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सिर काटे बेरहमी से, फिर भी तू मेहमान..!

पकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुदिन हसन चिश्ती की दरगाह में जियारत के लिए निजी यात्रा पर आने का सब ओर से विरोद्ध ही हुआ. अब इस विरोद्ध को यदि कोई सियासत का नाम दे तो यह उस की अपनी समझ और असंवेदनशीलता का प्रदर्शन ही कहा जायेगा. पड़ोसी देश पकिस्तान जो स्वतंत्रता पश्चात से ही हमारे साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करने, हमारे ऊपर तीन युद्ध थोपने व मुहँ की खाने के बाद अब आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम देने में लगा हुआ है. यही नहीं पकिस्तान की धरती को जिस प्रकार से आतंकवादियों के ट्रेनिंग शिविर और उनकी शरणस्थली के लिए खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है यह सारा विश्व जानता है.

पकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुदिन हसन चिश्ती की दरगाह में जियारत के लिए निजी यात्रा पर आने का सब ओर से विरोद्ध ही हुआ. अब इस विरोद्ध को यदि कोई सियासत का नाम दे तो यह उस की अपनी समझ और असंवेदनशीलता का प्रदर्शन ही कहा जायेगा. पड़ोसी देश पकिस्तान जो स्वतंत्रता पश्चात से ही हमारे साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करने, हमारे ऊपर तीन युद्ध थोपने व मुहँ की खाने के बाद अब आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम देने में लगा हुआ है. यही नहीं पकिस्तान की धरती को जिस प्रकार से आतंकवादियों के ट्रेनिंग शिविर और उनकी शरणस्थली के लिए खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है यह सारा विश्व जानता है.

इस वर्ष जनवरी माह में जम्मू कश्मीर की नियंत्रण रेखा के पास पाकिस्तानी सैनिकों ने एक भारतीय सैनिक का सिर काट दिया था जबकि एक अन्य भारतीय सैनिक का क्षत विक्षत शव मिला था. सर काट कर साथ ले जाने के अमानवीय कृत और अंतर्राष्टीय नियमों के उल्लंघन की धटना पर उसके ढिठाई व असहयोगपूर्ण आचरण से सारे देश में आक्रोश की लहर दौड गई थी. अशरफ की अजमेर शरीफ की निजी यात्रा ऐसे समय में हो रही है जिस समय कश्मीर में नियंत्रणरेखा पर संघर्षविराम के उल्लंघन की घटनाओं के कारण दोनों देशों के संबंधों में ठंडेपन का दौर चल रहा है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा वह कारगिल के युद्ध से पूर्व भी कर चुका है. वीरगति को प्राप्त हुये उन दो वीर भारतीय सैनिकों के परिवारवालों के साथ-साथ सारे देश की यह मांग रही है कि पकिस्तान की सरकार उस वीर सैनिक का सर भारत को लौटाए. नकारात्मक रवैये के इस दौर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की जियारत के लिए अजमेर शरीफ की यात्रा का विरोद्ध होना तो स्वाभाविक ही है.

जियारत के विरोद्द को सियासत का नाम देनेवालो को यह समझना होगा कि ये विरोद्ध महज सियासती ना होकर जज्बाती अधिक हैं. देश के सम्मान के साथ-साथ वीरगति को प्राप्त हुये वीर सैनिकों के बलिदान का सम्मान इस विरोद्ध के पीछे बड़ा कारण है जिसके चलते अजमेर शरीफ की दरगाह के दीवान सैयद जेनुल आबेदीन ने भी भारतीय सीमा में सैनिक के सिर काटकर ले जाने की अमानवीय घटना के विरोध में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की अजमेर दरगाह की जियारत का बहिष्कार किए जाने का निर्णय लिया है. इतना ही नहीं दरगाह के दीवान ने तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार और उनके धर्मस्थलों की असुरक्षा के विरोध प्रकट करते हुये पकिस्तान की सरकार पर सवाल खड़े किये हैं. उनका यह कहना है कि सीमा पर षडयंत्र एवं कायरतापूर्ण तरीके से भारतीय सेना के जवानों के सिर काट कर ले जाना और शहीदों के सिर वापस नहीं लौटाना अंतरराष्ट्रीय सैन्य परंपराओं का उल्लंघन है. यह न सिर्फ मानवीय मूल्यों का हनन है बल्कि इस्लाम धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.

