जयपुर। राजस्थान पत्रिका की मध्य प्रदेश में लांचिंग के दौरान और उसके बाद उससे जुड़े उन पत्रकारों के दिन बेहद खराब चल रहे हैं जो भास्कर छोड़कर पत्रिका चले गए थे। दरअसल पत्रिका भास्कर से लोगों को काम करने के लिए नहीं बल्कि सोची समझी साजिश के तहत केवल भास्कर को नुकसान पहुंचाने के लिए लाता है। बीते दो तीन वर्षों में भास्कर से पत्रिका गए ज्यादातर लोग अब या तो भास्कर आ गए हैं या शीघ्र ही जाने वाले हैं। एक पत्रकार होने के नाते मैं भास्कर प्रबंधन की इस बात के लिए प्रशंसा करना चाहता हूं उसने अनेक पत्रकारों का करियर तबाह होने से बचाया।
दो साल से भी कम समय में अकेले भास्कर भोपाल से राजस्थान पत्रिका गए लोगों में धर्मेंद्र भदौरिया, मुकेश सक्सेना, रवींद्र कैलासिया, मुकेश विश्वकर्मा, सुमित शर्मा के साथ पंकज श्रीवास्तव और दयाशंकर मिश्र जैसे लोग शामिल थे। इन सभी के पास पत्रिका जाते समय भास्कर में अहम जिम्मेदारियां थीं। लेकिन यह लोग पत्रिका के प्रलोभन में आ गए जो इनके करियर के लिए बेहद खतरनाक मोड़ बन गया। इनमें से किसी का तबादला चेन्नई किया गया तो किसी का इंदौर, ग्वालियर। किसी को छह आठ माह में ही लौटकर मेन स्ट्रीम से भास्कर टीवी में काम करना पड़ा।
इन सभी की वापसी के पीछे भिन्न कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे अहम कारण है, इनमें से किसी का भी राजस्थान का नहीं होना और कथित रूप से ज्यादा वेतन पाना। इस कहानी को थोड़ा पीछे जाकर समझते हैं।
पंकज मुकाती को भास्कर से करीब पांच बरस पहले लाया गया। उन्होंने न्यूज टुडे को नाम दिलाया, प्रतिष्ठा दिलाई। फिर पत्रिका इंदौर और भोपाल को व्यवस्थित किया। पत्रिका ने क्या किया। इंदौर लांच होते ही उनको जयपुर ठंडे बस्ते में रवाना कर दिया फिर नमस्ते कहने पर मजबूर कर दिया। एक ऐसी गलती जिस पर अब पत्रिका को पछतावा है। लेकिन वह फिर से युवाओं को हताश कर रहा है।
भास्कर से आए लोगों में सबसे पहला शिकार बनाया गया धर्मेंद्र भदौरिया को। हालांकि वह बच गए। बिजनेस भास्कर में फिर लौट गए। पहले उनको पत्रिका ने चेन्नई भेजा, जब भास्कर जाने की भनक मिली जो जयपुर का आदेश दे दिया। इस कड़ी में फ्लैश बैक में जाते हुए चंदन शर्मा जिक्र भी जरूरी है। उनको जयपुर भास्कर से लाया गया, फिर कुछ दिन काम दिया, फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। एक न्यूज के आदमी को भला रेडियो में भेजने की क्या वजह हो सकती है। आज चंदन भागलपुर में प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित अखबार के संपादक हैं। पंकज मुकाती अमर उजाला में कॉम्पैक्ट के कर्ताधर्ता हैं। जाहिर है, नुकसान पत्रिका को हुआ।
प्रसून मिश्र भी इस कड़ी में अहम नाम हैं। एक युवा जिसके पास खबरों की समझ के साथ उनको परोसने का हुनर भी है। शुरू में वह भी सराहे गए लेकिन जल्द ही उनको भी किनारे लगा दिया गया। मजेदार बात है कि इन्हीं प्रसून का काम निहारजी तक सराह चुके थे। फिर क्या हुआ कि अचानक ही अच्छा काम करने वाला कनिमोझी यानी आंख की पुतली से कैसे आंख की किरकिरी बन जाता है।
