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सरकार, सरबजीतों को यों मरने न दें

सरबजीत सिंह अगर भारतीय जासूस होता या आतंकवादी होता तो क्या हमारी सरकार को पता नहीं होता? सरकार को सरबजीत के बारे में सब कुछ पता था| पता ही नहीं था, उसे गहरा विश्वास था कि वह जासूस नहीं था और लाहौर में हुए बम विस्फोट से उसका कुछ लेना-देना नहीं था| यह तथ्य सरबजीत की हत्या के बाद आए प्रधानमंत्री और विदेश सचिव के बयानों से भी सिद्ध होता है तो फिर क्या वजह है कि सरबजीत की रिहाई और रक्षा के प्रति हमारी सरकार ने इतना ढुल-मुल रवैया अपना रखा था? पहचान की गड़बड़ी के कारण असली अपराधी मंजीत सिंह छूट गया और उसकी जगह सरबजीत फंस गया| उसने 22 साल कोट लखपत की जेल में काट दिए और अब उसकी हत्या भी हो गई| इस नृशंस कांड के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

सरबजीत सिंह अगर भारतीय जासूस होता या आतंकवादी होता तो क्या हमारी सरकार को पता नहीं होता? सरकार को सरबजीत के बारे में सब कुछ पता था| पता ही नहीं था, उसे गहरा विश्वास था कि वह जासूस नहीं था और लाहौर में हुए बम विस्फोट से उसका कुछ लेना-देना नहीं था| यह तथ्य सरबजीत की हत्या के बाद आए प्रधानमंत्री और विदेश सचिव के बयानों से भी सिद्ध होता है तो फिर क्या वजह है कि सरबजीत की रिहाई और रक्षा के प्रति हमारी सरकार ने इतना ढुल-मुल रवैया अपना रखा था? पहचान की गड़बड़ी के कारण असली अपराधी मंजीत सिंह छूट गया और उसकी जगह सरबजीत फंस गया| उसने 22 साल कोट लखपत की जेल में काट दिए और अब उसकी हत्या भी हो गई| इस नृशंस कांड के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

पहली जिम्मेदारी तो पाकिस्तान सरकार की ही है| सरबजीत के पाकिस्तानी वकील अवैस अहमद शेख का कहना है कि उसे पूरा विश्वास है कि सरबजीत बिल्कुल बेकसूर है| उसका केस वह इसीलिए लड़ रहे थे कि उसे न्याय मिले| वह पैसे या प्रसिद्धि के लिए नहीं लड़ रहे थे| शेख को बहुत जुल्म भी सहने पड़े लेकिन उन्होंने सरबजीत की आखरी सांस तक उसका साथ दिया| पाकिस्तानी सरकार भी सरबजीत के प्रति दया प्रदर्शित करना चाहती थी लेकिन जनमत के दबाव के आगे उसे झुकना पड़ा| राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी ने रिहाई की दया-याचिका को टाल दिया| लेकिन अप्रैल 2008 में होनेवाली फांसी भी टल गई| पिछले साल अप्रैल में जब ज़रदारी अजमेर-यात्रा पर आए थे, उस वक्त यदि हमारे प्रधानमंत्री उनसे आग्रह करते तो सरबजीत छूट सकता था| ज़रदारी को समझाया जा सकता था कि हमारी सरकार पाकिस्तानी नागरिक डॉ. खलील चिश्ती को क्षमा-दान कर रही है| चिश्ती हत्या के अपराधी थे| चिश्ती के बदले सरबजीत को छोड़ने पर पाक जनता की प्रतिक्रिया उतनी उग्र नहीं होती| लेकिन हमारी सरकार ने वह अवसर खो दिया| ज़रदारी ने चिश्ती की रिहाई का आग्रह किया लेकिन मनमोहन सिंह चूक गए| यदि सरबजीत कोई प्रसिद्घ डॉक्टर या कूटनीतिज्ञ या नेता-पुत्र होता तो उसकी रिहाई की पहल प्रधानमंत्री शायद खुद करते लेकिन भारत और पाकिस्तान का चरित्र इस मामले में एक-जैसा ही है| अगर कोई आदमी मामूली है तो बेकसूर होने पर भी वह फंसा लिया जाता है और अगर वह 'भद्रलोक' है तो कसूरवार होने पर भी वह बच निकलता है| क्या हम इटली की सरकार से कुछ सीखेंगे, जिसने अपने दो मामूली सिपाहियों के लिए अपनी सरकार को ही खतरे में डाल लिया था?

