखी जाएं, जिनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़े हैं। खर्चीले अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों में कौन पढ़ते हैं? अमीरों, अफसरों और शहरियों के बच्चे! ये ही बच्चे नौकरशाही पर अब भी हावी हैं। यही कारण है कि हमारा लोकतंत्र खोखला, निर्मम, जननिरपेक्ष और अनुत्तरदायी हो गया है। अभी तक अंग्रेजी अनिवार्य नहीं थी।
 
हिंदी के साथ उसका कामचलाऊ ज्ञान अपेक्षित था। लेकिन अब सिर्फ अंग्रेजी को अनिवार्य बनाकर ऐसी किलेबंदी की गई कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह कोई भी भारतीय भाषा न जाने, वह भारत का सबसे शक्तिशाली नौकरशाह बन सकता है। यह गुलामी की वापसी नहीं तो क्या है? यह अंग्रेजों के राज को लौटा लाने की साजिश के अलावा क्या है? खुशी की बात है कि हमारे सांसदों ने ऐसे नारे लगाए कि ‘अंग्रेजी में काम न होगा, देश फिर से गुलाम न होगा।’
 
स्वतंत्र भारत में उलटी गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। होना तो यह चाहिए था कि हमारे नौकरशाहों को वह प्रांतीय भाषा बहुत अच्छी तरह से आए, जहां उन्हें जनता की सेवा करनी है और एक अखिल भारतीय जनभाषा भी आए, लेकिन वे सिर्फ अंग्रेजी जानेंगे तो अंग्रेज-बहादुर की तरह सिर्फ हुक्म और डंडा चलाएंगे। जनसेवा क्या खाक करेंगे? जनता की भाषा में जनता के दुख-दर्द जाने बिना कोई जनसेवा कैसे कर सकता है? भारत में सच्चा लोकतंत्र तभी आएगा, जबकि उसकी सरकारों, अदालतों और विधि-निर्मात्री संस्थाओं में अंग्रेजी के प्रयोग पर सामान्यतया प्रतिबंध हो। हमारी किसी भी शिक्षण संस्था में अंग्रेजी अनिवार्य नहीं होनी चाहिए। यदि कोई स्वेच्छा से अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाएं पढ़ना चाहे तो जरूर पढ़े। अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई को गैर-कानूनी घोषित किया जाना चाहिए। यह भारतीय-प्रतिभा की भ्रूण हत्या है। सरकारी नौकरियों की भर्ती-परीक्षा में से अंग्रेजी हटा दी जाए, तो आधे से ज्यादा ‘पब्लिक स्कूलों’ पर अपने आप ताले पड़ जाएंगे।
 
लेकिन संघ लोक सेवा आयोग ने तो अंग्रेजी के आगमन का चोर दरवाजा नहीं, डाकू-दरवाजा खोल दिया। उसने दो साल पहले उम्मीदवारों की अभिरुचि (एप्टीट्यूड) परखने वाले पर्चे में अंग्रेजी अनिवार्य कर दी थी। नतीजा क्या हुआ? 2011 में कुल 910 उम्मीदवार चुने गए। उनमें से अंग्रेजी के 800, हिंदी के 89 और सारी भारतीय भाषाओं के सिर्फ 21 उम्मीदवार चुने गए। अब तक चला आ रहा गणित उलट गया। अब अंग्रेजी पर्चे के 100 अंक वरीयता क्रम में भी जुड़ने थे। वरीयता तो सिर्फ एक या दो अंक से भी आगे-पीछे हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले उम्मीदवार अन्य विषयों के कितने ही अच्छे जानकार हों लेकिन अगर अंग्रेजी में उनके अंक कम आ गए तो वे मारे जाते।

इसके अलावा प्रांतीय भाषाओं के गले में एक फांसी और भी डाल दी गई थी। यदि किसी भाषा में 25 से कम उम्मीदवार हों तो उस भाषा के उम्मीदवारों को अपनी भाषा में उत्तर लिखने की सुविधा नहीं दी जाएगी। वे सिर्फ हिंदी या अंग्रेजी में लिखने के लिए मजबूर किए जाएंगे। किसी भी नागरिक के मूलभूत अधिकार को क्या सिर्फ इसलिए छीन लिया जाएगा कि उसके पास संख्याबल नहीं है? यह संविधान का मजाक नहीं तो क्या है? इसी बेईमानी ने अहिंदीभाषी सांसदों को हिंदी सांसदों के साथ जोड़ दिया। यह अंग्रेजी के विरुद्ध संयुक्त लड़ाई बन गई। एक और प्रावधान ने अहिंदीभाषियों को चिढ़ा दिया। उसके अनुसार यदि कोई उम्मीदवार किसी प्रांतीय भाषा में भर्ती-परीक्षा देना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक होगा कि उसी भाषा के माध्यम से उसने स्नातक की उपाधि ली हो। यह प्रावधान किसी हिंदी या अंग्रेजीवाले पर लागू क्यों नहीं होता? इसी प्रकार के कुछ अन्य आपत्तिजनक प्रावधान भी इधर आयोग ने कर दिए थे। सरकार ने उन्हें अभी सिर्फ स्थगित किया है। जरूरी है कि उन्हें समाप्त किया जाए। इसके साथ यह भी जरूरी है कि भर्ती-परीक्षाओं को ऐसा रूप दिया जाए कि उनमें उम्मीदवारों की असली गुणवत्ता की पूछ-परख हो, न कि उनकी चमक-दमक, गिट-पिट और भद्रलोकीय पाखंड को महिमा-मंडित किया जाए।
 
समस्त भारतीय भाषाओं की इस अनायास एकता को सुदृढ़ बनाना इसलिए भी जरूरी है कि उसके बिना 21वीं सदी में भारत का आधुनिकीकरण और शिक्षा का शत-प्रतिशत प्रसार असंभव है। आधुनिक और शिक्षित हुए बिना भारत अपनी गरीबी दूर नहीं कर सकता। संसार का कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा के माध्यम से महाशक्ति नहीं बना है। स्वभाषा ही महाकुंजी है, महाशक्ति बनने की। स्वभाषा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा थी, हमारी भाषाओं की आपसी लड़ाई! यदि समस्त भारतीय भाषाएं आज संयुक्त मोर्चा बना लें तो भारत से अंग्रेजी को अपदस्थ करना अंग्रेजों को भगाने से भी ज्यादा आसान होगा।

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं स्‍तंभकार वेद प्रताप वैदिक का यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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