देहरादून। उत्तराखण्ड के कई विभागो में घाटालो का जिन्न बाहर निकलने की तैयारी में है. सूचना विभाग में एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है. घोटाले को सूचना विभाग के ऐसे लोगों ने अंजाम दिया है जिनकी अकूत संपत्ति राजधानी देहरादून में मौजूद है. सूचना विभाग ने एक न्यूज एजेन्सी को लाखो रुपये के विज्ञापन नियम कानूनों को ताक पर रख कर दे दिए. इस विभाग ने कई ऐसे इलेक्ट्रानिक चैनलों को विज्ञापन बांटा जिनकी टीआरपी उत्तराखण्ड में शून्य है. इस घोटाले के तार भाजपा शासनकाल से जुड़े बताए जा रहे हैं.
रोजाना दिखने वाले न्यूज चैनलों से अधिक दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले एक कार्यक्रम के आयोजक को प्रत्येक वर्ष लाखों रुपये के विज्ञापन बांटे गए. यह बड़ा मसला है. सूचना विभाग ने यह क्यों किया, इसका जवाब आना बाकी है. विभाग ने वर्ष 2009 से 2012 तक दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम आपकी आवाज के लिए इसे संचालित करने वाली एजेंसी न्यूज वायरस नैटवर्क को लाखो रुपये के विज्ञापन दिए जबकि देहरादून के दूरदर्शन केन्द्र को सरकार ने इससे कम पैसा दिया. इस आवंटित धनराशि की पोल उस वक्त खुली जब देहरादून के पत्रकार अमित सहगल ने आरटीआई के माध्यम से इस मामले को उजागर किया.
सूचना विभाग ने देहरादून दूरदर्शन को वर्ष 2009 व 2010 में चार लाख से अधिक की विज्ञापन फिल्में दी जबकि दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले न्यूज वायरस के मात्र एक कार्यक्रम को 10 लाख से अधिक के विज्ञापन दिए. ये आंकड़ा आगामी वर्षों में दोगुना होता चला गया. 2010-11 में दूरदर्शन देहरादून को 5 लाख के विज्ञापन दिए गए. न्यूज वायरस को 17 लाख से अधिक के विज्ञापन जारी किए गए. वर्ष 2011-12 में दूरदर्शन को मात्र 5 लाख से अधिक के विज्ञापन ही जारी किए गए जबकि न्यूज वायरस को 20 लाख से अधिक के विज्ञापन जारी कर दिए गए.
सवाल यह उठ रहा है कि देहरादून के दूरदर्शन केन्द्र को सूचना विभाग ने प्रचार प्रसार का माध्यम नहीं माना और दूरदर्शन केन्द्र से प्रसारित होने वाले आधे घन्टे के प्रायोजित कार्यक्रम आपकी आवाज (न्यूज वायरस) को प्रचार का माध्यम मान लिया. जिस तरह से इस घोटाले को अंजाम दिया गया है, यदि इसकी जांच शुरू हो जाए तो सूचना विभाग के शिखंडियों के चेहरों से नकाब उतर सकता है. इस मामले की जांच शुरू होते ही अन्य बांटे गए विज्ञापनों की भी पोल खुलेगी. अभी तो सिर्फ न्यूज वायरस का नाम सामने आया है.
इसके बाद कई अन्य के नाम आएंगे. नमकीन बेचने वाले एक तोतले तथाकथित पत्रकार को बांटे गए विज्ञापनों का ब्यौरा भी जल्द उजागर किया जाएगा. यह भी उजागर होगा कि किस तरह सूचना विभाग नियम कानूनों को ताक पर रखकर कुछ लोगों को मान्यता प्राप्त पत्रकार बना रहा है जबकि वह बनाए गए मान्यता प्राप्त पत्रकार के मानकों को पूरा नहीं करते. न्यूज वायरस को ओबलाइज किए जाने को लेकर जब इसके संचालक सलीम सैफी से बात करने की कोशिश की गई तो उनसे सम्पर्क नहीं हो सका.


देहरादून से नारायण परगईं की रिपोर्ट.





