नवबंर की शुरुआत में, भारतीय पत्रकार, इससे पहले की कोई और दिलचस्प विवाद उन्हें विचलित करता, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (भारतीय प्रेस परिषद) के अध्यक्ष, न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू द्वारा दिए वक्तव्य पर झगड़ने को तैयार हुए। पीसीआई अध्यक्ष ने भारतीय न्यूज़ मीडिया की दशा पर अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट तौर पर सबके सम्मुख रखने का दुस्साहस किया। भारतीय मीडिया को लेकर उनके ख्याल “बहुत अच्छे” नहीं हैं। उनके आंकलन के अनुसार ज्यादातर मीडिया कर्मियों का बौद्धिक स्तर निम्न श्रेणी का है, उन्हें आर्थिक सिद्धान्तों, राजनीतिक विज्ञान, दर्शन या फिर साहित्य की समझ नहीं है। उन्होंने दलील दी कि भारतीय प्रेस जनहित में काम नहीं कर रही है।
इस वक्तव्य के परिणामस्वरूप जो नाराज़गी पैदा हुई, वो बृहद रूप से पत्रकार समुदाय तक ही सीमित रही। भारत में प्रिंट या फिर टेलीविज़न खबरों के ज्यादातर उपभोक्ताओं और निष्पक्ष प्रेक्षकों के लिए, श्री काटजू का मूल्यांकन सुस्पष्ट वास्तविकता की अभिव्यक्ति थी या ये कहें कि पीसीआई अध्यक्ष को भारतीय न्यूज़ पत्रकारिता के लिए मानदंड गढ़ने हेतु विकसित बौद्धिक समझ, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, उदार कला की अच्छी समझ जैसे ज्यादा उच्च पैमानों की भी आवश्यकता नहीं थी। किसी न्यूज़ रिपोर्ट हेतु विषय वस्तु को बगैर पक्षपात या जानबूझकर विकृत किए बिना, जिस विश्लेषणात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है, ज्यादातर अखबार और टेलीविज़न चैनल उसके लिए संघर्ष करते प्रतीत होते हैं।
भारत में न्यूज़ मीडिया कैसे निराश करता है, वो सुबह दैनिक अखबारों के प्रथम पृष्ठ और टेलीविज़न पर रात को प्रसारित खबरों से अपने-आप पता चल जाता है। खबरों के अंशों को, जिनका एक महत्वपूर्ण हिस्सा बेतरतीब से प्रेस एजेसीं की कतरन के साथ जुड़ा होता है, सुधी पाठक पूरे पृष्ठ के विज्ञापनों और कमवस्त्रों वाली महिलाओं की तस्वीरों के (अकसर गैर-भारतीय मूल कीं) के बीच ढूंढ सकते हैं। (अपने बचाव में, जानकार संपादक वाकई ये जानते होगें कि उनके ज्यादातर पाठक अब रोमांच पाने के लिए अन्य स्त्रोतों की बजाय अंग्रेज़ी-भाषी अखबारों को ज्यादा पसंद करते हैं)। अगर वहां कोई मौलिक रिपोर्टिंग होती है, तो ये बात अस्पष्ट होती है कि क्या उसे एक सरकारी एजेसीं या फिर एक निजी कंपनी द्वारा प्रायोजित किया गया है या फिर संपादक ने किसी के अनुग्रह पर ऐसा किया है।
टेलीविज़न चैनलों में स्थिति भयावह रूप से और ज्यादा खराब है। ज्यादातर न्यूज़ चैनल अब रिपोर्टिंग करते ही नहीं हैं। रिपोर्टिंग अब महज़ यह है कि रिपोर्टर उस दिन की सबसे बड़ी खबर के साथ दिल्ली और मुबई की सड़कों पर निकल जाते हैं और वहां मौजूद लोगों से उनके विचार जानते हैं। आजकल सभी चैनलों के लिए ये पसंदीदा काम बन गया है: अपने चैनल पर छह से लेकर आठ विशेषज्ञों के एक पैनल को बैठाना, जिसमें सामान्यत: बड़े राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, बेरोज़गार