देश भर में हो रहे इस विरोद्ध में सौरभ कालिया के पिता के साथ-साथ अभी हाल में मारे गए सैनिकों के परिवारवाले, राजनितिक दल, अनेक सामाजिक संगठन व अजमेर के व्यापारी भी उतर आए हैं. अंतर्राष्ट्रीय शिष्टाचार के नाते पाकी प्रधानमंत्री को उनकी निजी व धार्मिक यात्रा पर आवश्यक प्रबंध व सुरक्षा मुहैया करवाना तो समझ में आता है. परन्तु भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा जयपुर में पाकिस्तान के पीएम की आगवानी व दोपहर का भोजन करवाना समझ से परे है. शहीद सौरभकालिया, शहीद हेमराज और शहीद सुधाकर के घरवालों के साथ-साथ सारा देश इस आवभगत और सरकारी भोजन पर सवाल उठा रहा है. कूटनीति के संबंधों को बनाये रखने के लिए संवाद एक आवश्यक माध्यम है. इसलिए देश को बातचीत से कोई ऐतराज नहीं है परन्तु बातचीत से पहले पाकिस्तान को एक कड़ा सन्देश भी तो जाना चाहिए कि इस प्रकार की घटनाओं की यदि पुनरावृति हुई तो सख्त जवाबी कारवाई भी की जायेगी.  

निजी यात्रा पर भारत पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री परवेज अशरफ का गर्मजोशी से स्‍वागत करने व उनके साथ दोपहर का भोजन करने पर उठ रहे विवाद पर भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का सफाई पेश करते हुये ये कहना कि उन्होंने औपचारिक रूप से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का स्वागत किया है, हजम नहीं होता. क्या भारत सरकार के पास कोई और विकल्प नहीं था ? एलओसी पर बेवजह फायरिंग और सीमा का उल्लंघन, इसके बाद दो भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या और अभी हाल में हैदराबाद में हुये बमब्लास्ट की घटना में पकिस्तान पर शक होने के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कडुवाहट चली आ रही है. ऐसे में वहाँ के प्रधान मंत्री की निजी यात्रा पर स्वागत व आवभगत पर विवाद उठाना लाजमी है.  

अजमेर बार एसोसिएशन के एक प्रतिनिधि राजेश टंडन का तो यहाँ तक कहना है कि जिन सड़कों से अशरफ का काफिला गुजरेगा, उन सड़कों को काफिले के गुरजने के बाद पानी से धोया जाएगा. विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा दोपहर का भोज आयोजित करने को शर्मनाक बताते हुये उनका कहना है कि अशरफ का इस तरह उनका स्वागत नहीं करना चाहिए. यह भारतीयों और शहीदों के परिवारों की भावनाओं का अपमान है. यह विरोद्ध पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सैनिकों को मारे जाने के विरोध में है. उन्होंने देश के नागरिकों और शहीदों के परिजनों की इस मांग से सहमति जताते हुये कहा कि पाकिस्तान को शहीद भारतीय सैनिक का सर पूरे सम्मान के साथ भारत के हवाले करना चाहिए उसके बाद ही भारत सरकार को पकिस्तान के किसी शीर्ष प्रतिनिधि से बातचीत या दौरा करने की अनुमति देनी चाहिए. परन्तु हाथी और ऊंट के साथ अवगानी करनेवाली सरकार के किसी भी रुख से ऐसा लगता नहीं.

लेखक विनायक शर्मा साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

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