इस देश को किसी की नजर लग गई है। संसद को कार्टून से डर लगता है तो सरकार को प्रेस की आजादी अखरती है। शुक्रवार को अचानक खबर आई कि बाबासाहेब बीआर अंबेडकर पर बने एक कार्टून से सांसद काफी खफा हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल का इस्तीफा चाहते हैं। उन्हीं की पार्टी के नेता पीएल पुनिया ने कहा कि या तो इस्तीफा दें या फिर देश से माफी मांगें। प्रभा ठाकुर कहती हैं कि तमाम अधिकारियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। बीजेपी हो या फिर बीएसपी सब एक सुर में बोल रहे थे। बिना जाने, बिना समझे। कार्टून क्या है, किसने बनाया है, कब बना है? बनाने वाला कैसा है, उसकी शख्सियत क्या है?
कार्टून बनाया था देश के महानतम कार्टूनिस्ट में से एक शंकर पिल्लई ने। जो पंडित जवाहर लाल नेहरू के मित्र थे और नेहरू जी ने खुद उनसे कहा था, 'मुझे भी मत बख्शना'। कार्टून बना था 28 अगस्त 1949 में। 1949 में बने इस कार्टून पर पिछले 63 साल में कभी किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। 1949 में नेहरू जी भी जिंदा थे और अंबेडकर भी। उन्हें किसी तरह की कोई तकलीफ इस कार्टून से नहीं थी। न उन्होंने और नहीं उनके अनुयायियों ने किसी भी तरह की आपत्ति जताई। न किसी को लगा कि कार्टून दलित विरोधी है। या फिर किसी भी तरह से अंबेडकर का अपमान है। लेकिन अचानक कुछ लोगों को लगा कि नहीं इस कार्टून लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं और इसे फौरन ही एनसीआरटी की पुस्तकों से हटा देना चाहिए। शाम तक इन पुस्तकों को बनाने वाली समिति के मुख्य सलाहकार योगेंद्र यादव और सुहास पलशीकर ने अपने पदों से विरोधस्वरूप इस्तीफा भी दे दिया।
योगेंद्र यादव को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। उनके बारे में ये सोचना कि वो दलित विरोधी हैं या फिर ऐसा कुछ काम करेंगे जिसकी वजह से बाबा साहेब अंबेडकर का अपमान होगा अपराध है। योगेंद्र यादव न केवल राजनीति शास्त्र के बड़े जानकार हैं बल्कि उनकी सादगी और ईमानदारी का भी मैं कायल हूं। दलित-पिछड़े तबके के प्रति वो हमेशा ही सजग रहते हैं। मुझे कई बार उनकी तरफ से ऐसे मेल आते हैं या फिर वो फोन करते हैं बताने के लिए फलां इलाके में दलितों के प्रति अत्याचार हुआ है और आपको इसे कवर करना चाहिए। हरियाणा के मिर्चपुर में जब दलितों की बस्ती को आग लगाई गई और दलित वहां से भागने को मजबूर हुए थे तो योगेंद्र जी कई बार फोन करके छोटी-छोटी जानकारियां दिया करते थे, दलित उत्पीड़न को लेकर परेशान रहते थे। ऐसे में जब शुक्रवार शाम उनका कार्टून पर मेल मिला तो काफी तकलीफ हुई। उन्होंने बड़ी सादगी और मजबूती से लिखा, 'संसद की संक्षिप्त, गर्मागरम और पूरी जानकारी के अभाव में हुई बहस ने लोकतांत्रिक समाज में भविष्य की पीढ़ियों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के साथ न्याय नहीं किया है। संसद की सार्वभौमिकता सिर आंखों पर लेकिन विरोध जताने का अधिकार हमें भी है।' और इन्हीं शब्दों के साथ उन्होंने अपना सुहास पलशीकर के साथ इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया।
योगेंद्र यादव इस पुस्तक को पास करने वाले अकेले शख्स नहीं है। इस पुस्तक, जिसमें ये कार्टून छपा है, को मानिटरिंग कमेटी ने भी देखा था। इस कमेटी के को-चेयरपर्सन प्रोफेसर मृणाल मिरी और जी पी देशपांडे जैसे बड़े और विद्वान शिक्षाविद थे। जी पी देशपांडे ने दलित सुधारक ज्योतिबा फुले पर एक बेहतरीन नाटक भी लिखा है। इस मानिटरिंग कमेटी के पास होने के बाद ये पुस्तक नेशनल मानिटरिंग कमेटी के पास गई। जिसमें प्रोफेसर गोपाल गुरु और जोया हसन जैसे प्रोफेसर हैं। इन्हें दलित विरोधी कहना तो दूर ये वो लोग हैं जो दलित अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते रहे हैं। ऐसे में सांसदों को ये लगे कि किताब में छपे कार्टून ने अंबेडकर का अपमान किया है और कार्टून को पाठ्य पुस्तक में रखने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, तो सुनकर हंसी नहीं आती, मन रोता है कि आखिर सांसदों को हुआ क्या है? क्या राजनीति का स्तर इतना गिर गया है?