राजनीतिज्ञ, अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक और अकसर हर चैनल पर अवतरित होने वाले सेलिब्रिटी, जो या तो लॉबिस्ट होते हैं या फिर पीआर एजेंट, समालोचक (जिनके पैनल में होने की वजहें अब तक अस्पष्ट हैं)। ये एक दूसरे पर दोषारोपण करते हैं और इस बात के लिए खूब संघर्ष करते हैं कि उनकी चिल्ला-चिल्ली, लगातार चीख रहे एंकर से ज्यादा सुनी जाए। इस सबके बीच दर्शक स्क्रॉल (कुंडलन) पर सुर्खियों की कई अंसबद्ध परतों पर दृष्टिपात हेतु संघर्ष करता है, जो लगातार जोर-जोर से चीखने वाले पैनल सदस्यों के नीचे की तरफ स्क्रीन पर सरकती रहती हैं।
लिहाज़ा, यह कई सुस्पष्ट वजहों से खराब स्थिति में है। खबरें मनोरंजन बन गई हैं, जो कहानी का हिस्सा हैं। अपने आप में, ये कोई अपराध नहीं होना चाहिए। अगर पत्रकार खबरों को एक ऐसे सम्मोहक ढंग से रिपोर्ट और पैकेज (पुलिंदा) करता है, जो दर्शकों का ध्यान खींचे, तो यह बुरी बात नहीं। मुख्यधारा मीडिया जुनून की हद तक खबरों को मुख्यत: राजनीति, बॉलीवुड और क्रिकेट पर ही केन्द्रित करता है, यह समस्या का महज़ एक हिस्सा है। एक हद तक यह दर्शकों की प्राथमिकता का वास्तविक प्रतिबिंब है, तीनों क्षेत्रों में ध्यान केन्द्रित करने हेतु यहां बेशक मामला बनता है। लेकिन उन ज्यादातर खबरों का बचाव कठिन है, जिनमें जबरदस्त त्रुटियां और विकृतियां होती हैं, कभी कभी तो मुख्य फीचरों और दिन की सुर्खियों में भी होती हैं।
भारत में खबरें और कई तरह से भी निराश कर रही हैं, जिनके परिणाम तुरंत नज़र नहीं आते। शुरुआत से ही, यहां एक न्यूज़ स्टोरी के बढ़िया अन्वेषण के लिए पर्याप्त निवेश ही नहीं किया जाता। अखबार या फिर टेलीविज़न चैनल एक कहानी में रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक गहराई लाएं या कई विश्वसनीय लगने वाली परतों के पीछे की सच्चाई जानें, जो बखूबी जानी और प्रमाण प्रस्तुत करती हैं, आपको ऐसा बामुश्किल नज़र आएगा। एक ऐसे देश की मनोरंजक कहानी, जिसमें भारत जैसी विविधता हो, जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर महत्वपूर्ण परिवर्तन देख रही हो, कई विविधताओं और रंगों से भरी इन कहानियों को पेंट करने के लिए रोमांचक कैनवास होना चाहिए। फिर भी, अकसर, खबरें इस असाधारण विविधता को अत्यन्त साधारण तरीके से कमतर करती हुईं प्रतीत होती हैं या फिर अतिशय के बीच एक प्रतिस्पर्धा, जो केवल टेलीविज़न पर लाइव चिल्लाहट के मैच के साथ ही सुलझाई जा सकती है।
इसके अलावा परेशान करने वाली बात है, मुख्यधारा मीडिया में महत्व के लगभग प्रत्येक मुद्दे पर एक एकल, प्रबल विवरण की मौजूदगी। ऐसा हर उस विषय को लेकर होता है, जो दूर-दूर से ही सही, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक माना जाता है। कश्मीर में आतंकवाद से लेकर, मध्य और पूर्वी भारत में नक्सल बगावत, पाकिस्तान के साथ संबंध से लेकर, अशांत पूर्वोत्तर, यहां बामुश्किल अहमति व्यक्त करने वाला विवरण मिलता है। लगभग प्रत्येक रिपोर्टिंग करने वाला दैनिक, सरकार के दृष्टिकोण को मौन रूप में स्वीकृति देता है। यहां प्रतिस्पर्धी सच्चाइयों को जानने के लिए किसी तरह के अन्वेषण हेतु वास्तविक प्रयास नहीं किए जाते हैं, क्या यहां ऐसी कहानियां हैं, जिसके चलते भारतीय इन विषयों का कम निश्चितता के साथ परीक्षण करेगें, बजाय कि सरकार उनसे जो कुछ उन्हें मान लेने के लिए कहती है।
