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सांप मेला

क्या आप किसी ऐसे मेले की कल्पना कर सकते हैं, जहां आकर्षण का केंद्र गोलगप्पे या जलेबी अथवा प्रदर्शनी व झूला नहीं बल्कि विषाक्त सांप हों। मेला परिसर में आपका स्वागत ही सांपों की फुंफकार से हो। लेकिन यह सच है। हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के कोलघाट में हर साल होने वाले सांप मेले की। इस साल का यह मेला आज सोमवार को समाप्त हो रहा है।

क्या आप किसी ऐसे मेले की कल्पना कर सकते हैं, जहां आकर्षण का केंद्र गोलगप्पे या जलेबी अथवा प्रदर्शनी व झूला नहीं बल्कि विषाक्त सांप हों। मेला परिसर में आपका स्वागत ही सांपों की फुंफकार से हो। लेकिन यह सच है। हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के कोलघाट में हर साल होने वाले सांप मेले की। इस साल का यह मेला आज सोमवार को समाप्त हो रहा है।

150 साल पुराने इस मेले में हर तरफ आपको एक से बढ़ कर एक विषाक्त सांप ही नजर आएंगे। मेले का आयोजन पेशेवर संपेरे नहीं बल्कि गुलनी व आस – पास बसे कुछ गांवों के ग्रामीण करते हैं। मेले में आने वाले हर आगंतुक से आयोजक सांपों को पर्यावरण के लिए जरूरी बताते हुए उन्हें न मारने की अपील करते हैं। आयोजक बताते हैं कि इलाके में लगने वाले इस अद्भुत मेले का आयोजन लगभग 150 साल पहले अचानक हुआ था। तब से इलाकावासी इसे परंपरा के रूप में हर साल मनाते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस मेले में सांपों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जिसमें भयंकर विषधर सांप शामिल होते हैं।

आयोजन में कोई भी पेशेवर संपेरा नहीं है। सभी सामान्य नागरिक हैं। लेकिन परंपरा के तहत आयोजन से तीन – चार महीने पहले से कहीं या किसी के घर सांप देखे जाने की सूचना मिलते ही वे वहां पहुंच जाते हैं,. और सांपों को पकड़ कर उन्हें अपनी निगरानी में रखते हैं। इस दौरान सांपों को मछली, मेढक आदि खिला कर जिंदा रखा जाता है। मेले में प्रदर्शनी के बाद पकड़े गए सभी सांपों को पानी में छोड़ दिया जाता है। आयोजक बताते हैं कि लोगों के मन से सांपों के प्रति डर निकालने के लिए ऐसा किया जाता है। पहले मेले के बाद सांपों को जंगलों में छोड़ा जाता था। चूंकि अब जंगल बचे नहीं, लिहाजा सांपों को पानी में छोड़ा जाता है। इस साल भी यह मेला विगत शुक्रवार से शुरू हुआ था। जो आज सोमवार को समाप्त हुआ।

लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण, कोलकाता से जुड़े हैं. संपर्क: 09434453934

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