Rakesh Kumar Singh : रे रकेसबा, इ वाला कहावत सुने हो? सुनो और थोड़ा इसका मतलब समझाओ: 'नामे नाम न त अकरौले नाम'. धुत मरदे, इ त हम लड़कपने से सुनते आ रहे हैं. यही न हुआ माने इसका हो: ‘अच्छा करके भी नाम होता है और बुरा करके भी’. वाह बेटा! साला तुम तो मेरे चच्चा से भी बड़का लाल बुझक्कड़ निकल गया रे. तो सुनो बेटा, तुम समेत तुम्हारा सेकुलर फेसबुक फरेन्ड सब मोदी को लेके यही कर रहा है. वोट चाहे जितना मिले उसको, ससुर उ पीएम बने चाहे पीएम के पीअन या कुछ और, या कुछ भी नहीं; लेकिन तुमलोग उसका ख्याति (और कुख्याति) में चार क्या, चालीस चांद लगा रहे हो! समझे!
किरण फूटने से लेकर रात के तीसरा पहर तक तुम्हारा भूत, वर्तमान और भावी मिशनरी साथी लोग एक स्वर से ‘फेकूआ’ के नाम पर कै-दस्त करता रहता है. बड़ा-बड़ा नाला-पतनाला का प्रवाह टूटने नहीं देता है तुम लोग. इधर देखो – पच्च! उधर देखो – पच्च! माने गर्दन तक गच्च! उ बेचारा मोदी मार्का भजन मंडली सब के लिए ये तो महामना के प्रति निष्ठा और समर्पण साबित करने का टाइम है, जो कि डिफिकल्ट है. वैसे भी बच्चा, दिहाड़ी वाला लोग सब को जितना कार्य सौंपा गया है उतना तो उ सब को करना न होगा जी. बाकी तुम्हारा मिशनरी दोस्त लोग की ओर से श्रीमन् मोदी के सापेक्ष और समानंतर कांग्रेसियों की जितनी-लानत मलानत होनी चाहिए थी, उसमें आश्चर्यजनक कंजूसी दृष्टिगोचर हो रही है बच्चा! अब तुम अपवादी पोस्ट गिन के फेहरिस्त लंबा करने का जुगत न बैठाने लगना, समझे!
बताओ न, गलत होगा कहना कि जितना बड़ा तबका को दोनों से दिक़्क़़त है, उसकी ओर से किसी और विकल्प का प्रस्ताव आए? जितना मेहनत और जितना ज़्यादा समय मोदियापे-फोदियापे में और बचा-खुचा को दिगियापे और मनमौनिंग पर जियान किया जा रहा है, उससे तो यही लगता है मानो अबकी सैंयाजी फेविकोल से चिपकाइए के मानेंगे! बेटा, उतना काल और श्रम झोंक कर तो संभवत: किसी और राग का अनवेषण किया जा सकता है, अलग किस्म के हलचल की पृष्ठभूमि तैयार की जा सकती है.
माने, ये मेरा, मेरा अर्थात् सुलच्छन बेलूरा, बल्द हिलकोरे लाल, ग्राम-पोस्ट: कल्पना गंज, जिला: मौजाबाद का नितांत निजी राय है. इसको वैसे ही मुंहपुस्तक पर ठेल दो, जैसे तुम्हारे जैसन का राय उहां प्रस्फुटायमान, रिरियायमान, फुसफुसायमान, और टिमटिमायमान हुआ फिरता है. समझे रे भकचोन्हरा? जी चच्चा.
राकेश कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.






