भड़ास के पास कई तरह की चिट्ठियां, सूचनाएं आती हैं. कई ऐसी आती हैं कि उन्हें प्रकाशित नहीं किया जा सकता. कुछ ऐसे भी मामले आते हैं, जिनमें भेजने वाले को यह अंदाजा नहीं होता कि जो वह भज रहा है, वह छपनीय है या नहीं. इसी तरह का एक पत्र आज भड़ास के पास पहुंचा जिसमें पत्रलेखक किसी चैनल में कार्यरत एक नर और एक मादा के बीच आपसी संबंधों को लेकर छाती पीटते दिखे. इन्हें जवाब में लिखकर भेजना बड़ा कि बंधु, अगर सहमति से सेक्स हो रहा है तो क्या दिक्कत है. अपराध तब है जब मादा शिकायत करे कि उस नर प्रलोभित कर रहा है. लीजिए, ओरीजनल पत्र पढ़िए और उन सज्जन को भड़ास की तरफ से भेजा गया जवाब. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
अंधेरा ढल चुका था। एक तेज रफ्तार कार फर्राटे भरती हुए डीएनडी फ्लाई वे की तरफ बढ़ती जा रही थी। रास्ते में एक सुनसान सी जगह पर कार अचानक रुक गई। कुछ देर के बाद कार हिलती डुलती नजर आई। शक गहराने पर जब जांच पड़ताल हुई तो पता चला कि कार के अंदर एक शख्स और एक युवती संदिग्ध हालत में थे। दोनों नशे में धुत्त और एक दूसरे की बांहों में समाए हुए। बाद में पता चला चला कि शख्स एक न्यूज चैनल में हैं जबकि युवती उसी चैनल में एक एंकर। वो शख्स और वो एंकर दोनों अपनी कुछ इसी तरह की आदत के लिए पहले भी जाने जाते रहे हैं। हालांकि दोनों के ताल्लुकात अलग अलग लोगों से रहे। वो शख्स लड़कियों को ज्ञान देने के बहाने कई मौकों पर दाना डालते पहले भी देखे गए हैं जबकि उस एंकर ने सफलता पाने के लिए इन्हीं हथकंडों को अपना हथियार बना रखा है। शर्मनाक ये है कि इसी तरह के जर्नलिस्ट इन दिनों समाज और संस्कार की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। क्या ऐसी फीमेल एंकर्स ने मीडिया का माहौल खराब नहीं कर रखा है?
कृपया मेरा नाम और पहचान न प्रकाशित करें.
एक पत्रकार
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जवाब–
बंधु, सहमति से सेक्स करना गलत नहीं है. अगर लड़की राजी है तो कोई दिक्कत नहीं है. अगर लड़की ये कहे कि उसे सेक्स के लिए दबाव डाला जा रहा है, आफिस में बेहतर काम-दाम देने के नाम पर, तब अपराध बनता है. और, जरूरी नहीं कि निजी जीवन में कोई ज्यादा कामुक हो, ज्यादा भुक्खड़ हो, ज्यादा सोता हो, ज्यादा गाता हो, ज्यादा खाता हो, ज्यादा सेक्स करता हो, तो आप उसके पब्लिक लाइफ के योगदान को नकार दें. निजी और पब्लिक जिंदगी, दो अलग-अलग चीजें होती हैं, इसको गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए.
खुलेपन के इस दौर में अगर कोई वैचारिक रूप से आजाद हो, सेक्स को टैबू न मानता हो, तो उसे आप अपराधी नहीं कह सकते. हां, ये आपकी कुंठा जरूर हो सकती है कि ''हाय हम क्यों न हुए''. कोई किससे रिलेशन रखेगा, कोई क्या खाएगा, कोई क्या पहनेगा, ये उसका बेहद निजी मामला है बंधु.
आप परेशान न हों. दुनिया जितनी तेजी से खराब होती हुई आपको लग रही है, दूसरे लोगों को यही चीज बहुत तेजी से अच्छी होती हुई दिख रही होगी. सवाल सिर्फ नजरिए का है, परसेप्शन का है. कुछ वैसे ही, जैसे दुनिया तेजी से विकास के रास्ते पर दौड़ती नजर आ रही है, लेकिन बहुत से लोगों को यह विकास नहीं, बल्कि विनाश की तरफ तेजी से दौड़ना दिख रहा है. सो, आप मस्त रहें, किसी भी चीज के दोनों पहलुओं की तरफ ध्यान दें, हर पक्ष को एनालाइज करें, तभी फाइनल डिसीजन पर पहुंचें.
हां, आप जितना ध्यान कार के हिलने-डुलने पर लगा रहे हैं, उतना ध्यान अगर आप अपने काम और अपने ज्ञान के स्तर को अपग्रेड करने पर लगाते तो कहीं ज्यादा फायदा खुद का और मीडिया इंडस्ट्री का कर सकते थे. फिर भी, देर आये, दुरुस्त आये. आज और अभी से तय कर लें कि दूसरों की निजी जिंदगी में नहीं ताकना-झांकना है, और खुद की जिंदगी में दूसरों को ताक-झांक करने की छूट भी नहीं देनी है.
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया






