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समझदारों का पागलखाना

कभी-कभी ऐसा होता है जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें और उन्हें कभी भूल न पाएं। यह जरूरी नहीं कि हम उनका नाम जानें और वे बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति हों। उनका इनसान होना भी जरूरी नहीं है। जैसा कि वे चार उल्लू, जो रात को घर आते वक्त मुझे रास्ते में मिलते थे। वे किसी सैनिक की तरह लाइन बनाकर एक दीवार पर बैठते थे। उनमें से जो सबसे मोटा था, शायद वह उनका कमांडर था। एक दिन मैंने उनकी गिनती की तो उनमें से एक उल्लू गायब मिला। मुझे बहुत फिक्र हुई। बाद में मैंने अनुमान लगाया कि शायद उल्लुओं के बीच साप्ताहिक अवकाश का कोई समझौता हो गया है। उल्लू मुझे बहुत पसंद हैं। खासतौर से उनका चेहरा। वे स्वभाव से ही मुझे जिज्ञासु लगते हैं। उनके काम का तरीका पूरी दुनिया से अलग है।

कभी-कभी ऐसा होता है जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें और उन्हें कभी भूल न पाएं। यह जरूरी नहीं कि हम उनका नाम जानें और वे बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति हों। उनका इनसान होना भी जरूरी नहीं है। जैसा कि वे चार उल्लू, जो रात को घर आते वक्त मुझे रास्ते में मिलते थे। वे किसी सैनिक की तरह लाइन बनाकर एक दीवार पर बैठते थे। उनमें से जो सबसे मोटा था, शायद वह उनका कमांडर था। एक दिन मैंने उनकी गिनती की तो उनमें से एक उल्लू गायब मिला। मुझे बहुत फिक्र हुई। बाद में मैंने अनुमान लगाया कि शायद उल्लुओं के बीच साप्ताहिक अवकाश का कोई समझौता हो गया है। उल्लू मुझे बहुत पसंद हैं। खासतौर से उनका चेहरा। वे स्वभाव से ही मुझे जिज्ञासु लगते हैं। उनके काम का तरीका पूरी दुनिया से अलग है।

नेचुरोपैथी की पढ़ाई के दौरान मिले एक अंकल का चेहरा आज तक मेरी यादों में ताजा है। मैं उनका नाम नहीं जानता, फिर भी हजारों की भीड़ में उन्हें पहचान सकता हूं। वे एक रिटायर्ड फौजी हैं। उन्हें राजनेता पसंद नहीं थे। इसके बजाय वे राजाओं के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने मुझे एक ऐसे राजा की कहानी सुनाई जिसने चोरी हुआ पांच किलो घी सिर्फ आधा घंटे में ढूंढ़ लिया। उनका मानना था कि दुनिया को अब भी राजा के शासन की ही जरूरत है। वे महाराजा अशोक, विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य को बेहद पसंद करते थे। उनका एक सपना पहले महायुद्ध में शामिल होने का था, जो कभी पूरा नहीं हो सका।

इसी तरह स्कूली दिनों के एक अध्यापक मुझे अच्छी तरह याद हैं। उनका नाम मामचंद जी था। हम बातचीत में उन्हें मामा जी कहते थे। शुरुआत में वे विज्ञान पढ़ाते थे। बाद में उन्होंने हिंदी पढ़ाने का अभ्यास किया। हिंदी में जब बात नहीं बनी तो गणित में हाथ आजमाया। एक दिन वे नहीं आए। हम उनका इंतजार करते रहे। उसके बाद वे कभी नहीं आए। कुछ दिनों पहले मैंने उन्हें गूगल और फेसबुक पर तलाशने की कोशिश की। वे वहां भी नहीं मिले। अगर वे कभी मुझे रास्ते में मिले तो उनसे शिकायत करूंगा कि उन्होंने गणित की जो प्रश्नावली अधूरी छोड़ी थी, उसकी वजह से कई बच्चे परीक्षा में उसका सवाल छोड़कर आ गए। मैं उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद कहना चाहूंगा कि बच्चों की पिटाई में उनकी कोई रुचि नहीं थी।

यहां मैं एक दिलचस्प बात और बताना चाहता हूं। यह मुझे मेरे एक दोस्त ने बताई थी। तब वह एक सरकारी स्कूल का छात्र था। उनके विज्ञान के टीचर बहुत क्रोधी थे। जब उन्हें गुस्सा आता तो बच्चों की बेरहमी से पिटाई करते। एक बार स्कूल के बच्चे और सभी टीचर शिमला घूमने गए। शाम होने के बाद मौसम खराब होने लगा तो उन्हें स्थानीय प्रशासन ने अपनी होटल में लौट जाने का निर्देश दिया। थोड़ी देर बाद दो पुलिसकर्मी आए और उन्होंने सभी बच्चों को जाने के लिए कहा। तभी विज्ञान के टीचर आ गए और पुलिस से बहस करने लगे। बात बढ़ती देख एक पुलिसकर्मी ने उन्हें डंडा जमा दिया। टीचर बोले- ‘मैं सरकारी कर्मचारी हूं।’

इस पर पुलिसकर्मी बोला – ‘मैं भी सरकारी कर्मचारी हूं।’ और उसने टीचर को एक डंडा और लगा दिया। इस घटना के चश्मदीद गवाह वे बच्चे थे जो अब तक टीचर के हाथों स्कूल में असंख्य बार बुरी तरह पिट चुके थे। यह बात तत्काल जंगल की आग की तरह फैल गई। कुछ बच्चों ने इसे तिल का ताड़ बनाकर अपने दोस्तों को बताया। मालूम हुआ कि शिमला से लौट आने के बाद टीचर का स्वभाव बदल गया और उन्होंने बच्चों को पीटना हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब वे एक अच्छे और दयालु अध्यापक बन चुके थे।

चलते-चलते

दुनिया को समझ पाना असंभव नहीं तो भी बहुत-बहुत मुश्किल है। इतना मुश्किल कि मैं इसे अब तक असंभव ही मानता आया हूं। मेरा मानना है कि दुनिया एक बहुत बड़ा स्कूल है, जिसमें हम सभी छात्र हैं। यहां हमें कितनी क्लास पास करने का मौका मिलता है, यह कोई नहीं जानता। लेकिन इस स्कूल की एक खासियत इसे अलग बनाती है। यहां और स्कूलों की तरह परीक्षा का कोई तय टाइम टेबल नहीं होता। किसी भी वक्त परीक्षा की घोषणा हो सकती है। यह पूरी तरह विद्यार्थी पर निर्भर करता है कि वह कितने सवाल कैसे हल करता है। असल में दुनिया समझदारों का पागलखाना है। इनसान की एक आदत और होती है। वह जैसा नहीं होता है, वैसा दिखने की कोशिश करता है। जबकि हकीकत इससे ठीक अलग होती है। यहां सब पागल हैं। कोई कम, तो कोई ज्यादा। अगर आपको यकीन न हो तो मेरे साथ एक कप कॉफी की शर्त लगा सकते हैं।

राजीव शर्मा

संचालक

गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

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