मैं रजनीश कुमार। एक मामूली सा इंसान। पटना के बाढ़ अनुमंडल का रहने वाला हूं। कभी मैं पटना के मीडिया में जाना-पहचाना नाम हुआ करता था। दैनिक जागरण में लंबे अरसे तक रहा। फिर राष्ट्रीय सहारा का दामन थाम लिया। लेकिन, यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। जिस सहारा को मैंने सहारा समझ कर थामा था, उसी ने मुझे डुबो कर बदनामी के एक ऐसे दलदल में धकेल दिया, जहां से निकलना मेरे लिए अब नामुनकिन हो गया है।
एक स्टिंग ऑपरेशन के लिए मुझे भेजा गया। मैं भी ऐसा नादान कि उस स्टिंग के लिए ऑफिस की ओर से कोई लिखित अनुमति का पत्र नहीं लिया। इस स्टिंग के दौरान ही मेरी बहस बख्तियारपुर पुलिस से हो गई। पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। तमाम तरह के आरोप लगाए गए। जिस मीडिया के लिए मैं तन-मन से काम करता रहा, उसी ने मेरा तमाशा बना दिया। जिस सहारा के लिए मैं पूरी ईमानदारी से परिश्रम करता रहा, उसने मुझे अपना कर्मचारी मानने तक से इनकार कर दिया। हद तो यह है कि पटना के प्रतिष्ठित अखबारों ने खबरों को लेकर मुझसे होने वाली नोंकझोंक का पूरा गुस्सा मेरी गिरफ्तारी की खबर छापकर कर निकाला।
यह मेरे लिए शर्म से डूब कर मर जाने की बात है कि जिस बदनामी से मैं पीछा छुड़ाता रहा, उसी बदनामी के कालकोठरी में जबरन मेरे ही साथियों ने मुझे बंद कर दिया। घटना 26 नवंबर 2013 की है। यह रात मेरी जिंदगी के लिए वह काली रात है, जिसका दर्द बयां करते-करते मेरा कलेजा फटने लगता है। मैं राश्ट्रीय सहारा के पटना सिटी कार्यालय में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत था। 26 नवंबर की रात भी मैं ऑफिस में सहयोगियों के साथ काम कर रहा था। इस बीच मेरी बात पटना ऑफिस के बेसिक नंबर 0612 3611441 पर लगातार हो रही थी।
बातचीत के दौरान मुझे ऑफिस की ओर से बख्तियारपुर में चल रहे देह व्यापार का स्टिंग करने का काम सौंपा गया। अमूमन मैं ऑफिस से काम खतम करने के बाद पटना सिटी स्थित किराए के मकान में ही रुक जाया करता था। ऑफिस से मिले निर्देष के बाद मैंने अपनी बाईक पटना साहिब स्टेषन के जीआरपी थाने के समीप लगा दी और ट्रेन से बख्तियारपुर के लिए रवाना हो गया। सूचना मिली थी कि बख्तियारपुर के चंपापुर में देह व्यापार का धंधा पुलिस के सहयोग से होटलों में चल रहा है। स्टेषन पर उतरने के बाद मैं होटल के समीप बैठ गया। इस बीच मैं अपने काम में लगा था। मैं रात एक बजे तक वहीं बैठा रहा। देह व्यापार के काफी सबूत हांथ लग चुके थे। इस बीच बाढ़ के रहने वाले मेरे कुछ जानकारों से वहां मेरी मुलाकात हुई। वह ऐसे लोग थे, जिनसे एक पत्रकार होने के नाते में अपराध जगत की खबरें लिया करता था। उनसे बातचीत होने लगी।
इस बीच होटल के एक कर्मचारी ने हमारी बातों को सुना और बख्तियारपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी मृत्युंजय कुमार को स्टिंग ऑपरेषन की सूचना दे दी। थोड़ी ही देर में मेरे साथ बैठे जानकारों ने मुझसे कहा कि यहां कुछ गड़बड़ है, अब यहां से निकलना होगा। षायद उन्हें यह भनक मिल चुकी थी कि अगर पुलिस को इस स्टिंग की जानकारी मिल गई, तो वे हमें छोड़ेंगे नहीं। चूंकि, मुझे ऑफिस से स्टिंग का निर्देष मिला था, इसलिए मैंने बेफिक्री दिखाई और वहीं बैठा रहा। लेकिन, मेरी यह बेफिक्री मेरे लिए घातक साबित हुई। बख्तियारपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी मृत्युंजय कुमार पुलिस बल के साथ उसी होटल के समीप पहुंच गए। पहुंचते ही पूछताछ षुरू की। एक बात जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी कि आखिर पुलिस वालों की टेढ़ी नजर मुझपर ही क्यों टिकी है ? मैंने पुलिस को अपना परिचय दिया। बताया रजनीष नाम है और ऑफिस के काम से आया हूं।
