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सनकी और अकड़ू नहीं होता तो पन्द्रह साल पहले इस पद पर पहुंच जाता

Krishan Bhanu :  कल, 10 फरवरी को पूरे 55 का हो जाऊंगा। 55 के होते ही पत्रकारिता जीवन के भी 32 साल पूरे हो गए हैं। सफर अदभुत और अविस्मरणीय रहा। ‘वीरप्रताप’ से 1979 में सफर शुरू किया। उसके बाद पंजाब केसरी दिल्ली, हिमाचल टाइम्स देहरादून, अजीत समाचार, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भास्कर और अमर उजाला से होते हुए आज ’हिमाचल आजकल’ में पत्रकारिता के सर्वोच्च पद पर हूँ। मैं जानता हूँ, मुझे मेरे मित्र सनकी और अकड़ू कहते हैं। मैं हूं भी। यह मेरी पहचान है जो मुझे दूसरों से अलग करती है। सनकी और अकड़ू नहीं होता तो पन्द्रह साल पहले इस पद पर पहुंच जाता।

Krishan Bhanu :  कल, 10 फरवरी को पूरे 55 का हो जाऊंगा। 55 के होते ही पत्रकारिता जीवन के भी 32 साल पूरे हो गए हैं। सफर अदभुत और अविस्मरणीय रहा। ‘वीरप्रताप’ से 1979 में सफर शुरू किया। उसके बाद पंजाब केसरी दिल्ली, हिमाचल टाइम्स देहरादून, अजीत समाचार, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भास्कर और अमर उजाला से होते हुए आज ’हिमाचल आजकल’ में पत्रकारिता के सर्वोच्च पद पर हूँ। मैं जानता हूँ, मुझे मेरे मित्र सनकी और अकड़ू कहते हैं। मैं हूं भी। यह मेरी पहचान है जो मुझे दूसरों से अलग करती है। सनकी और अकड़ू नहीं होता तो पन्द्रह साल पहले इस पद पर पहुंच जाता।

मैं मन की हत्या नहीं कर सकता। जो अच्छा लगता है, वहीं कहता हूँ। जो ठीक लगता है वही करता हूँ। इस अदभुत प्रवृत्ति के कारण

किशन भानु

बहुत बार गर्दिश में रहा, लेकिन फिर उदय हुआ और फिर चमन रौशन किया। ‘फिनिक्स’ की तरह जीता हूँ। जब मन किया जलकर राख हो गया और जब चाहा, अपनी राख से फिर जीवित हो उठा। उड़ा और आसमान की ऊंचाइयों, पाताल की गहराइयों को नापने लगा। अब तक के सनकीपन जीवन से संतुष्ट हूँ, लेकिन सफर अभी खत्म नहीं हुआ। मुझे और उड़ना है। चांद को छूना है। सनकी और अकड़ू होने के कारण जीवन में क्या कुछ खोना पड़ा, मैंने कभी हिसाब ही नहीं किया। मैं बनिया नहीं हूँ। श्रमजीवी पत्रकार के पास ऐंठ के सिवा और कुछ होता भी नहीं है। यही उसकी पहचान और वास्तविक सम्पत्ति है। बहुत सहमत होंगे और अनेक असहमत भी, लेकिन मैं अपनी राय नहीं बदलूंगा।

फेसबुक से साभार.

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