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साधुओं, बाबाओं और भविष्यवक्ताओं के चंगुल से मुक्त होंगे न्यूज चैनल!

: प्रेत, नाग-नागिन, एलियंस से संबंधित ख़बरें जल्द हो जाएंगी अतीत का हिस्सा : नई दिल्ली : अब न्यूज चैनलों पर दुनिया का अंत, भूत-प्रेत, नाग-नागिन, एलियंस या हिम मानव जैसी अविश्वसनीय खबरें नहीं दिखेंगी। न ही वे सेलेब्रिटी की निजी जिंदगी को मसाला खबरों की तरह परोसेंगे। यह परिवर्तन आ रहा है न्यूज चैनलों के सेल्फ रेग्यूलेशन के फैसले से। अभी तक सभी नियंत्रणों से बाहर रहे ये चैनल नहीं चाहते कि उन्हें सरकार या कोर्ट के जरिए नियंत्रित किया जाए। इसीलिए वे अपनी खबरों के विषय सावधानी से चुन रहे हैं।

: प्रेत, नाग-नागिन, एलियंस से संबंधित ख़बरें जल्द हो जाएंगी अतीत का हिस्सा : नई दिल्ली : अब न्यूज चैनलों पर दुनिया का अंत, भूत-प्रेत, नाग-नागिन, एलियंस या हिम मानव जैसी अविश्वसनीय खबरें नहीं दिखेंगी। न ही वे सेलेब्रिटी की निजी जिंदगी को मसाला खबरों की तरह परोसेंगे। यह परिवर्तन आ रहा है न्यूज चैनलों के सेल्फ रेग्यूलेशन के फैसले से। अभी तक सभी नियंत्रणों से बाहर रहे ये चैनल नहीं चाहते कि उन्हें सरकार या कोर्ट के जरिए नियंत्रित किया जाए। इसीलिए वे अपनी खबरों के विषय सावधानी से चुन रहे हैं।

न्यूज चैनलों का अगला कदम साधुओं, बाबाओं और भविष्यवक्ताओं के चंगुल से मुक्त होना है। पहले चरण में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी दिखाना बंद होगा। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के जनरल सेक्रेट्री एन के सिंह के अनुसार अभी प्राइम टाइम पर बाबाओं के कार्यक्रम बंद हुए हैं। अगले चरण में न्यूज चैनलों से बाबाओं की विदाई की उम्मीद है क्योंकि कुछ चैनलों के बाबाओं के साथ कांट्रैक्ट खत्म होने में लगभग छह महीने लगेंगे।

ऐश्वर्या राय की डिलीवरी, राजस्थान में भरतपुर के दंगे या अजहरुद्दीन के बेटे के जनाजे की घटनाओं को मसालेदार तरीके से न दिखाने के फैसले अचानक नहीं हुए है। और न ही हर ऐसी घटना पर ये अलग-अलग लिए गए हैं। न्यूज चैनल तो मात्र अपने संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) द्वारा दो साल पहले तय की गई गाइडलाइन का पालन कर रहे हैं। सिंह कहते हैं – दो साल में हमने इतना फासला तय किया है। दुनिया के शायद ही किसी देश में सेल्फ रेग्यूलेशन का इतनी सहजता और कड़ाई से पालन हो रहा है।

यह गाइडलाइन हमने खुद नहीं तय की है। इसे नौ-सदस्यीय गणमान्य लोगों की एक कमेटी ने बनाया है। इसके चेयरमैन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जे. एस. वर्मा हैं। इसमें इतिहासकार रामचंद्र गुहा, समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अंडरसेक्रेट्री जनरल नितिन देसाई और नैस्कॉम के पूर्व अध्यक्ष किरण कार्णिक शामिल हैं। हालांकि यह कदम मीडिया के कामकाज में संभावित सरकारी दखलंदाजी के मद्देनजर उठाया गया हो सकता है।

पिछले महीने केंद्रीय मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया कि किसी न्यूज चैनल द्वारा आचार संहिता का पांच बार उल्लंघन करने पर दस साल के लिए मिलने वाले उसके लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं होगा। चैनल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन मान रहे हैं। इसी तरह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के नए चेअरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्केण्डेय काटजू ने न्यूज चैनलों को उनके अधीन लाने की सलाह सरकार को दी।

उन्होंने आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले चैनलों के विज्ञापन बंद करने कह राय भी जाहिर की। चैनल इसे अपनी स्वतंत्रता में दखल मान रहे हैं। सिंह कहते हैं – कोई सरकार चुनाव से ठीक पहले आचार संहिता के पांचवे उल्लंघन के बहाने टीवी चैनल का लाइसेंस रद्द करने की धमकी दे सकती है। वहीं जस्टिस वर्मा ने इसे आपातकाल की याद दिलाने वाला बयान करार दिया। जबकि मीडिया के जबरदस्त विरोध के बाद सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी चैनलों के सेल्फ रेग्यूलेशन पर राजी हो गईं।

हालांकि मीडिया का ही एक हिस्सा सेल्फ रेग्यूलेशन की धारणा का ही विरोध कर रहा है। वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने एक टीवी बहस में कहा कि दो साल से लागू एनबीए की आचार संहिता प्रभावहीन रही है। बिग बॉस जैसे कार्यक्रम को तो इंटरटेनमेंट चैनल उसके व्यस्कों के लिए कंटेंट को लेकर देर रात दिखाता है लेकिन न्यूज चैनल उसी कार्यक्रम की झलकियां दिन भर दिखाते रहते हैं।