पाकिस्तान की सरकार ने सरबजीत की हत्या करवाई हो, ऐसे प्रमाण तो नहीं हैं लेकिन जिम्मेदारी तो उसके सिर ही आएगी| जिस कैदी ने इतनी लंबी जेल काट ली हो, जो विदेशी हो और इतना चर्चित हो, उसकी सुरक्षा का जैसा लचर इंतजाम जेल में था, उसी का नतीजा है कि जेल में उसकी हत्या हो गई| हत्याएं रोकने के लिए जेल बनी हैं और उनमें ही किसी की हत्या हो जाए तो प्रश्न उठता है कि सरकार क्या कर रही है? बिना जेल अधिकारियों की जानकारी या मिलीभगत, इतना गंभीर अपराध जेल के अंदर कैसे हो सकता है? कार्यकारी मुख्यमंत्री नजम सेठी जांच करवा रहे हैं और हत्यारों पर मुकदमा भी दायर हो गया है लेकिन इस घटना से पाकिस्तानी राज्य की क्या छवि बनती है? भारत में अजमल कसाब भी जेल में था| उसकी सुरक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए और उसे पूर्ण न्यायिक सुविधाएं भी दी गईं| अन्तराष्ट्रीय कानून का सम्मान हुआ लेकिन पाकिस्तान में क्या हुआ? उसका अंदरुनी कानून भी टूटा और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि भी खराब हुई| अगर सरबजीत के घायल होते ही पाकिस्तान उसे हवाई एम्बुलेंस से भारत भिजवा देता और भारत के साथ पूर्ण कूटनीतिक सहयोग करता तो भारत की जनता के घावों पर कुछ मरहम लगता लेकिन लगता है कि भारत सरकार को भी जितना जोर लगाना चाहिए था, उसने नहीं लगाया| यह ठीक है कि भारत ले आने पर भी शायद सरबजीत बच नहीं पाता लेकिन उससे दोनों सरकारों की इज्जत तो बच जाती| अब मरने के बाद पंजाब सरकार ने उसे राजकीय सम्मान दिया और भारत सरकार ने शव लाने के लिए विमान दिया तो सरबजीत के जीते जी भी कुछ ठोस करना चाहिए था या नहीं? सरबजीत की बहन दलबीर कौर का गुस्सा दोनों सरकारों के प्रति है और वह जायज़ है|

लेकिन भारत और पाकिस्तान की जेलों में एक नहीं, सैकड़ों सरबजीत सिंह फंसे हुए हैं| बेकसूर मछुआरे, सीमांतवासी किसान और मजदूर और कई छोटे-मोटे अपराधी दोनों देशों की जेलों में बरसों से सड़ रहे हैं| उनका कोई वली-वारिस नहीं है| उनका कोई वकील नहीं है| वे किसी अदालती फैसले के बिना ही जेल काट रहे हैं| पाकिस्तान की जेलों से छूटे हुए कुछ भारतीय कैदियों के कथन पर विश्वास करें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं| उनके साथ पशुओं से भी बुरा बर्ताव किया जाता है| आखिर उनकी सुध कौन लेगा? क्या सिर्फ अंसार बर्नी जैसे लोग ही बचे हैं, इस नेक काम के लिए? सरबजीत की बहन ने उसकी रिहाई के लिए 25 करोड़ रु. मांगने का आरोप बर्नी पर लगाया है| इस आरोप पर सहसा विश्वास नहीं होता लेकिन बर्नी जैसे मददगार और दयालु मित्र् पर दलबीर कौर ऐसा प्रतिष्ठानाशक आरोप क्यों लगाएगी? यह आरोप शायद पाकिस्तान की न्याय और शासन-व्यवस्था के वास्तविक स्वरुप को उदघाटित करता है| सरबजीत-कांड के बाद अब दोनों देशों को अपनी-अपनी जेलों में एक-दूसरे के कैदियों की विशेष सुरक्षा का इंतजाम करना होगा| यह तो तात्कालिक कार्रवाई हुई, लेकिन बुनियादी काम तब होगा जबकि दोनों राष्ट्रों का कोई संयुक्त न्यायिक आयोग तुरंत स्थापित किया जाए, जो एक-दूसरे के कैदियों को शीघ्रातिशीघ्र न्याय दिलवाने की कोशिश करे| अभी तो हालत यह है कि कैदियों के बारे में उनके परिवार के लोगों को ही पता नहीं चलता कि वे कहां हैं| क्यों नहीं, दोनों देश एक-दूसरे के कैदियों के विवरण वेबसाइटों पर तुरंत डलवाने का प्रबंध करें?

इधर सरबजीत की हत्या और एक भारतीय सिपाही का सिर काट डालना, इन दोनों घटनाओं का भारतीय जन-मानस पर गहरा असर हुआ है| भारत के नीति-निर्माता लोगों को पता है कि पाकिस्तान के नेतागण अपनी फौज और उग्रवादी अपराधी तत्वों के सामने असहाय हो जाते हैं लेकिन सामान्य जनता तो यह मानती है कि यह सब कुछ पाकिस्तानी सरकार के इशारे पर होता है| यह कलंकित छवि तभी सुधर सकती है, जबकि पाकिस्तान की ताकतवर और स्वतंत्र अदालतें इन गंभीर अपराधियों को कड़ी सजा तुरंत दे और उनका प्रचार दोनों देशो में अच्छी तरह हो| भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे से बहुत लड़ लिये| दोनों को एक-दूसरे से शिकायतें भी बहुत हैं लेकिन जैसे कि पाकिस्तान के सभी प्रमुख दलों ने अपने घोषणा-पत्रें में द्विपक्षीय संबंध-सुधार की घोषणा की है, वे इस गाड़ी को पटरी से उतरने न दें|

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तंभकार हैं.

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