: बिहार में पत्रकारिता का सच – खबर को विज्ञापन के रूप में लिखने की मजबूरी : पत्रकार यानी पत्र करने वाला। पत्र करने का मतलब लिखने वाला। वह इंसान जो समाज में घटित होने वाली घटनाओं को लिखता है और फ़िर उसे समाज के सुपुर्द कर देता है। हालांकि यह काम वह अकेले नहीं करता है। इसके लिये अनेक लोगों और मशीनों की आवश्यकता होती है। एक घटना के खबर बनने की यात्रा बड़ी लंबी है। इस लंबी यात्रा के अत्यंत ही महत्वपूर्ण पड़ावों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव वह है जब कोई खबर पत्रकार द्वारा लिखे जाने के बाद डेस्क पर पहुंचता है।
डेस्क पर बैठा आदमी भी जाति का पत्रकार ही होता है, लेकिन उसकी केवल एक यही जाति नहीं होती। वह खबर को अपने हिसाब से रंग देने की कोशिश करता है और फ़िर खबर पहुंचती है उन लोगों के पास जिन्हें यह तय करने का अधिकार होता है कि यह खबर छपेगी या नहीं। ये भी पत्रकार होते हैं, लेकिन ये ऐसे वैसे पत्रकार नहीं होते। अधिकार वाले पत्रकार होते हैं। वर्तमान में बिहार में पत्रकारिता की कमान इन लोगों ने ही संभाल रखी है।
आगामी 25 नवंबर को बिहार के लोगों को सरकार का रिपोर्ट कार्ड देखने का मौका मिलेगा। सरकार बहुत चालू चीज है। चालू यानी चालाक इस मायने में कि वह कोई भी पाप खुद नहीं करना चाहती है। वह अपनी प्रशंसा पत्रकारों से लिखवा रही है। सभी अखबारों के संपादकों को यह नोटिस दे दी गई है कि आप अपने वरिष्ठ पत्रकारों से सरकार की प्रशंसा में कसीदे लिखवाइये, हम उसे विज्ञापन मान लेंगे। विज्ञापन वह भी एक पेज का। संपादकों ने भी मौके को खूब भुनाना चाहा है। सभी संपादक इस होड़ में लगे हैं कि कौन सबसे अधिक कसीदे लिखवाने में सफ़ल होता है।
कई अखबारों में तो वरिष्ठ पत्रकारों को इसके लिये विशेष तोहफ़ों से नवाजने का वादा भी किया गया है। आम आदमी के लिये खबर को विज्ञापन के रूप में देखना बिल्कुल वैसा ही है जैसे अखबारों में विद्या बालन या मल्लिका शेरावत की मांसल बदन को देखना। लेकिन एक पत्रकार के लिये ऐसा नहीं होता। एक सच्चे पत्रकार के लिये तो यह डूब मरने के समान होता है। लेकिन मौजूदा हालात में एक पत्रकार अब झोलटंगवा पत्रकार तो रहेगा नहीं और रहेगा तो फ़िर उसके घर का खर्च कैसे चलेगा। बेचारा जिन्दगी की गाड़ी को खींचने के क्रम में वह तो यह भी भूल जाता है कि उसका काम खबर लिखना है न कि विज्ञापन लिखना।
खैर, जब एक पत्रकार खबर की जगह पर विज्ञापन लिख रहा होता है तब उसे इस बात का हमेशा ख्याल रखना पड़ता है कि विज्ञापन में कोई नकारात्मक बात नहीं हो। मसलन यदि एक अय्याश राजा के बारे में विज्ञापन लिखने वाला खबरनवीस इस बात को कुछ ऐसा लिखेगा – देश का राजा बहुत उदार है। उसके दिल में महिलाओं के लिये अपार श्रद्धा है। जहां जाते हैं महिलाओं की पूजा करते हैं, उनकी आरती उतारते हैं और फ़िर उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिये उन्हें राजकोष से नकद भुगतान भी करता है। यह तो केवल एक बानगी हुई। अब एक दूसरा उदाहरण देखिये। मैं जिस अखबार के लिये काम करता हूं, उस अखबार के संपादक महोदय ने मुझसे विज्ञापन लिखने को कहा। दो विषय सुझाये – उद्योग और वित्त। मैंने कहा कि पिछले 6 वर्षों में केवल 11 फ़ीसदी निवेश प्रस्ताव बिहार में साकार हुए हैं। जबकि 89 फ़ीसदी प्रस्ताव या तो अभी भी अधर में लटके हैं या फ़िर उनका कोई अस्तित्व नहीं है।
मेरे संपादक ने मुझसे कहा कि तुम कुछ भी लिखो लेकिन हर वाक्य से “जै नीतीश” अवश्य झलकना चाहिये। अब बताइये मुझ जैसा एक पत्रकार ऐसा कैसे लिख सकता है। अब वित्त की बात करें तो कल ही सूबे के वित्त मंत्री सह उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने इसका रहस्योद्घाटन किया कि पिछले 6 महीने में कृषि ॠण केवल 29 फ़ीसदी ही वितरित किये जा सके हैं। यह भी सरकारी आंकड़ा है। वास्तविकता कुछ और ही है। अब केवल यह दिखाकर कि वर्ष 2003-04 में कृषि ॠण वितरण केवल 22 फ़ीसदी हुआ था, यह लिखना कितना कठिन है कि बिहार में कृषि ॠण वितरण में इजाफ़ा हुआ। बहरहाल, एक पत्रकार के सामने अनेक चुनौतियां होती हैं। सबसे बड़ी चुनौती व्यक्तिगत चुनौतियां हैं। इसलिये जब एक पत्रकार खबर की जगह विज्ञापन लिखे, तो यकीन मानिये उसमें उसकी मर्जी नहीं, बल्कि उपरवालों की मर्जी होती है। उपरवालों का मतलब तो आप समझ ही चुके होंगे।
लेखक नवल किशोर कुमार पटना के युवा व तेजतर्रार पत्रकार हैं. अपना बिहार डॉट ओआरजी के संस्थापक और संपादक हैं.