इतना सुनते ही उन्होंने मेरे साथ मारपीट षुरू कर दी। मेरा मोबाइल और पर्स छीन लिया गया। पत्रकारिता छुड़ा देने की धमकी दी। मैंने उन्हें ऑफिस से बात कराने का निवेदन किया। लेकिन, मेरे पैरों के नीचे से जमीन उस वक्त खिसक गई जब मेरे ऑफिस से पुलिस को यह कहा गया कि हम तो रजनीष को जानते ही नहीं…। थाना प्रभारी ने मुझसे कहा कि सहारा वाले तो तुम्हें जानते ही नहीं….? अब कहो कैसी रही पत्रकारिता ? थाना प्रभारी के एक-एक षब्द मेरे कानों को चीरते ही सीधे दिल को जख्मी कर रहे थे। मुझसे सादे कागज पर जबरन दस्तखत लिया गया। मैं हतप्रद था। मेरे खिलाफ एफआईआर लिखी गई। कहा गया कि मैं लाल बत्ती गाड़ी में घूम रहा था। जबकि, जिस गाड़ी के बारे में कहानी बनाई गई न तो वह मेरी गाड़ी थी और न ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। यह मेरे लिए बेहद कठिन समय था। लेकिन, मुझे क्या मालूम था कि कठिन वक्त तो अभी बस षुरू ही हुआ था। कल तक जो साथी मुझसे फोन कर खबर पूछा करते थे, उन्होंने भी अपनी पूरी भड़ास निकाली।
दैनिक हिन्दुस्तान ने तो मुझे करोड़ों की रंगदारी मांगने वाला अपराधी और कुख्यात अपराधी नागा सिंह का रिष्तेदार तक साबित कर दिया। हद तो यह है कि खबर में ऐसे-ऐसे घिनौने आरोप लगाए गए जैसा पुलिस ने भी मुझपर नहीं लगाया था। हां, मैं मानता हूं कि अपराधी नागा सिंह मेरा दूर का रिष्तेदार है। तो क्या किसी अपराधी का दूर का रिष्तेदार भी अपराधी होता है ? अगर मैं करोड़ों रूपये की रंगदारी ही वसूलता तो क्या सहारा में 5 हजार की नौकरी करता ? क्या इस महंगाई के जमाने में भी मैं 1200 रूपये के किराए के मकान में रहता ? खैर, जिन्होंने ऐसा किया, उनसे तो खबरों को लेकर मेरी प्रतिद्वंदिता थी। लेकिन, सहारा ? सहारा ने तो यह भी मानने से इनकार कर दिया कि मैं उनका कर्मचारी हूं….। क्योंकि मैं स्ट्रिंगर था ? मेरी हाजिरी जिस रजिस्टर में थी उसे गायब क्यों कर दिया गया ?
इस घटना के बाद से आज तक मैं सहारा में अपनों से यह फरियाद करता आ रहा था कि मेरे दामन पर जो दाग लगा है, उसे हटाया जाए। आज तक मुझे बस भरोसा ही दिया जाता रहा। आज मजबूर होकर मैं यह खत यषवंत भाई को भेज रहा हूं। मैं इस पूरे पत्रकारिता जगत से और खासकर सहाराश्री से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं….।
क्या ईमानदारी से काम करने का यही अंजाम होता है ?
क्या किसी पर भरोसा करने का यही अंजाम होगा ?
क्या किसी अपराधी का रिष्तेदार भी अपराधी होता है ?
क्या करोड़ों रूपये की रंगदारी वसूलने वाला इस कदर गरीबी में रहेगा ?
क्या हिन्दुस्तान अखबार इस बात का जवाब देगा कि उसने मेरे खिलाफ ऐसी खबरें क्यों छापी जिसकी चर्चा तक एफआईआर में नहीं है ?
क्या सिर्फ आरोप लगने मात्र से कोई अपराधी हो जाता है ?
अगर हां, तो क्या सहाराश्री खुद को अपराधी मानते हैं ?
क्या सहाराश्री भी सभी पदों से इस्तीफा देंगे ?
रजनीश
पटना
09304316017






