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सरबजीत हत्या प्रकरण : स्वाभिमान नहीं बचा इन बेशर्म राजनेताओं में!

सरबजीत अब तुम फिर इस देश में जन्म मत लेना। यह देश अब तुम्हारे लायक नहीं रहा। अब यहां सरबजीत जैसों की जरुरत भी नहीं। यहां के लोगों ने शायद तय कर लिया है कि हमें बेईमानों, भ्रष्टाचारियों और नपुसंक लोगों का ही नेतृत्व चाहिए। इसलिए सरबजीत हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जिनकी जान की रक्षा हमारा देश नहीं कर सके। हमको आदत पड़ गयी है भीख मांगने की, गिड़गिड़ाने की इसलिए हम नहीं चाहते कि हमारे यहां और सरबजीत पैदा होकर हमें शर्मिंदा करे।

सरबजीत अब तुम फिर इस देश में जन्म मत लेना। यह देश अब तुम्हारे लायक नहीं रहा। अब यहां सरबजीत जैसों की जरुरत भी नहीं। यहां के लोगों ने शायद तय कर लिया है कि हमें बेईमानों, भ्रष्टाचारियों और नपुसंक लोगों का ही नेतृत्व चाहिए। इसलिए सरबजीत हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जिनकी जान की रक्षा हमारा देश नहीं कर सके। हमको आदत पड़ गयी है भीख मांगने की, गिड़गिड़ाने की इसलिए हम नहीं चाहते कि हमारे यहां और सरबजीत पैदा होकर हमें शर्मिंदा करे।

दरअसल हमारे देश के हुक्मरानों को गलतफहमी हो गयी है। उन्हें लगता है कि वह कुछ भी कहेगे इस देश की जनता उसे स्वीकार कर लेगी उसका प्रतिरोध नहीं करेगी। उनकी बात कुुछ हद तक सही भी है। दुनिया में कोई भी, कभी भी हमारे देश को बेइज्जत करके चला जाता है। उसे पता है इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे देश के कर्ताधर्ता भूल चुके हैं कि हमारी भी कोई इज्जत है। उनका स्वाभिमान जैसे शब्द से नाता खत्म हो चुका है। अगर ऐसा नहीं होता तो पाकिस्तान की इतनी औकात नहीं थी कि वह इतनी बेरहमी से सरबजीत की हत्या कर देता। राजनेताओं की तरह अफसरों की भी हालत वैसी ही हो गयी है।

अगर यह नहीं होता तो घायल पड़े सरबजीत के लिए काबिल नौकरशाहों की तरफ से सरकार के पास यह राय नहीं आती कि सरबजीत का इलाज किसी तीसरे देश में कराया जाए। अगर इनमे जरा सा भी स्वाभिमान बचा होता तो अकड़ कर कहा जाता कि सरबजीत का इलाज भारत में करवाओ। जोश से कहा गया होता कि सरबजीत को कुछ हो गया तो पाक की खैर नहीं। अगर हमारे हुक्मरानों में इतना हौसला आ गया होता तो जरदारी तो क्या उनके खानदान के भी किसी आदमी की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो सरबजीत का बेरहमी से कत्ल करते।

अब हमारे माननीय मंत्री भी कह रहे हैं कि सरबजीत की बेरहमी से हत्य कर दी गयी। उनका यह भी कहना है कि जेल में बंद सरबजीत पर जानबूझ कर हमला करवाया गया। अगर पाकिस्तान कसाब की फांसी के बदले एक बेकसूर भारतीय की जान ले सकता है तो हम जेलो में बंद पाकिस्तान आतंकियों को क्यों अपने रिश्तेदारों की तरह दुलारने में लगे हैं।  क्या दुनिया के सारे संविधान और मानवाधिकार के नियम सिर्फ पाकिस्तान जैसे देशों के लिए बने हैं, जो आतंकियों की फैक्ट्री चलाये और बाकी दुनिया उनके आतंक से परेशान होती रहे।  सरबजीत पाकिस्तान की जेल में सुरक्षित नहीं रहे और हमारे यहां कसाब को बिरयानी खिलाने में और उसकी सुरक्षा, सत्कार में ही करोड़ों खर्च हो गये।

