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सरकार में खबरों के लिए जिम्मेदार हरीश खरे को अपने ही जाने की खबर नहीं थी

अजब हालत है कि जो व्यक्ति सरकार में खबरों के लिए जिम्मेदार था, उसे खुद अपनी छुट्टी होने की खबर नहीं थी. प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पद से हरीश खरे को हटाने का फैसला छह महीने पहले किया जा चुका था. सरकार के विचारों को जनता में पहुंचाने में उनकी नाकामी से कांग्रेस नेतृत्व खफा था.

अजब हालत है कि जो व्यक्ति सरकार में खबरों के लिए जिम्मेदार था, उसे खुद अपनी छुट्टी होने की खबर नहीं थी. प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पद से हरीश खरे को हटाने का फैसला छह महीने पहले किया जा चुका था. सरकार के विचारों को जनता में पहुंचाने में उनकी नाकामी से कांग्रेस नेतृत्व खफा था.

लेकिन 19 जनवरी को जब पंकज पचौरी को संचार सलाहकार यानी कम्युनिकेशन एडवाइजर नियुक्त किया गया, तब भी खरे को बात समझ में नहीं आई. शायद उन्होंने यह सोचा हो कि चूंकि उनका दर्जा सेक्रेटरी स्तर का है और पचौरी को एडीशनल सेक्रेटरी के स्तर पर रखा गया है, तो पचौरी उन्हीं के मातहत काम करेंगे. खरे ने अंततः इस्तीफा तब दिया, जब उनसे यह कह दिया गया कि पचौरी सीधे प्रिंसिपल सेक्रेटरी पुलक चटर्जी को रिपोर्ट करेंगे. नई कमान श्रृंखला में खरे के लिए कोई जगह नहीं थी.

एक कैबिनेट मंत्री के अनुसार, खरे ने सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल से मदद की गुहार की थी. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि पटेल ने उनसे क्या कहा, लेकिन 10 जनपथ से उन्हें एक संदेश जरूर मिला. उनसे कहा गया कि अगर वे चुपचाप चले जाते हैं, तो उन्हें इसके एवज में कुछ मिल सकता है. ठीक वैसे ही जैसे अटल बिहारी वाजपेयी के पूर्व मीडिया सलाहकार एच.के. दुआ को पद संभालने के दो साल बाद 2001 में जब प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर किया गया, तो इसके ऐवज में दो साल बाद उन्हें डेनमार्क में भारत का राजदूत बना दिया गया था.

मीडिया के प्रति खरे की नफरत जग जाहिर है. टाइम्स नाऊ टेलीविजन चैनल के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को उन्होंने जिस तरह झिड़का था, वह देश भर की मीडिया पर सीधा प्रसारित हुआ था. 16 फरवरी, 2011 को खरे ने प्रधानमंत्री और टीवी संपादकों की एक मुलाकात रखी थी. जब गोस्वामी ने एक के बाद दूसरा सवाल किया, तो खरे ने उन्हें यह कहते हुए चुप कर दिया कि ''यहां प्रधानमंत्री से जिरह नहीं चल रही है.'' इसके पहले तक सारे सवालों का सीधे सामना करते नजर आ रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अचानक ऐसे नजर आने लगे, जैसे वे कुछ छिपाना चाह रहे हों.

प्रिंट मीडिया के पत्रकारों की तो और भी जबरदस्त मलामत होती थी. प्रधानमंत्री की आलोचना की तो कभी-कभार अनदेखी हो जाती थी, लेकिन प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार की आलोचना की सजा के तौर पर पत्रकार पीएमओ से बेदखल ही कर दिए जाते थे. यह बात अहम है कि पचौरी चटर्जी को रिपोर्ट करेंगे, न कि प्रधानमंत्री को, जैसा कि कायदा रहा है. चटर्जी सोनिया और राहुल गांधी से अपनी नजदीकी के लिए जाने जाते हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय में उनकी मौजूदगी को साउथ ब्लॉक पर 10 जनपथ की बढ़ती पकड़ के तौर पर देखा जा रहा है. यूपीए के पहले कार्यकाल में, जब मनमोहन ने अपने मित्र के बेटे संजय बारू को अपने मीडिया सलाहकार के तौर पर चुना था, तो उन्हें सिर्फ एक काम सौंपा गया था.

बारू बताते हैं कि ''मैंने प्रधानमंत्री से पूछा था कि मुझ्से उनकी क्या उम्मीदें हैं, तो उन्होंने कहा था कि मैं चाहता हूं तुम मेरे आंख और कान बनो. बिना भय या पक्षपात के मुझे वह बताओ, जो तुम्हारी समझ से मेरे लिए जानना जरूरी हो.'' अब यही काम पचौरी करेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री के लिए नहीं, चटर्जी के लिए.