एकल विवरण की प्रबलता अन्य विषयों तक भी फैली हुई है। एक क्षण में अन्ना हज़ारे या तो एक राष्ट्रीय आंदोलन की अगुवाई कर रहे होते हैं या दूसरे ही क्षण अपराधियों के समूह का नेतृत्व। टाटा मोटर्स आम लोगों के लिए क्रांतिकारी सस्ती कारों का निर्माण कर रही है, जो प्रत्येक नागरिक के लिए फक्र की बात है या सिंगूर फिर भविष्य के आर्थिक सुधारों के लिए एक लड़ाई है। (पुरडू विश्वविद्यालय द्वारा किए बढ़िया अनुसंधान के विश्लेषण के मुताबिक 18 महीनों के दौरान, मीडिया ने टाटा नैनो के लॉन्च के विवरण को स्वीकार किया और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जो आश्चर्यजनक ढंग से ये कंपनी के अपने प्रचार की तर्ज़ पर चला।) यह सूची काफी लंबी है।
सबसे ऊपर, निसंदेह ये बात है कि भारतीय न्यूज़ मीडिया की निस्पक्षता सवालों के घेरे में है। पिछले साल पीआर एजेंट नीरा राडिया की ऑडियो रिकॉर्डिंग पत्रकारों और वो विषय जिसे उन्हें निस्पक्षता से कवर करना था, के बीच अच्छे ताल्लुकातों का खुलासा करती है। एक टेलीविजन एकंर को 2009 में केन्द्रीय सरकार के गठन के दौरान यूपीए सहयोगियों के बीच गठजोड़ में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए सुना गया। अखबारों के स्तम्भ लेखक पीआर एजेंट से सलाह ले रहे थे कि उन्हें क्या कुछ लिखना है। टेपों से इस बात का खुलासा हो रहा था कि वो प्रेस जो ऊपर से प्रचंडतापूर्वक स्वतंत्र दिखाई देती है, वो वास्तव में उच्च बोली लगाने वालों से प्रभावित है। लिहाज़ा, जो कोई भी स्टोरी कवर की गई, उसके साथ अन्य पांच स्टोरीयों की जानबूझकर अनदेखी की गई।
कई वजहों से, भारत में मीडिया संकट बड़े संकट को प्रतिबिंबित करता है और उस बावत चिंता जिससे पूरे विश्व का न्यूज़ मीडिया गुज़र रहा है, खास तौर पर पश्चिम का मीडिया। लेकिन चालक ज्यादा पृथक नहीं हो सकते। पश्चिम में संकट का मुख्य कारण नाटकीय रूप से अखबारों और पत्रिकाओं के पाठकों का कम होना है। पश्चिम के मुख्यधारा न्यूज़ संगठन भी मीडिया की नई नस्ल के चलते संकट में हैं, जो वैचारिक तौर पर चरम पर हैं और प्रत्येक घरेलू और वैश्विक कार्यक्रम को वामपंथियों और दक्षिणपंथियों के बीच लड़ाई के निम्न दृष्टिकोण से देखते हैं।
आश्चर्यजनक ढंग से, भारत में ये कोई मुद्दा नहीं है। विश्व में करीब-करीब अकेले, भारत का प्रिंट, मैगज़ीन और टेलीविज़न न्यूज़ कारोबार सर्कुलेशन (प्रसार) के साथ-साथ विज्ञापन शुल्क की वजह से दोहरे अंकों के साथ तेज़ी से बढ़ रहा है। 2003 और 2009 के बीच जब ज्यादातर बढ़े देशों में प्रिंट सर्कुलेशन का पतन हुआ, तब भारत ने 25 मिलियन नए पाठक शुमार किए। विज्ञापन और सर्कुलेशन के एक साथ अगले कुछ सालों में 10 फीसदी सालाना से ज्यादा तीव्र गति से विकास करने की संभावना है। भारतीय प्रेस में वैचारिक अतिवादिता कोई मुद्दा नहीं है। बल्कि, बाकी की राजनीति को प्रतिबिंबित करते हुए, घरेलू न्यूज़ मीडिया के पास बामुश्किल आर्थिक विकास, राजनीति या फिर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर एक सुस्पष्ट दर्शन होता है।
