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दिल्ली

सांसदों का वेतन छह लाख रुपये प्रतिमाह करने की साजिश

देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005 में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009 में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है|

देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005 में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009 में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है|

देश का संविधान कहता है कि इस प्रकार की आर्थिक नीतियाँ अपनायी जाएँगी कि क्षेत्रीय और वर्गवार विषमता में कमी आये| आम नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि इन नीतियों से किस प्रकार विषमता दूर हो रही है| जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं| यदि 30 रूपये प्रतिदिन पर्याप्त हों तो, कार्य करने के बदले वेतन को छोड़ भी दिया जाए,  कम से कम सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को बिना कार्य किये  मिलने  वाली पेंशन तो 900 रूपये प्रतिमाह किया जाना  उचित ही है|

सरकार जनता को विभन्न प्रलोभन देकर सब्ज बाग़ दिखाकर बना रही है|  एक ओर यह वक्तव्य दिये जाते हैं कि देश में मात्र 20% लोग गरीब हैं, वहीं दूसरी ओर दो तिहाई जनता को अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाकर सच्चाई की अनूठी बानगी प्रस्तुत की जाती है| केंद्र सरकार के कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने पूर्व में विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, भूमिका, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्ययन हेतु भेजा गया हो| दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति/महंगाई की मार भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और सुन्दर (शोषणकारी)  नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं|

आज से 16 वर्ष पूर्व भारत में सेवा कर नाम का कोई कर नहीं था और आज इस नाम से 100000 करोड़ रुपयों की जनता की जेब प्रतिवर्ष काटी जाती है| लगभग सभी सेवाओं पर कर लगा दिया गया है तथा आज सेवा कर न लगने वाली सेवाओं की (नकारात्मक) सूची है व इन सेवाओं को छोड़कर सभी सेवाओं पर सेवा कर देय है| देश के अपरिपक्व या अस्वच्छ बुद्धि वाले नागरिक इसे अच्छा नियोजन भी कह सकते हैं| एक तरफ देश की आम आदमी से प्रत्येक सेवा और वस्तु पर कर वसूलो और बाद में दो तिहाई लोगों को गरीबी के नाम पर नरेगा, अनुदान आदि के नाम पर बांटो| पहले करों की वसूली में भ्रष्टाचार और बाद में जनता का ही धन जनता को बांटने में| नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की पौ बारह है|

सरकार का कुतर्क हो सकता है कि इससे राजस्व में वृद्धि हो रही है किन्तु राजस्व और भ्रष्टाचार में क्या अनुपात है शायद सरकार को ज्ञान नहीं है| भारत आज भ्रष्टाचार के मामले में मात्र चौथे पायदान पर है| जब देशी बंदूक के लाइसेंस का शुल्क एक रुपया पचास पैसा था तब नवीनीकरण के लिए पांच रूपये रिश्वत ली जाती थी| जमीन के एक कारोबारी से बातचीत में उसने बताया कि जमीन के उपयोग परिवर्तन के लिए जितना शुल्क जमा करवाया उससे दुगुना पैसा कलेक्टर को देना पडा| नगर नियोजक, राजस्व विभाग, स्थानीय निकाय, पटवारी आदि को दी जाने वाली भेंटे अलग हैं| सरकार कर संग्रहण के आंकड़ों से भी बड़ी खुश होती है और राजस्व विभाग के अधिकारियों की पीठ थपथपाती है| किन्तु देश में 2% प्रतिवर्ष जनसंख्या वृद्धि से सेवाओं और वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि हो रही है तथा गत दशकों से 10% से ऊपर महंगाई दर में वृद्धि हो रही है| अत: 12% तक कर संग्रहण में वृद्धि तो स्वाभाविक है और इससे कितनी अधिक वृद्धि हो रही है, यह सरकार और जनता दोनों जानते हैं| 12% तक जनहित के किसी मद में बजट में प्रतिवर्ष वृद्धि का अभिप्राय तो मात्र स्थिरता है और वास्तव में कोई वृद्धि नहीं है|

