15वीं लोकसभा का समापन सत्र आज से शुरू होने जा रहा है। सरकार ने तैयारी की है कि इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पास करा लिए जाएं। उसने अपने तईं विपक्ष से भी भरपूर समझदारी बनाने की कसरत कर ली है। भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों को पास कराने के लिए मुख्य विपक्षी दल भाजपा नेतृत्व तो राजी है। लेकिन, सरकार को समर्थन देने वाली पार्टी सपा ने कई ‘किंतु-परंतु’ के सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे ज्यादा आफत तो आंध्र के कांग्रेसी सांसदों के पाले से ही आ रही है।
तेलंगाना के मुद्दे पर यहां राज्य के सांसद दो धड़ों में बंट गए हैं। सरकार ने आंध्र को बांटकर नया तेलंगाना राज्य बनाने का प्रस्ताव किया है। इसको लेकर सीमांध्र और तेलंगाना क्षेत्र के सांसद एक-दूसरे के खिलाफ जूझने को तैयार हैं। यहां तक कि कांग्रेस के सांसद भी इस मुद्दे पर आलाकमान को ठेंगा दिखाने पर उतारू हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने नाराज अपने सांसदों को मनाने के लिए काफी कोशिशें कीं। लेकिन, बात नहीं बनी। ये सांसद नहीं चाहते हैं कि इस सत्र में तेलंगाना का विधेयक लाया जाए। वैसे भी, आंध्र प्रदेश विधानसभा ने यह विधेयक बगैर पास किए हुए केंद्र को लौटा दिया है। इससे भी कांग्रेस की राजनीतिक किरकिरी पहले से ही बढ़ गई है।
लेकिन, प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि कुछ भी हो, सरकार अपने तेलंगाना संकल्प को पूरा करके रहेगी। तकनीकी रूप से यह अल्पकालिक सत्र शीतकालीन सत्र का ही विस्तार है। इसमें सरकार का 39 विधेयक पास कराने का लक्ष्य है। संसदीय मामलों के कार्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में उन्होंने यही अपील भी की कि विपक्ष, सभी विधेयकों को पास कराने में अपना रचनात्मक सहयोग दे। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार निरोधी आधा दर्जन विधेयकों को पारित कराने के लिए खास जोर देते रहे हैं। इन प्रस्तावित विधेयकों को लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी ऐतराज नहीं है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सरकार को यही आश्वासन दिया है कि उनकी पार्टी तो इन विधेयकों के बावत अपना समर्थन देगी। लेकिन, संसद में व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही होगी। दरअसल, भाजपा नेतृत्व को आशंका है कि तेलंगाना के मुद्दे पर कांग्रेस के सांसद ही संसद के दोनों सदनों में बाधा पहुंचाएंगे। क्योंकि, शीतकालीन सत्र के पहले दौर में भी तेलंगाना मुद्दे की तकरार के चलते काम बाधित रहा था।
सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को सुझाव दिया है कि इस समापन सत्र में सरकार को केवल लेखा अनुदान वाले वित्तीय विधेयक ही पारित कराने चाहिए। बाकी कामकाज अगली सरकार के लिए छोड़ देना चाहिए। क्योंकि, राजनीतिक नैतिकता का तकाजा भी यही है। लेकिन, संसदीय मंत्री कमलनाथ ने कह दिया है कि सरकार लेखा अनुदान तो 17 फरवरी को ही पेश करेगी। इसके पहले कई और जरूरी विधेयक पास कराने का एजेंडा है। उल्लेखनीय है कि यह सत्र 21 फरवरी तक चलना है। कुल 12 कार्य दिवसों में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने का एजेंडा है। सरकार ने इस सत्र में कई विवादित विधेयक भी पास कराने का लक्ष्य रखा है। जबकि, इनमें से कुछ विधेयकों के मामले में सरकार के समर्थक दलों को भी घोर ऐतराज रहा है।
ऐसे विधेयकों की श्रेणी में महिला आरक्षण का भी मुद्दा है। यह विधेयक दशकों से लंबित रहा है। यूपीए सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद राज्यसभा में इसे पारित कराया था। लेकिन, भारी विवाद के चलते लोकसभा में इसे पारित कराने की पहल, पहले नहीं की गई। उल्लेखनीय है कि इस विधेयक के मसौदे को लेकर कई दलों को घोर ऐतराज रहा है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले राजद, सपा व बसपा को भी ऐतराज है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तो अल्टीमेटम भी दे चुके हैं कि यदि मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक को लोकसभा में पारित कराने की कोशिश की गई, तो वे विरोध के लिए तमाम सीमाएं भी तोड़ सकते हैं। मुलायम सिंह जैसे सहयोगियों की नाराजगी के डर से ही कांग्रेस नेतृत्व पहले इस मुद्दे पर पहल करने की हिम्मत नहीं दिखा सका। अब समापन सत्र में इस विधेयक के प्रति अपनी आस्था दिखाकर कांग्रेस महज खानापूर्ति की कवायद करती दिखाई पड़ रही है। लेकिन, राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि इस मुद्दे को लेकर सियासी विवाद काफी तूल पकड़ सकता है।
