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सचिव का आफिस खाली करवाने पहुंच गया था डाइरेक्‍टर

: पंचायती राज मंत्रालय को एक जगह दफ्तर नसीब नहीं : नई दिल्ली : भारत सरकार में उन विभागों की कोई औकात नहीं है जिनका किसी कारपोरेट जगत से कोई लेना देना न हो. हालांकि सरकार की नज़र में पंचायती राज मंत्रालय को बहुत महत्व दिया जाता है लेकिन लगता है कि वह सब कुछ ज़बानी जमा खर्च ही है. नई दिल्ली में जहां बाकी मंत्रालयों को बहुत ही अच्छी जगहों पर दफ्तर दिए गए हैं वहीं पंचायती राज मंत्रालय के पास सही तरीके का दफ्तर भी नहीं है.

: पंचायती राज मंत्रालय को एक जगह दफ्तर नसीब नहीं : नई दिल्ली : भारत सरकार में उन विभागों की कोई औकात नहीं है जिनका किसी कारपोरेट जगत से कोई लेना देना न हो. हालांकि सरकार की नज़र में पंचायती राज मंत्रालय को बहुत महत्व दिया जाता है लेकिन लगता है कि वह सब कुछ ज़बानी जमा खर्च ही है. नई दिल्ली में जहां बाकी मंत्रालयों को बहुत ही अच्छी जगहों पर दफ्तर दिए गए हैं वहीं पंचायती राज मंत्रालय के पास सही तरीके का दफ्तर भी नहीं है.

पंचायती राज मंत्री वी किशोर चन्द्र देव हैं जिनको शास्त्री भवन में दफ्तर मिला है लेकिन उनके मंत्रालय के सभी बड़े अफसर उनसे बहुत दूरी पर बैठाए गए हैं. कोई कृषि भवन में है तो कोई कनाट प्लेस की एक कमर्शियल बिल्डिंग में टाइम पास कर रहा है. पंचायती राज विभाग के कुछ अफसर पटेल चौक पर बने हुए सरदार पटेल भवन में भी बैठते हैं. आज़ादी के बाद महात्मा गाँधी ने देश के विकास में पंचायती राज को बहुत ही मह्त्व दिया था. उनके वारिस जवाहर लाल नेहरू ने तो पंचायती राज को महत्व दिया लेकिन उनके जाने के बाद ही हालात बहुत बिगड़ गए. जब राजीव गाँधी के प्रयास से संविधान में ७३ वां और ७४ वां संशोधन करके पंचायती राज को अहमियत दी गयी तो उम्मीद की जा रही थी कि शायद हालात कुछ सुधरेंगे. लेकिन जिस तरह से इतने अहम मंत्रालय को केंद्र सरकार एक जगह दफ्तर देने में नाकाम रही है उस से लगता है कि मौजूदा सरकार ने पंचायती राज को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है.

आज भी मनरेगा जैसी महत्‍वपूर्ण योजनाओं को लागू करवाने में पंचायती राज की संस्थाएं बहुत ही अहम भूमिका निभा रही हैं. लेकिन उस मंत्रालय को केंद्र सरकार के नज़र में एक फालतू  महकमे से ज्यादा के हैसियत नहीं मिल रही है. पंचायती राज मंत्रालय के मंत्री का दफ्तर शास्त्री भवन में है जबकि मंत्रालय की सबसे बड़ी अफसर मंत्रालय की सचिव किरण धींगरा का दफ्तर कृषि भवन में है. उस दफ्तर को भी एक दिन सम्पदा निदेशालय का एक डाइरेक्टर खाली करवाने पंहुच गया था. उसने सचिव के स्टाफ में काम करने वाले अफसरों से कहा कि मैडम का सामान निकाल लो. अफसरों ने कहा कि भाई तुम ही सामान निकाल कर सड़क पर रख दो. बहरहाल वह अफसर चला तो गया है लेकिन अभी ख़तरा टला नहीं है. उस देश की क्‍या हालात कही जायेगी जहां सेक्रेटरी स्तर के अफसर को बिना कोई वैकल्पिक जगह दिए दफ्तर खाली करने  को कहा जा रहा है.

किरण धींगरा के बाद का रैंक अतिरिक्त सचिव का है. मंत्रालय के एक अतिरिक्त सचिव पटेल चौक पर सरदार पटेल भवन में बैठते हैं जबकि दूसरे कनाट प्लेस में जीवन प्रकाश बिल्डिंग में. जो लोग सरकारी दफ्तरों के काम काज के तरीके से वाकिफ हैं उन्हें मालूम है कि सरकार के टाप अधिकारी किसी भी फैसले पर पंहुचने के लिए आपस में सलाह करते रहते हैं. अब अगर किरण धींगरा को अपने मातहत अफसरों से बात करनी है तो एक अफसर कनाट प्लेस से आएगा तो दूसरा पटेल चौक से. ज़ाहिर है कि सरकार की प्राथमिकता सूची में पंचायती राज का जो मुकाम है, उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि इस मंत्रालय को दिल्ली में कोई सम्मान जनक दफ्तर मिल पायेगा.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. एनडीटीवी समेत कई चैनलों अखबारों में काम कर चुके शेष नारायण इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं.

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