Shambhu Dayal Vajpayee : मैं कल से शिवपाल सिंह यादव के चेहरे की उस भाव भंगिमा को भूल नहीं पा रहा हूं जो पैर छूने के सवालों के जवाब में प्रस्फुटित हुई थी । वह मुलायम सिंह यादव के भाई हैं और भतीजे अखिलेश यादव के बाद उप्र सरकार में सर्वाधिक विभागों के मंत्री भी। जहां जाते हैं लोग दौड़ कर पैर छूते ही हैं। इसमें कोई खास बात भी नहीं है । खास बात यह है कि सरकारी अफसरों में इस बीच यह प्रवृत्ति तेजी से बढ रही है । कुछ महीने पहले एक जिले के बड़े कप्तान साहब बावर्दी सांसद राम गोपाल यादव के झुक कर पैर छूते कैमरों में कैद हुये थे ।
अभी इटावा में एक पीसीएस और एक पीपीएस अफसर शिव पाल की चरण रज लेते पकड़ लिये गये। मंत्री जी ने यह बताने के लिए पत्रकारों को बुलाया था कि अईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को बालू माफिया के दबाव में नहीं साम्प्रदायिक तनाव फैलाने में सस्पेंड किया गया है। उनसे अफसरों के उनके पैर छूने के बारे में पूछ लिया गया । वह पूरी तैयारी से थे । उन्होंने उल्टे पत्रकारों की ओर सवाल उछाल दिये- किसी को पैर छूने से कैसे रोका जा सकता है। अब सतीश मिश्र मायावती के पैर छूते थे तो उन्हें मैंने रोक लिया या आपने ?
यह कहते ही मंत्री जी के चेहरे पर अंतिम गेंद पर विजयी छक्का मारने से भी अधिक परम विजयी भाव , तीक्ष्ण ब्यंग्य -विद्रूप भरी मुस्कान और एक तीर से कई मैदान मार लेने वाला परम आत्म मुग्धता के आनंद भाव का ऐसा रस सागर उभरा कि हें हें कर उसमें गोते लगाने लगे। पैर छूना किसी को आदर, श्रद्धा -सम्मान देने का सूचक है। बड़ा है या अपने विचार, कार्य व्यवहार से आदरणीय है तो पैर छूना ठीक है। लेकिन चमचागीरी में, स्वार्थ साधन के लिए मन ही मन गालियां देते- कोसते पैर छूना अनुचित है। फिर अफसरों का सार्वजनिक रूप से किसी नेता के पैर छूना तो इससे भी अधिक निंदनीय है।
शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.