ये बहस सिर्फ कार्टून पर खत्म नहीं होती। देश में एक नये तरह की असहिष्णुता लगातार मजबूत हो रही है। हर आये दिन किसी भी तस्वीर को चिथड़ा कर दिया जाता है या फिर किसी किताब के नाम पर तोड़फोड़ य़ा हिंसा होती है। हर बार सरकार चुप। कभी कोई नेता खड़े होकर ऐसे लोगों को डांटता डपटता नहीं। पिछले दिनों जयपुर साहित्य मेले में सलमान रुश्दी के आने पर बवाल काट दिया गया। रुश्दी नहीं आए, उनको वीडियो कॉन्फ्रेसिंग भी नहीं करने दी गई। चंद लोगों की लफंगई ने एक शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम का मजाक बना दिया। प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। अभिव्यक्ति की आजादी दम तोड़ती रही और दिल्ली से लेकर जयपुर तक की सरकारें मुंह फेरे पूरा ड्रामा देखती रहीं। क्या ये इस देश के लिए शर्म की बात नहीं है कि सदी के सबसे बड़े पेंटरों में से एक एम एफ हुसैन को अपने देश की जमीन पर मौत भी नसीब नहीं हुई? क्योंकि कुछ सिरफिरों को लगता है कि उन्होंने अपने चित्रों में हिंदू देवी देवताओं की नग्न तस्वीरें बनाकर अपमान किया है। उनकी जिन तस्वीरों को राष्ट्रीय धरोहर के तौर पर सदियों तक संभाल कर रखना चाहिए उनको फाड़ने का काम किया गया और उनके खिलाफ इतने मुकदमे दायर किए गए कि उन्होंने देश छोड़ना ही बेहतर समझा। तस्लीमा नसरीन को भी प. बंगाल में नहीं रहने दिया गया। गुनाह बस इतना कि उन्होंने अपनी किताब में कुछ ऐसा लिख दिया कि एक मुस्लिम तबके की भावनाएं को ठेस लग गई। 35 साल से ज्यादा लेफ्ट ने शासन किया। लेफ्ट हमेशा ही अभिव्यक्ति की आजादी की वकालत करता है। तस्लीमा नसरीन के मामले ने उसकी कलई भी खोल दी।
लेफ्ट को तस्लीमा नहीं पसंद, सलमान रुश्दी के मसले पर कांग्रेस गुनहगार तो हुसैन के लिए बीजेपी। यानी राजनीति के सब रंग बदरंग। ऐसे में मुझे इस बात पर कतई हैरानी नहीं हुई जब मीडिया पर अंकुश लगाने की मांग जोरशोर से उठी। एक असहिष्णु समाज को ही कार्टून से भी डर लगता है और प्रेस की आजादी से भी, उसको रुश्दी पर भी आपत्ति होती है और हुसैन और तस्लीमा
पर भी। और इस बहस में सत्ताधारी कांग्रेस ये भूल जाती है कि उसकी विरासत क्या है? नेहरू ने प्रेस की आजादी के मसले पर 1950 में कहा था। शंकर के कार्टून छपने के एक साल बाद। 'मैं आजादी के गलत इस्तेमाल के खतरे के बावजूद एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस के साथ रहना पसंद करूंगा, न अंकुश लगे प्रेस के साथ।'
लेखक आशुतोष आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग ब्रेक के बाद से साभार लिया गया है.