ज़ाहिर है, इसमें से किसी को भी भारत के पत्रकारों और रिपोर्टरों से श्रेय नहीं लेना चाहिए, जो अब भी पुराने ढंग से रिपोर्टिंग कर रहे हैं और सही तथ्यों, कहानियों के लिए मेहनत कर रहे हैं। निराशा के बीच, मैगज़ीन सेक्टर महत्वपूर्ण रूप से नवीनता के दौर में है, कभी-कभी उसकी इच्छा मुख्यधारा विवरण का प्रतिकार करने और शोर-शराबा करती सुर्खियों के पीछे वास्तविक कहानियों को खोद निकालने की होती है, इसके लिए वहां निवेश भी किया जा रहा है। अकसर वो ऐसे विषयों पर रोशनी डालती हैं, जो अखबारों और न्यूज़ चैनलों में प्रमुख रूप से गायब होते हैं (और दुर्भाग्यवश, उनका सर्कुलेशन अखबारों और चैनलों के पाठकों और दर्शकों की संख्या को कम कर देता है)।
हम यहां तक कैसे आए? शुरुआत के लिए, भारतीय मीडिया संकट, विश्वभर में उभरती उस बुद्धिमता की विश्वसनीयता में योगदान देता है, जिसके मुताबिक वस्तुनिष्ठ और स्वतंत्र पत्रकारिता गैर-लाभकारी वातावरण में ही फल-फूल सकती है, कदाचित अमीर ट्रस्टों और व्यक्तियों के परोपकारी सहयोग पर। देश के ज्यादातर बड़े अखबारों और टेलीविज़न चैनलों को लाभकारी-निगमों द्वारा खरीदा गया है, जो समझे-बूझे जाने वाले ढंग से आधार-रेखा पर ज़ोर देते हैं। इन संगठनों के निरपवाद रूप से दूसरे कारोबारी सरोकार और संबंध होते हैं, जो वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता को उनके भीतरी अखबार या न्यूज़ चैनल में मुश्किल और असुविधाजनक बना देते हैं। कई मीडिया केन्द्र अपने विज्ञापनदाताओं (एक हालिया विश्लेषणात्मक रिपोर्ट का आंकलन है कि भारत में करीब 75 फीसदी प्रिंट राजस्व विज्ञापनों के ज़रिए आता है) पर आश्रित रहते हैं, इसलिए हमेशा प्रलोभन के चलते उन्हें बढ़ावा दिया जाता है, खास तौर पर तब, जब ये विज्ञापनदाता रिपोर्टिंग का विषय हों। प्रलोभन उन विज्ञापनदाताओं को सबक सिखाने हेतु भी रहता है, जो मीडिया केन्द्र से प्रतिस्पर्धा करते हैं।
दर्शकों और विज्ञापनदाताओं को अगम्यागमनात्मक आत्म सेवारत रिश्तों द्वारा बढ़ावा देने के तरीके तीव्र होते हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रियों के लंबे भाषण अब कदाचित कोई विषय नहीं, लिहाज़ा दूरदर्शन पर इनके खबर होने का स्वांग रचा जाता है। निजी चैनलों पर अवतरित नए टेलीविज़न एंकर मौलिक न्यूज़ रिपोर्टर बन पाते, इससे पहले ही हमने उन्हें सेलिब्रिटी बना डाला। इनमें से ज्यादातर दिल्ली और मुंबई के उन सामाजिक हलकों के वांछित हिस्से बन गए हैं, जो राजनीतिक निर्णयकर्ताओं को एक साथ लाते हैं, इससे पहले कि वो ये सीख पाते कि निजी जिंदगी और व्यावसायिक जिम्मेदारियों के बीच सीमा रेखा कैसे खींची जाती है। कई संपादक राजनीतिक दलों और कारोबारी लीडरों के साथ प्रकट और गुप्त संबंध रखते हैं। ये तमाम संबंध और जिसका वो अखबारों, मैगजीनों, टेलीविज़न चैनलों के जरिए खुलासा करते हैं, इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि क्यों विश्व भर के उत्कृष्ट पत्रकार हमेशा राजनीति के साथ परस्पर दूरी बनाए रखने पर यकीन करते हैं, वे पार्टी और ईमानदारी वाले काम में भेद करते हैं।