यह मानवाधिकार का पाठ है या फिर कायरता का! पाकिस्तान ने तो हमें उस दिन ही कायर समझ लिया होगा जब हम डर के कारण अफजल गुरू का शव तक उसके परिवार वालों को नही सौंप पाये। काश हमारा नेतृत्व इतना साहस वाला होता कि वह अफजल गुरू के शव को जम्मू भेजता और साफ तौर पर कहता कि आतंकियों की मदद करने वालों और उनका साथ देने वालों का इलाज यह देश करना जानता है तो जम्मू में पत्ता भी नहीं खड़कता। मगर हमेशा मुंह बंद रखने वाला हमारे प्रधानमंत्री ने इस देश की मान मर्यादा और हिम्मत को भी मानो बंद कर दिया है।
जब सरबजीत की मृत्यु की खबर भारत आयी तो लोकसभा में भाजपा के सांसदों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाकर संसद नहीं चलने दी। अच्छा है इतना आक्रोश दिखना भी चाहिए। मगर यहां भी हालात कांग्रेस जैसे ही है। फर्क सिर्फ सत्ता का ही है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो बढिया स्काच पीने के शौकीन रहे हमरे पूर्व प्रधानमंत्री, लाहौर बस यात्रा जैसे लुभावनी बातें नहीं करते और देश को कारगिल तोहफे में नहीं मिलता। अगर भाजपा इतनी ही राष्ट्र्रवादी पार्टी होती तो उसके विदेश मंत्री उन आतंकियों को भारी रकम के साथ कंधार छोडने नही जाते जो आतंकी आज भी पाकिस्तान में बैठकर हमारे देश में आतंक की नई परिभाषायें लिख रहे है। अगर उस समय की सरकार भी शहीदों को सम्मान देना जानती तो उसका रक्षा मंत्री अपने घर में बैठकर कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के कफन और ताबूत में कमीशन खाने की बात नहीं कर रहा होता।

पाकिस्तान लगातार अपने नापाक इरादों से भारत में दहशत फैलाता रहा है। देश के विभिन्न भागों में बम विस्फोटों के बाद मिले सबूत इस बात के गवाह हैं कि पाकिस्तान नहीं चाहता कि भारत में कभी भी शांति रहे। मगर हमारा देश इन सबूतों को लेकर अमेरिका के सामने रोता रहता है कि माई बाप देखो फिर पाकिस्तान ने हमारे यहां बम फोड़ दिया। सवाल यह है कि क्या अमेरिका की तरह हम कभी इस हैसियत में नहीं आ पायेंगे कि पाकिस्तान को समझा सकें कि हमारे देश की तरफ आंख उठाने के क्या घातक परिणाम होते हैं। ऐसा करने के लिए दृढ़ शक्ति चाहिए जो हमारे नेतृत्व के पास नहीं है।

उत्तर कोरिया उत्तर प्रदेश से भी कहीं ज्यादा छोटा देश है। मगर उसने अमेरिका को ऐसी आंख दिखाई है कि उसे भी कंपकपी आ गयी। भारतीय नागरिकों की हत्या करके इटली चले गये दो सैनिकों को वापस बुलाने में सरकार की जान सूख गई। और वह वापस भी सिर्फ इसी शर्त पर आये कि उन्हों फांसी नहीं होगी और अपने दूतावास या पांच सितारा सुविधाओं से सम्पन्न जगह पर रहेंगे। छोटे-छोटे देश और उनमें इतना गजब का आत्म विश्वास।

हम 125 करोड़ की आबादी का देश होते हुए भी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाते तो क्या गलती सिर्फ राजनेताओं की ही है हमारी नहीं।  पाकिस्तान ने 125 करोड़ लोगों के मुंह पर जो तमाचा मारा है उसका जवाब देने का वक्त आ गया है। हम सबको अपने-अपने स्वर से अपने-अपने तरीके से पाकिस्तान को ऐसा करारा जवाब देना चाहिए जिससे फिर कभी पाकिस्तान इतनी हिम्मत न कर सके। मगर इस बार भी हमने यह काम अपने राजनेताओं पर ही छोड़ दिया, तो वह अपना बेशर्मी भरा हुआ जोशीला भाषण देंगे और कुछ दिनों बाद फिर हमको बेईज्जत करने के लिए पाकिस्तान कोई नयी साजिश रच रहा होगा।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदी वीकली वीकएंड टाइम्स के प्रधान संपादक हैं.

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