ऐसा लगता है कि प्रबंधन को हां में हां मिलाने वाले और काम छोड़कर दूसरों की जेब से मिठाई मंगवाने वाले ही पसंद हैं। राजीव अपनी जेब से दो पैसे देते हैं तो सामने वाले को इस हद तक नीचा दिखाते हैं कि वह मजबूर होकर या तो फटे कपड़े पहनकर आफिस आता है या फिर पुराने भला कौन गरीब हर माह पांच सौ से हजार रुपये राजीव तिवारी को मावे और मिसरी खिलाने में लगाएगा। जो नहीं लगाएगा उसका हाल किसकी तरह होगा झालाना यानी पत्रिका के जयपुर में दूसरे आफिस जाकर पूछ लीजिए।
इसी बात की सजा यहां युवा डीएनई दयाशंकर मिश्र को भी मिली। वह काम से काम रखते थे। उन्होंने जस्ट जयपुर को बेहद कम मेनपॉवर में चलाया और खबरों पर जोर रखा। पहले उनको राजीव तिवारी ने उनको परेशान करने में शक्ति लगाई फिर संजीव आए तो उनको थोड़े ही दिन में जाना पड़ा। फिर आशीष खंडेलवाल का भी बुरा हाल है। आशीष चूंकि राजस्थान के हैं, इसलिए थोड़े सुरक्षित हैं। वैसे उनको गोविंद चतुर्वेदी का विश्वास प्राप्त है।
ऐसा ही हाल यहां कुछ समय पहले चीफ रिपोर्टर बनाए गए अशोक शर्मा का किया गया। अपना काम निकालने के बाद उनको किनारे लगा दिया गया। युवा पत्रकार समीर शर्मा जिनकी खबरें ब्यूरों में अहम हुआ करती थीं, उनको आजकल गांव-गांव घूमने में लगाया गया है। इससे पहले उनकी पत्नी अंकिता शर्मा को भी राजीव सोमा के कहने पर प्रताड़ित किया करते थे, परेशान होकर वह न्यूज टुडे चली गईं। राखी ने उनसे परेशान होकर इस्तीफा दे दिया। मजबूरी में उसे डेलीन्यूज भेजा गया।
भुवनेशजी को अवश्य ही सप्ताह में एक दो बार झालाना बैठना चाहिए, ताकि चीजें उनके संज्ञान में आ सके। युवा व्यंग्यकार सुरजीत जैसे लोग संस्थान छोड़कर गए। फोटोग्राफर दिनेश डाबी और पंकज बता देंगे कि यहां असलियत क्या है।
मिली जानकारी के अनुसार अरुण चौहान और विनोद पुरोहित भी निशाने पर हैं। विनोद को जल्द ही ठंडे बस्ते में भेजने की योजना है। पत्रिका पहले तो लोगों को ले आता है, लेकिन जैसे ही काम निकल जाता है, उसे लगता है कि अब इसकी जरूरत नहीं है। वह ऐसा भास्कर को कमजोर करने के नाम पर कर रहा है। दोनों अखबारों की जंग में नुकसान तो पत्रकार का ही है।
वैसे यहां पर दोपहर और शाम तक बड़े अधिकारी अखबार पढ़ते ही नहीं हैं। तो उनको पता कैसे चले छपा क्या है, सो प्रभावी मंडली जो चाहे करा ले जाती है। इस समय पत्रिका अखबार की जो दुर्गति हो रही है, वह इसी का प्रमाण है। इसलिए सभी पत्रकार विशेषकर वह जो इस समय भास्कर में हैं, उनसे निवेदन है कि वह किसी तरह के पत्रिका के प्रलोभन में नहीं आएं। यह राजस्थान पत्रिका के अंदरखाने के पीड़ितों की कहानी है, किसी एक आदमी का दर्द नहीं। प्रिय यशवंत जी आप सबकी आवाज आगे लाने का काम करते हैं। उम्मीद है आप युवाओं को सच्चाई से रूबरू होने में मदद करेंगे। यह सिलसिला जारी रहेगा। मेरी पहचान उजागर नहीं करने का दायित्व आपका है। सधन्यवाद।
कानाफूसी
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