विदेशों में समान प्रकृति के कार्य के लिए सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र से 2-3 गुणा वेतन दिया जाता है जबकि भारत में समान कार्य के लिए सरकारी सेवा में 6-8 गुणा वेतन दिया जा रहा है| भारत में सरकारी कार्यालय डाक घर की भांति मात्र पत्रों को इधर-उधर भेजने का कार्य कर रहे हैं और प्रतिमाह लाखों रुपये जनता के खजाने से लेने वाले कई आई ए एस तो पूरे महीने में जनता से सम्बन्धित 10 निर्णय लेने/टिपण्णी हस्ताक्षर करने का कार्य भी नहीं करते हैं| वे मात्र ऊँचे अधिकारियों से आने वाले पत्रों का जवाब देना आवश्यक समझते हैं | सरकारी क्षेत्र के लगभग 4 करोड़ संगठित कर्मचारियों के 20 करोड़ परिजनों के लिए भी छठा वेतन आयोग वरदान साबित हुआ था और उनकी परिलब्धियों में पूर्व में वर्ष 2006  में 150% से अधिक की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन और सुख- सुविधा वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| केंद्र सरकार के वेतन आयोग के बाद सभी राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और शासन के अन्य अंगों में वेतन वृद्धियां आवश्यक हो जाती है| अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की स्वीकृति दे दी है| आखिर दे भी क्यों नहीं चुनावी वर्ष है और करों के रूप में वसूली गयी जनता की गाढे पसीने की कमाई को ये लोग अपनी पैत्रिक सम्पति समझते आये हैं|

अब जनता को समझ लेना चाहिए कि वेतन आयोग के गठन से जनप्रतिनिधियों के वेतन में न केवल बढ़ोतरी का मार्ग पुन: निष्कंटक होगा बल्कि सत्तासीन  दल अपने पक्ष में अधिक मतों की भी अपेक्षा रखता है| मंहगाई में वृद्धि होगी जिससे सांसदों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और व्यापारियों, जमाखोरों  व उद्योगपतियों के मुनाफे में वृद्धि होने से वे अच्छा चुनावी चन्दा दे सकेंगे| पसीने तो आम जनता के छूटने हैं| इस प्रकार सातवें वेतन आयोग के गठन से सरकार ने एक ही ढेले में कई चिड़िया मारने की योजना बनाई है| अब जनता को सावधान हो जाना चाहिए कि जन प्रतिनिधियों के नापाक मंसूबों को सिरे न चढ़ने दें और मांग करें कि वेतन आयोग में बहुमत में सिविल सोसायटी के लोग सदस्य हों जो जनहित पहलू पर विचार कर सकें क्योंकि नौकरशाह और जन प्रतिनिधि तो अपना हित त्याग नहीं सकते| नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों का  स्पष्ट हित तो जनता की जेब से अधिकतम दोहन करने में है| हमारे माननीय प्रधान मंत्री और वित्तमंत्री दोनों ही विदेशों में अंग्रेजी वातावरण में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हैं|

भारत पूर्व में भी अंग्रेजों  की कुटिल नीतियों का लम्बे समय तक शिकार रह चुका है| छठे वेतन वेतन आयोग के बाद सांसदों के वेतन में 4 वर्षों में 16 गुणी वृद्धि कर उसे 50000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था और अब इसमें यदि इसी दर से वृद्धि की गयी तो अगली लोकसभा में सांसदों का वेतन 800000 रुपये प्रतिमाह हो जाएगा| अत: मेरे प्रिय भारतवासियों जागो समय आ गया है, सरकार की संविधान विरोधी और जन विरोधी नीतियों का एकजुट होकर पुरजोर विरोध करने का – याद रहे|

मणि राम शर्मा का विश्लेषण.

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