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सिद्धांतों और सिंहासन के दोराहे पर खड़ी है भाजपा

लोकसभा चुनावों के नजदीक आने के साथ सभी दलों की बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। बात चाहे भाजपा की हो अथवा कांग्रेस की तो दोनों ही दल अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। यही बात क्षेत्रीय दलों के संबंध में भी समझी जा सकती है। 

लोकसभा चुनावों के नजदीक आने के साथ सभी दलों की बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। बात चाहे भाजपा की हो अथवा कांग्रेस की तो दोनों ही दल अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। यही बात क्षेत्रीय दलों के संबंध में भी समझी जा सकती है। 

स्मरण रहे कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एवं बसपा सुप्रीमो मायावती दोनों ने आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए कार्यकर्ताओं को कमर कसने की सलाह दे दी है। रही सही कसर राक्रांपा के वरिष्ठ नेता के शरद पवार को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने संबंधी बयान से पूरी कर दी है। अब जहां तक प्रश्न चुनावों का है तो निश्चित तौर पर कांग्रेस ने इस दिशा में अपनी बढ़त बना ली है। विगत दिनों हुए चिंतन शिविर से के निष्कर्ष चाहे कुछ भी रहे हों लेकिन दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो गई हैं।
 
1. आगामी लोकसभा चुनावों कांग्रेस अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए युवराज की ताजपोशी का मन बना चुकी है।
 
2. चुनावों में विजयश्री प्राप्त करने के लिए कठोर से कठोर निर्णय लेने को तैयार है।
 
इन बातों को समझाने के लिए किसी विशेष व्याख्या की आवश्यकता नहीं होनी चाहीए। यथा कांग्रेस में आरंभ से नंबर 2 रहे राहुल की ताजपोशी और उन्हें युवाओं का नेता बताकर छिपे तौर पर ही सही प्रधानमंत्री पद का घोषित करना वास्तव में कांग्रेस की एक मजबूत पहल है। जहां तक प्रश्न है कठोर फैसले लेने का तो बीते दिनों अजमल कसाब की फांसी और हाल ही में अफजल गुरु की फांसी इस बात को समझाने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस अपने मिशन 2014 को लेकर कितनी गंभीर है।
 
रही बात देशव्यापी राजनीति की तो निश्चित तौर पर देश की राजनीति आज भी दो दलों पर ही केंद्रित है। हांलाकि क्षेत्रीय दलों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन फिर भी ये छोटी पार्टियां निश्चित तौर पर इन बड़े दलों की असफलता को ही भुनाती हैं। अतः भाजपा को आज भी एक मजबूत विपक्षी की भूमिका में आना ही पड़ेगा। जहां तक भाजपा की वर्तमान स्थितियों को प्रश्न है तो निश्चित तौर पर भाजपा आज अपने की सहयोगियों से मुंह की खा रही है। राजग के सबसे बड़े दल के रूप में सर्वमान्य भाजपा आजे लगातार अपने से कम सामर्थ्‍यवान दल जद यू से समझौते कर रही है। अब जबकि प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में लगभग सभी दलों के पत्ते खुल चुके हैं। ऐसे में भाजपा की चुप्पी निश्चित तौर पर मतदाताओं के रूझान को प्रभावित करेगी। 
 
ध्यातव्य हो कि विगत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने हूबहू ऐसा ही दांव खेला था जिसके नतीजे आज सभी जानते हैं। विचारणीय बात है कि अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाला प्रत्येक मतदाता निश्चित पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी के चरित्र को देखते हुए ही उसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत देता है। ऐसे में बहुमत आने के बाद प्रत्याशी की घोषणा निश्चित तौर जनता के सब्र की परीक्षा लेना ही होगा। जहां तक भाजपा में योग्य उम्मीदवारों का प्रश्न है तो निश्चित तौर उसकी कोई कमी नहीं है। आधिकारिक तौर पर विभिन्न न्यूज चैनलों एवं एजेंसियों के द्वारा कराये गये सर्वेक्षणों से ये बात अब सिद्ध हो चुकी है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आज प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में आम जन की पहली पसंद बन चुके हैं। ऐसे में योग्य प्रत्याशी को दरकिनार करने का ये कदम भाजपा के लिए वाकई आत्मघाती साबित हो सकता है।
 