संकटपूर्ण स्थिति के लिए किसी भी तरह के सार्थक विनिमय का अभाव जिम्मेदार है। जब पीसीआई अध्यक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रेस काउंसिल के तहत लाने का मु्द्दा उठाया था और परिषद को ज्यादा अधिकार देने की बात कही थी, ताकि वो ऊल-जुलूल खबरों पर लगाम कस सकें, उदाहरण के लिए, जैसा कि बार काउंसिल वकीलों के लिए करती है, तो संपादकों द्वारा इस विचार का बहुत विरोध किया गया। उन्होंने समाज के रखवाले की अपनी विशिष्ट भूमिका निभाने के लिए प्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता का हवाला दिया।
तो, क्या भारत में पत्रकारिता के नवीनीकरण का कोई रास्ता है? एकदम है, और उत्तर थोड़ा बहुत मौजूद है, संपादकों द्वारा अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कड़े शब्दों में कही अपनी बात में, जिसके वो आदि बन चुके हैं। वो सही हैं कि नियंत्रण एक फिसलती ढलान है। जबकि नियंत्रण के लिए इच्छा प्रबल है, लोकतंत्र में प्रेस की एक विशिष्ट भूमिका होती है और प्रेस की स्वतंत्रता (बेशक एक दोषपूर्ण न्यूज़ मीडिया) यह सुनिश्चित करने के लिए एकदम ज़रूरी है कि वो संरक्षक का किरदार निभाने के लिए खड़ी है, जिसके लिए उसकी रचना की गई थी।
नवीनीकरण का एक बेहतरीन मौका, प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने में नहीं, बल्कि इसके विस्तार में छिपा है। इसके अलावा उन बाधाओं को दूर करने में, जो फिलहाल इसे देश के मानहानि विरोधी कानून के ढांचे के ज़रिए बेड़ियों में जकड़ती हैं। इसमें कोई शंका नहीं कि मानहानि अभियोग का डर (चाहे एक राजनेता या फिर एक कारोबारी लीडर से) पत्रकारों और संपादकों द्वारा खबरों के कवरेज के चयन में अहम भूमिका निभाता है। भारत ने अब तक पश्चिम की भांति ऑनलाइन साइटों का प्रसार नहीं देखा है, जो मुख्यधारा मीडिया की कवरेज को बारीकी से देखती हैं और पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग के लिए उत्तरदायी ठहराती हैं।
औसत दर्जे की पत्रकारिता का जवाब ज्यादा प्रतिस्पर्धा से भी दिया जा सकता है। आरोपित करने के लिए प्रतिस्पर्धा, लाभ के लिए, घरेलू मीडिया दो स्त्रोतों से आना चाहिए, विदेशी न्यूज़ संगठन और एक नया गैर-लाभकारी सार्वजनिक प्रसारक। विदेशी न्यूज़ संगठनों को घरेलू न्यूज़ बाज़ार के लिए खोल देना चाहिए। स्थानीय टेलीविज़न चैनलों में विदेशी मालिकाना हक की सीमा तय है, जबकि विदेशी प्रिंट संगठन स्थानीय पाठकों के लिए संस्करण में काट-छांट नहीं कर सकते। इन नियंत्रणों के लिए कोई तर्कसंगत दलील अब मौजूद नहीं है। फिर से उठ खड़े होने वाले भारत में, जहां घरेलू कंपनियां देशी और विदेशी बाज़ारों में विदेशी कंपनियों के साथ जमकर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, इन नियंत्रणों की वजह सिर्फ घरेलू मीडिया कंपनियों का संरक्षण करना है। और, यह वो वक्त है, जब यथास्थिति को बदल देना चाहिए।
