बनारस के सभी बड़े अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की न तो कोई जल्दी है और ना ही कोई जरूरत है. सबने अपने अपने कारण डिप्टी लेबर कमिश्नर को बता दिए हैं. इसके बाद डीएलसी ने अंतिम सुनवाई के लिए 18 जून की तिथि निर्धारित की है. इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि सहारा के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतनमान नहीं चाहिए. वे वर्तमान में मिल रहे वेतन भत्तों से संतुष्ट हैं. वहीं जागरण की तरफ से अब तक इस मामले में कोई आश्वासन नहीं दिया गया है. बनारस के पत्रकारों की लड़ाई काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष योगेश गुप्ता पप्पू और पत्रकार कर्मचारी महासंघ के मंत्री अजय मुखर्जी दादा लड़ रहे हैं.
ये लोग बनारस के बड़े अखबारों में अंतरिम लागू करने से लेकर मजीठिया वेज लागू करवाने की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं. दोनों पत्रकार नेता मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने को लेकर भी लगातार लेबर ऑफिस का चक्कर लगा रहे हैं. मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई थी, लेकिन इन दोनों लोगों के अलावा बनारस के बड़े अखबारों का कोई भी प्रतिनिधि सुनवाई के दौरान नहीं पहुंचा. सभी बड़े अखबारों ने इस मामले में अपनी-अपनी बात डीएलसी के सामने रख दी है. कर्मचारियों की छंटनी में लगा जागरण तथा आज ने अब तक अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया है.
इस साल फरवरी में बनारस के डिप्टी लेबर कमिश्नर एके राय ने केंद्रीय सचिव डा. मृत्युंजय सारंगी के पत्र का हवाला देते हुए 20 मार्च तक बनारस के सभी बड़े अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के संबंध में की कई कार्रवाई का रिपोर्ट देने को कहा था. पिछली कुछ सुनवाइयों के दौरान अमर उजाला, हिंदुस्तान, आज, राष्ट्रीय सहारा तथा दैनिक जागरण के लोग पहुंचे थे. सबसे अपनी-अपनी बात रखी थी. पर किसी ने बीस तक लिखित में अपनी बात नहीं रखी थी, जबकि दैनिक जागरण, कानपुर से आए मनोज दुबे ने दोनों पत्रकार संगठनों के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया था. उन्होंने योगेश गुप्ता पप्पू तथा अजय मुखर्जी दादा को लेकर आपत्ति लगाई थी, जिसके बाद डीएलसी ने दोनों लोगों से अथारिटी मांगी थी.
जागरण के आपत्ति के बाद दोनों पत्रकार नेता ने डीएलसी को अथॉरिटी दे दी थी. इस बीच अमर उजाला तथा हिंदुस्तान ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में चलने का हवाला देते हुए इसके बाद लागू करने की बात कही. जबकि सहारा समय ने स्पष्ट रूप से डीएलसी को लिखकर दे दिया कि उसके कर्मचारी संतुष्ट हैं. उनको मजीठिया वेज बोर्ड की कोई दरकार नहीं है. उन्हें जो पैसे मिल रहे हैं वे पर्याप्त हैं. जबकि जागरण और आज ने अब तक इस मामले में लिखित रूप में कुछ भी उपलब्ध नहीं कराया है. जागरण के मनोज दुबे ने डीएलसी को फोन करके बीमारी का बहाना बनाया तथा बाद में अपना पक्ष रखने की बात कही.
एके राय ने सभी पक्षों को अंतिम सुनवाई के लिए 18 जून का समय दिया है. उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया है कि 18 जून को सभी पक्ष उपस्थित हों ताकि सुनवाई की जा सके. अब देखना है कि मंगलवार को ही डीएलसी के आदेश की धज्जियां उड़ाने वाले अखबारों के प्रबंधन 18 जून को कौन सी रणनीति अपनाते हैं. वैसे भी अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ पाने वाले पत्रकारों के लिए आखिर योगेश गुप्त पप्पू और अजय मुखर्जी दादा कब तक लड़ाई लड़ेंगे. कभी पराडकरजी, खाडिलकरजी, गर्देजी, इश्वरचंद्र सिन्हा, पंडित गंगासागर मिश्र, कमलापति त्रिपाठी जैसे निर्भीक पत्रकारों की धरती अब डरपोक और कायर पत्रकारों की धरती बनती जा रही है. वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ ही आवाज उठाने में डर रहे हैं.








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