दुनिया : मीडिया पर नजर रखने वाली संस्थाएं

ब्रिटेन : प्रेस कंप्लेंट कमीशन ऑफ युनाइटेड किंग्डम (स्वतंत्र संस्था)। 16 सदस्यीय कमीशन में नौ आम लोग जिसमें चेअरमैन भी शामिल, सात अन्य सदस्यों में न्यूज पेपर इंडस्ट्री के वरिष्ठ संपादक। सदस्यों का चुनाव स्वतंत्र नियुक्ति कमीशन द्वारा। कमीशन को शिकायतों की जांच और फैसला देने का अधिकार। दोषी मीडिया के लिए फैसले का प्रकाशन करना जरूरी। कमीशन को प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं। ब्रॉडकास्ट मीडिया के लिए निगरानी संस्था ऑफकॉम (ऑफिस ऑफ कम्युनिकेशन)। टीवी के अलावा अन्य मीडिया के कंटेंट को लेकर गाइडलाइन तैयार करता है। शिकायतों की जांच और फैसले देता है।

अमेरिका : मिनेसोटा न्यूज काउंसिल (स्वतंत्र संस्था)। 25 सदस्यीय संस्था में 12 आम लोग होते हैं, जो पिछले सात वर्षो के दौरान किसी मीडिया से न जुड़े हों, 12 अन्य सदस्य मीडिया से। संस्था प्रमुख होता है सप्रीम कोर्ट जस्टिस। काउंसिल को शिकायतों पर सुनवाई और फैसला देने का अधिकार। संस्था के फैसलों को जनधारणा माना जाता है। किसी मीडिया पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती। कुछ मीडिया समूहों द्वारा खुद के लिए निगरानी संस्थाएं स्थापित।

ऑस्ट्रेलिया : ऑस्ट्रेलियन प्रेस काउंसिल (स्वतंत्र संस्था)। संस्था सदस्यों में जनता, पत्रकार और मीडिया कंपनियों के मालिकों की बराबर हिस्सेदारी। 1976 में गठित इस संस्था की जिम्मेदारी प्रेस के आदर्शो और स्वतंत्र की रक्षा करना है। संस्था ने लोगों की निजता की रक्षा के लिए मापदंड बनाए हैं। संस्था संचालन के लिए कोई नियमित गाइडलाइन नहीं। काउंसिल के फैसलों को मीडिया को प्रकाशित करना होता है। संस्था किसी पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती।

चैनलों पर कार्रवाई सेल्फ रेग्यूलेशन

इंडिया टीवी : नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) ने अंतर्राष्ट्रीय नीति विश्लेषक फरहाना अली के दिसंबर 2008 में प्रसारित इंटरव्यू के मामले में इंडिया टीवी चैनल को नियमों के उल्लंघन का दोषी माना। अली के अंग्रेजी में दिए गए इंटरव्यू को चैनल पर हिंदी में डब करके दिखाया गया, जिसमें उनकी तस्वीर का इस्तेमाल किया गया। चैनल पर एक लाख रु. का जुर्माना लगाया गया। चैनल को पांच दिन तक रात आठ से नौ बजे के बीच 12 मिनट के अंतर से पांच बार माफी का प्रसारण करने को कहा गया।

कोर्ट के जरिए कार्रवाई
टाइम्स नाऊ : सितंबर 2008 में प्रॉविडेंट फंड घोटाले की खबर का प्रसारण करते हुए टाइम्स नाउ चैनल ने 15 सेकंड तक गलती से प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष रहे जस्टिस पीबी सावंत का फोटो दिखाया। रिपोर्ट में यह बताया गया कि घोटाले में कई जज भी शामिल हैं। जस्टिस सावंत ने इस पर चैनल को लीगल नोटिस भेजा। चैनल ने पांच दिन तक माफीनामा दिखाया। लेकिन सावंत इससे संतुष्ट नहीं हुए। वे मामले को कोर्ट ले गए। पुणे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने चैनल को दोषी मानते हुए उसे मानहानि पर सौ करोड़ रु.अदा करने को कहा। चैनल ने इस आदेश के खिलाफ बांबे हाईकोर्ट में अपील की,लेकिन वहां भी उसे 20 करोड़ रु. अदा करने और बाकी रकम की बैंक गारंटी देने को कहा गया। अब एनबीए और बीईए मिलकर इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दे रहे हैं कि इससे चैनल की समाचार देने की प्रक्रिया ही पंगु हो जाएगी।

लाइव इंडिया : 2007 में चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण करते हुए दिल्ली के एक स्कूल की शिक्षिका उमा खुराना के बारे में बताया कि वे छात्राओं को देह-व्यापार के लिए मजबूर करती हैं। जांच में यह स्टिंग ऑपरेशन झूठा पाया गया। शिक्षिका चैनल को कोर्ट में ले गईं। चैनल पर अस्थायी प्रतिबंध भी लगा। अंतत: वह मामला कोर्ट के बाहर आपसी समझौते से निपट गया।

साभार : दैनिक भास्कर

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