इस बात की कोई गारंटी नहीं कि विदेशी न्यूज़ संगठन पत्रकारिता की ज्यादा उच्च शैली का अभ्यास करेगें (यूके में सनसनीखेज़ पत्रकारिता के उपद्रवी व्यवहार की यादें दिमाग में अभी ताज़ा हैं)। लेकिन यहां कम से कम एक मौका ज़रूर है कि स्थापित न्यूज़ संगठनों द्वारा कौशल और पद्यतियों का ताज़ा अर्क, जिनके अपने घरेलू बाज़ार में उनका राजस्व सिकुड़ रहा है, वो भारत के आरामदायक, अगम्यागमनात्मक मीडिया सर्कल को हिला कर रख देगें। शायद यह आयात हमारे कुछ सेलिब्रिटी एंकरों और संपादकों को उनकी अल्पविकसित रिपोर्टिंग और वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता के उचित सबक सिखा देगा, जिसे शायद उन्होंने स्टारडम की अपनी राह में अनछुआ छोड़ दिया है।
हालांकि, खेल का रुख बदलने वाला होगा, एक नया गैर-लाभकारी सार्वजनिक प्रसारक, इसकी स्थापना भी इस इच्छाशक्ति के साथ की जाए कि वो विज्ञापनदाताओं और कारोबारी सहयोगियों द्वारा तय एजेंडे के विपरीत गंभीर पत्रकारिता का अनुगमन करेगा। बेशक पुनर्गठित प्रसार भारती को इस किरदार को निभाने हेतु विकसित किया जा सकता है, लेकिन इस बात के प्रमाण नहीं कि यह इस भूमिका हेतु सरकारी प्रभाव से मुक्त है।
विश्वभर के, सार्वजनिक प्रसारक पत्रकारिता के गिरते स्तर के खिलाफ प्राकार रहे हैं। फिर चाहे वो यूनाइटेड स्टेट्स की पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (पीबीएस), नेशनल पब्लिक रेडियो (एनपीआर) हो या फिर ब्रिटेन का ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉपरेशन (बीबीसी), इन सार्वजनिक प्रसारकों ने कहानी का अनुसरण करने में निस्पक्षता और ईमानदारी दिखाकर अहम भूमिका निभाई, वो कहानियां जो कभी-कभी ज्यादा मुख्यधारा न्यूज़ संगठनों के हाथ नहीं आईं। पीबीएस का 1970 में स्पष्टतया प्रत्युत्तर स्वरूप गठन किया गया था, जिसे उस दौरान यूएस में खबरों और मनोरंजन पर नियंत्रण रखने हेतु तीन नेटवर्क टेलीविज़न संगठनों के प्रभुत्व के रूप में देखा गया। तीनों संगठनों ने रिपोर्टरों को तैयार करने का शानदार काम किया, जो निजी न्यूज़ संगठनों में लीडरों वाली भूमिका निभाने हेतु चले गए थे।
बेशक, उनका राजस्व मॉडल भिन्न है, उनके वित्त का एक अहम हिस्सा सार्वजनिक दान, अनुदान और स्थानीय सहयोगियों के योगदान द्वारा आता है (पीबीएस और एनपीआर के मामले में), और बीबीसी के मामले में एक राष्ट्रीय टेलीविज़न लाइसेंस फीस के रूप में। दूसरे शब्दों में कहें तो, वो स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए उन्मुक्त हैं। इनमें से कोई भी अपने कैरियर के लिए विज्ञापनदाता या फिर सरकार पर निर्भर नहीं है। लोकतंत्र में सबसे अहम चौथा स्तम्भ है। फिलहाल कोई भी संस्थान न्यूज़ मीडिया से ज्यादा कमज़ोर नहीं है। नवीनीकरण का एक रास्ता है, ज्यादा प्रतिस्पर्धा और अभिव्यक्ति की ज्यादा स्वतंत्रता।
अजीत मोहन का यह लेख इंडिया रियल टाइम से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.






