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समाजशास्‍त्र और साहित्‍य के बीच संबंध आवश्‍यक : नामवर सिंह

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में समाज के सभी तबकों को किस प्रकार बराबरी का हक दिलाया जाए और पूरी दुनिया में कैसे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम हो विषय पर आयोजित पांच दिवसीय 35वें राष्‍ट्रीय सामाजिक विज्ञान अधिवेशन की समाप्ति विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह के अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ शनिवार को हुई। अपने संबोधन के दौरान प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि समाजशास्त्र और साहित्य दोनों विषय में संबंध स्थापित किया जाना आवश्‍यक है।

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में समाज के सभी तबकों को किस प्रकार बराबरी का हक दिलाया जाए और पूरी दुनिया में कैसे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम हो विषय पर आयोजित पांच दिवसीय 35वें राष्‍ट्रीय सामाजिक विज्ञान अधिवेशन की समाप्ति विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह के अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ शनिवार को हुई। अपने संबोधन के दौरान प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि समाजशास्त्र और साहित्य दोनों विषय में संबंध स्थापित किया जाना आवश्‍यक है।

उन्होंने कहा कि भारतीय ग्राम्य जीवन के बारे में ‘विलेज इंडिया’ नामक समाजशास्त्र की पुस्तक से ज्यादा अच्छा ग्राम्य जीवन का वर्णन प्रेमचंद के साहित्य में मिलता है। सामाजिक विज्ञान अधिवेशन के विषय ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुत पुराना विषय है लेकिन आज तक कोई सार्थक परिणाम नहीं दे पाया। उन्होंने कहा कि कोई भी समाजाशास्त्र अपने ज्वलंत प्रश्‍नों और चुनौतियों के बदौलत ही महत्ता पाता है। इसलिए आवश्‍यक है कि सभी समाजशास्त्र के विषयों को साहित्य के साथ जोड़ा जाए ताकि समाज में शांति और सहअस्तित्व कायम हो सके। उन्होंने कहा कि यूरोप और अन्य पूर्व के समाजशास्त्रियों ने जितना काम किया है, उससे कहीं ज्यादा काम भारत में किए जाने की आवश्‍यकता है लेकिन हो नहीं पा रहा है। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो समाजशास्त्र नख-दंत विहीन विषय हो जाएगा।

समापन सत्र को संबोधित करते हुए विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ. विभूति नारायण राय ने कहा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए वर्धा और हिंदी विश्‍वविद्यालय से उपयुक्त स्थान कोई और दूसरी जगह नहीं हो सकती थी। उन्होंने कहा कि सहअस्तित्व का मूल स्वर है कि अगर दुनिया में सचमुच शांति स्थापित करनी है तो सभी को बराबर नजरिए से देखना होगा। उन्होंने बाहर से आए अतिथियों के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि जिन शोधार्थियों ने विभिन्न विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए हैं वे उनके प्रति सचमुच आभारी हैं।

इस दौरान भारतीय सामाजिक विज्ञान कांग्रेस के स्थानीय सचिव और विश्‍वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. मनोज कुमार ने बाहर से आगत शोधार्थियों और शिक्षकों का आभार माना। इस दौरान मंच पर महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन, रजिस्टार कैलाशी जी. खामरे, भारतीय सामाजिक विज्ञान अधिवेशन के सचिव प्रो. एन. के. चौबे, चीफ रिपोर्टिंग कमेटी के सदस्य के. एस. राव, सामाजिक विज्ञान अधिवेशन के सचिव प्रो एन.पी. चौबे और अध्यक्ष के. करूणाकरण उपस्थित थे। इस दौरान 36वें सामाजिक विज्ञान अधिवेशन के लिए संतोष कर को अध्यक्ष के रूप में चुना गया, जबकि विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह जी का स्वागत कुलपति विभूति नारायण राय ने उनको सूती की माला पहनाकर किया। इस दौरान 35वें सामाजिक विज्ञान के आयोजन के लिए अध्यक्ष के. करूणाकरण हिंदी विश्‍वविद्यालय का आभार माना। इस दौरान भारी संख्या में पूरे देश से आए 300 से ज्यादा प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्रा-छात्राएं उपस्थित थे।

इससे पहले भारतीय ग्रामीण समाज में किस तरह से बराबरी कायम की जाए विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। जिसमें तमिलनाडु के आर. ए. एलंगों के पंचायत के माडल दिखाए गए। एलंगों ने 1996 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर पंचायतों में समानता लाने के उद्देश्‍य से काम करना शुरू किया था, जिसके परिणामस्वरूप उनके इलाके के 49 गांव माडल विलेज में तब्दील हो गए हैं। उन्होंने बताया कि जिन गांवों में बिजली के साधन नहीं थे, अब वही गांव स्वउद्यम के बल पर 350 मेगावाट बिजली पैदा कर रहे हैं। इससे गांवों को पर्याप्त बिजली भी मिल रही है और गांव के लोग बिजली बेचकर गांवों के विकास में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान भारतीय तकनीक संस्थान के विद्वान और लखनउ विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. डा. आर. पी. सिंह, के. करूणाकरण इत्यादि उपस्थित थे। प्रेस रिलीज

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