इस सत्र में सरकार संप्रदायिकता विरोधी एक विधेयक लाने की तैयारी में है। इसको लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा को खास ऐतराज रहा है। इस विधेयक के कई मसौदों पर विपक्ष के कुछ और दलों को भी आपत्तियां रही हैं। लेकिन, चुनावी मौके पर अल्पसंख्यक ‘कार्ड’ के रूप में इस विधेयक को इस्तेमाल करने की कार्य योजना समझी जा रही है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का आकलन है कि यदि भाजपा को छोड़कर दूसरे सभी सेक्यूलर दल इसके लिए राजी हो जाएं, तो बात बन सकती है। इससे संसद में भाजपा अलग-थलग भी पड़ जाएगी। भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक संसद में पास हो चुका है। अब यह कानून लागू भी हो चुका है। इस कानून को और कारगर रूप देने के लिए कुछ अन्य कानूनी उपाए करना जरूरी माना गया है। इसी के लिए सरकार छह विधेयक पास कराने की तैयारी में है। इनमें से दो विधेयक लोकसभा में पहले ही पास हो चुके हैं। अब इन्हें राज्यसभा में पास कराने की चुनौती है। दो लंबित विधेयक संसद की स्टेंडिग कमेटी के पास है। इस बार भ्रष्टाचार विरोधी दो और नए विधेयकों को पास कराने का एजेंडा है। इन्हें कैबिनेट की मंजूरी पहले ही मिल चुकी है।
रेहड़ी-पटरी वालों को जीवन-यापन का खास कानूनी अधिकार दिलाने के लिए सरकार एक विधेयक इस बार हर हालत में पास कराना चाहती है। कांग्रेस ने इस विधेयक को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल की तैयारी भी शुरू की है। खास तौर पर राहुल गांधी इसके लिए प्रयासरत रहे हैं। वे पिछले दिनों रेहड़ी-पटरी वालों से संवाद करते रहे हैं। यह विधेयक काफी दिनों से लंबित है। 2012 में लोकसभा में यह पारित हो चुका है। अब इस बार राज्यसभा से पारित कराने की बारी है। इस विधेयक को लेकर भाजपा को भी कोई खास आपत्ति नहीं है। इस समापन सत्र में विकलांगों को ज्यादा कानूनी सहूलियत देने के लिए एक विधेयक प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री ने संकल्प जाहिर किया है कि इस बार यह विधेयक जरूर पारित हो जाएगा।
15वीं लोकसभा में महज 165 विधेयक ही पारित किए जा सके हैं। 5 साल के कार्यकाल को देखते हुए यह रिकॉर्ड सबसे खराब माना जा रहा है। संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ इस संदर्भ में कहते हैं कि विधाई कार्यों के मामले में इतने खराब रिकॉर्ड के लिए विपक्ष ज्यादा जिम्मेदार है। क्योंकि, संसद के हर सत्र में हंगामा ही किया जाता रहा। इससे सरकार को कामकाज करने का बहुत कम अवसर मिल पाया। 15वीं लोकसभा के ही 126 विधेयक लंबित पड़े हैं। राज्यसभा में भी ऐसे लंबित विधेयकों की संख्या 72 है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली कहते हैं कि मनमोहन सरकार ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए विपक्ष को दोषी करार करना ज्यादा सुविधाजनक समझा है। जबकि, यह तरीका पूरी तरह से गैर-जिम्मेदारी वाला है। हकीकत यह है कि तमाम बड़े घोटालों को दबाने के लिए सरकार का अड़ियल रुख ही संसद में हंगामे की मुख्य वजह बना है। जेटली को लगता है कि सरकार की इस नाकामी और काहिली का जवाब चुनाव में जनता ही देगी।
सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि सरकार जल्दबाजी में कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के पास कराना चाहती है, जो कि हर दृष्टि से गलत है। येचुरी कहते हैं कि महिला आरक्षण जैसे जरूरी विधेयक को सरकार ने एक मजाक जैसा बना रखा है। यदि यूपीए सरकार का राजनीतिक संकल्प दृढ़ होता, तो इस विधेयक को पहले ही पास कराने की कोशिश की जाती। अब तो चलते-चलते महज औपचारिकता के लिए सरकार एक राजनीतिक स्वांग करने जा रही है। इसी से पता चलता है कि सरकार के राजनीतिक एजेंडे कितने गैर-ईमानदार रहे हैं? सरकार ने भले दर्जनों विधेयकों को पास कराने का लक्ष्य बना रखा हो, लेकिन भाजपा ने भी सरकार को घेरने के लिए तमाम तैयारी कर ली है। खास तौर पर बहुचर्चित ‘अगस्टा वेस्ट लैंड’ हेलीकॉप्टर खरीद मामले में सरकार को घेरने की तैयारी है।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि इस घोटाले में पिछले दिनों ही कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां आई हैं। इनसे पता चला है कि इस घोटाले के तार शीर्ष स्तर तक जुड़े रहे हैं। जिम्मेदार विपक्ष के नाते हम लोग संसद में सरकार से जवाब मांगेंगे। यदि सरकार अड़ियल रुख अपनाएगी, तो हंगामे की जिम्मेदारी हमारी नहीं, सरकार की ही होगी। मंगलवार को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने भी सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में भी कई विपक्षी दिग्गजों ने साफ-साफ कह दिया है कि यदि कांग्रेस अपना चुनावी एजेंडा ही आगे बढ़ाना चाहेगी, तो वे भला मूकदर्शक क्यों रहेंगे? विपक्षी नेताओं ने सवाल किया कि क्या तेलंगाना के मुद्दे पर सरकार अपने सांसदों पर लगाम लगा सकेगी? इस पर मीरा कुमार भी दो टूक ढंग से कोई जवाब नहीं दे पाईं। भाजपा ने तो शुरुआती दौर से ही हेलीकॉप्टर खरीद घोटाले पर राजनीतिक रार ठानने की रणनीति बना ली है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।