हांलाकि नरेंद्र मोदी का नाम घोषित करने से हिचकने का प्रमुख कारण नीतीश कुमार का विरोध। स्मरण रहे कि नीतीश कई बार सेक्यूलर प्रधानमंत्री की बात कह चुके हैं। रही बात उनके सेक्यूलर मापदंडों की तो कोई बड़ी बात नहीं है कि वे अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हों। अब जहां तक राजग से जदयू के अलग होने का प्रश्न है तो निश्चित तौर इसके कुछ हानि और लाभ दोनों हैं। इस हानि स्वरूप शायद भाजपा को बिहार में कुछ एक सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है, हांलाकि इसकी संभावना भी न्यूनतम है। अगर लाभ की बात करें तो उसे इस बात से समझा जा सकता है कि जदयू बिहार के बाहर पूर्णतः मृतप्राय दल है। रही बात मोदी की विकास पुरूष की छवि तो सर्वमान्य रूप से वो नीतीश कुमार से कहीं बड़ी है। अब सवाल उठता नीतीश द्वारा लगातार किये विरोध का तो ये स्पष्ट है कि उनका ये दुराग्रह कहीं न कहीं उनकी ईष्‍या से अभिप्रेरित है। ऐसे में जदयू की धमकियां सहकर गठबंधन निर्वाह करने से बेहतर अपने रास्ते अलग कर लेना। जहां तक परीक्षण का प्रश्न है तो जद यू की विश्वसनीयता का आकलन राष्ट्रपति पद के चुनाव के वक्त ही हो गया था।
 
चुनावों में मुद्दे निश्चित तौर पर बड़े कारक साबित होते हैं। ऐसे में कांग्रेस के द्वारा एक के बाद लिये गये फांसी के निर्णयों ने सौ फीसदी ये मुद्दे भाजपा के हाथ से छीन लिये हैं। भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा इसे देर से लिया निर्णय बताना वास्तव में जुबानी जमाखर्च से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जनता उनके इन कोरे तर्कों से कत्तई प्रभावित नहीं होगी। इन विषम परिस्थितयों में जब लगभग सारे दल छद्म सेक्यूलरिज्म की चादर तले पांव पसारने को तैयार बैठे हैं, भाजपा को निश्चित तौर पर एक बड़े फैसले की दरकार है। ये फैसले प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने से कम कुछ नहीं हो सकता है। लगातार भ्रष्टाचार, घोटाले और निकृष्ट राजनीति से आजिज आ चुकी जनता अब वास्तव में विकास केंद्रित शासन चाहती है। अतः अगर विकास की बात करें तो नरेंद्र मोदी से बड़ा प्रत्याशी आज पूरे देश में नहीं है। रही बात गुजरात दंगों की तो असम दंगों और उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के दंगों के बारे में क्या कहा जाएगा? 
 
गुजरात दंगों के लिए यदि नरेंद्र मोदी को अछूत बताया जाता है तो यही व्यवहार अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के संदर्भ में भी सत्य सिद्ध होनी चाहिए? जहां तक प्रश्न है न्याय का तो वास्तव में उसके दोहरे मापदंड तो कत्तई नहीं हो सकते। स्मरण रहे कि पार्टी विद डिफरेंस का दम भरने वाली भाजपा के प्रारंभिक नेता पं. दीन दयाल उपाध्याय की बात करें तो अपने एक 

संबोधन में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि, भाजपा सिद्धांत विहीन सत्ता संचालन के स्थान पर जीवन भर विपक्ष में बैठना पसंद करेगी। उनकी इन बातों का असर सभी को पता है। भाजपा आज एक बार फिर सिद्धांतों और सिंहासन के दोराहे पर खड़ी है। अब वक्त आ गया है भाजपा को अपने डिफरेंस प्रदर्शित करने का। ऐसे में सिर्फ इतना कहना ही समीचीन होगा कि भाजपा को अपनी प्रासंगिकता पहचाननी होगी। अंततः अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला, जिस दीये में जान होगी वो दिया बच जाएगा।
 
लेखक सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. 
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