टेलीविजन संपादक रहे पचौरी से उम्मीद है कि वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पल-पल की जरूरतों को खरे की तुलना में कहीं बेहतर ढंग से समझेंगे. बारू कहते हैं, ''मीडिया सलाहकार की भूमिका समय-समय पर बदलती रहती है. एच.वाइ. शारदा प्रसाद (इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार) ने एक बार मुझे बताया था कि उनका वास्ता पांच संपादकों से पड़ता था जबकि मैं 300 टीवी चैनल और अखबारों से वास्ता रखता था.'' मूल मकसद है कि प्रधानमंत्री चर्चा में रहें. खरे के निजाम में प्रधानमंत्री कार्यालय चुप्पी का शिकार हो गया, जिससे यह संदेश जा रहा था कि मनमोहन कुछ नहीं करते.

पचौरी ने जो सबसे पहला काम किया है वह प्रधानमंत्री कार्यालय को ट्वीटर पर लाने का है. कानून मंत्री सलमान खुर्शीद स्वीकार करते हैं कि सरकार ने सोशल मीडिया को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं किया है. पचौरी का पहला ट्वीट था राष्ट्रीय दक्षता विकास परिषद की प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों के साथ मुलाकात का. एक और ट्वीट में पचौरी लिखते हैं, ''देश के कुछ सबसे बहादुर बच्चों से मुलाकात का इंतजार है. गणतंत्र दिवस की परेड में उन्हें हमेशा हाथियों पर बैठे देखा करता था.''

पचौरी अपने पूर्ववर्तियों जितने वरिष्ठ नहीं हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेस सलाहकार रहे पूर्व पत्रकार अशोक टंडन के मुताबिक, ''इससे प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआइबी) का महत्व बढ़ सकता है.'' ऐसे में, पचौरी को सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के साथ तालमेल रखकर काम करना होगा. खरे तो हंसमुख मिजाज सोनी को भी नाराज कर बैठे थे. उन्होंने टेलीविजन संपादकों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए पहले सोनी को निमंत्रण दिया और फिर वापस ले लिया था. कांग्रेस के एक महासचिव के अनुसार, सूचना एवं प्रसारण मंत्री से कहा गया कि कमरे में ''इतनी जगह नहीं है'' कि उन्हें भी स्थान दिया जा सके. राजनैतिक तौर पर चतुर सोनी ने अपनी जगह खुद बना ली. कुछ महीने बाद, मई, 2011 में प्रधानमंत्री को उन्होंने इस बात के लिए राजी कर लिया कि मीडिया को संभालने के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया जाए.

प्रेस सलाहकार के कामों का अहम हिस्सा होता है-मीडिया में प्रधानमंत्री का प्रचार करना. टंडन बताते हैं , ''प्रधानमंत्री से मिलने का मौका मिल पाना सबसे अहम होता है. हम विदेश यात्राओं पर साथ जाने के लिए संपादकों को प्रोत्साहित करते थे. विमान में हर एक को प्रधानमंत्री के साथ आधे घंटे तक बातचीत का मौका मिलता था. इसमें वे जो चाहें बातचीत कर सकते थे.''

वे यह बताते हुए मुस्करा देते हैं कि ''कुछ मामलों में तो संपादक लोग राज्‍यसभा की सीट के लिए अपनी पैरवी भी कर डालते थे.'' टंडन कुछ लोगों की तुलना में इस लिहाज से भाग्यशाली थे कि वाजपेयी मीडिया के पसंदीदा थे. दुआ एच.डी. देवगौड़ा के भी मीडिया सलाहकार थे. वे यह याद करते हुए फीकी-सी हंसी हंसते हैं कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री

जी-15 की बैठक में हरारे की यात्रा पर गए थे और साथ में अपने 15 रिश्तेदारों को ले गए थे, तब प्रेस ने इस जत्थे को ''गौड़ा का जी-15'' कहा था. दुआ पूछते हैं, ''जो व्यक्ति कैमरों के सामने विज्ञान भवन में खर्राटे भरता हो, उसकी छवि आप कैसे निखारेंगे?''

मनमोहन के सलाहकारों को सत्ता के दो केंद्रों-10 जनपथ और 7 रेसकोर्स रोड-के बीच संतुलन बैठाना होता है. सुगबुगाहट यह है कि खरे के लैपटॉप की हाल में हुई चोरी का मूल मकसद था उनकी मेल को हैक करके कांग्रेस के नेताओं के बारे में उनके विचारों को जानना. अगर सचमुच ऐसा था, तो चोर को इतनी जहमत उठाने की कोई जरूरत नहीं थी.

खरे ने सोनिया के प्रति अपनी नापसंदगी को कभी नहीं छिपाया. 6 सितंबर, 2000 को द हिंदू में खरे ने इस बात का मजाक बनाया था कि ''सोनिया गांधी के नानी बनने पर बधाई देने 10 जनपथ पहुंचे प्रशस्ति गाने वाले जत्थे का नेतृत्व मनमोहन सिंह ने किया.'' सितंबर, 2010 में, पुस्तक विमोचन के एक कार्यक्रम में, खरे ने कहा, ''कांग्रेस यथास्थितिवादी पार्टी है. यह किसी सिद्धांत में विश्वास नहीं करती है.'' हरीश खरे के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, पचौरी का एक साधारण-सा ट्वीट मीडिया तक पहुंचने की दृष्टि से चमत्कार माना जाएगा. साभार : इंडिया टुडे

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