Harishankar Shahi : प्रतापगढ़ के बालीपुर विवाद के बारे में खूब स्यापा पढ़ने में आ रहा है. इसमें पुलिस के एक अधिकारी जो मुस्लिम भी थे, उनकी मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम की शुरुआत में बालीपुर ग्राम प्रधान की हत्या हुई थी और उसके बाद पुलिस फायरिंग में उसके भाई की मौत हो गई थी. लेकिन स्यापा के रंग देखिये. सारा जोश जूनून केवल साहब के मरने पर है. इन दो और आम लोगों के मरने पर किसी ने शब्द भी खर्च नहीं किये. साहब मुसलमान थे और पांच वक्त के नमाज़ी व देशभक्त थे, यह बातें खूब फेस्बूकियाई जा रही है. लेकिन उन दो अन्य मरने वालों का नाम लेना फेसबुक एक्टिविज्म और पत्रकारिता के लिए पाप होता जा रहा है.
अधिकारी के नाम पर सीधा निशाना कुंडा से विधायक और मंत्री रघुराज प्रताप सिंह पर साधकर अपनी राजनीति को चमकाने का अच्छा प्रदर्शन है. किसी को मार डालना अच्छा नहीं हो सकता पर क्या मरने में भी भेद विभेद रखा जाना चाहिए. अधिकारी के मरने पर मंत्री को निशाने पर लेने से पहले क्या पुलिस फायरिंग में मरने वाले के प्रति चंद शब्द खर्च कर देना गुनाह हो जाएगा. पत्रकारिता में एक्टिविज्म वाले अब मौके के साथ राजनीति हल करने लगते हैं. तो मुस्लिम समुदाय के पुलिस अधिकारी के बहाने मंत्री से सियासी खुन्नस निकाल लेने का काम शुरू हो चूका है. कलम के धनी माने जाने वाले लोग भी कोरस गान कर रहे हैं.
इलाहाबाद के एक माफिया नेता जिन्होंने अपनी ही पिछड़े वर्ग की एक पार्टी के नेता की बेटियों पर दबाव बनाकर उन्हें उनकी पिता की मौत की बाद निकलने और पार्टी के टूटने पर मजबूर कर दिया. उनको इस कांड की राजनीति में एक हीरो की तरह भी पेश करते हुए कुछ फेसबुक पोस्ट पढ़ने को मिली हैं. एक्टिविज्म को लाइक करना एक्टिविस्ट होना अच्छी बात है लेकिन हमेशा ग्लैमर साधने की कोशिश करने वाले की बातों को एकदम से यकीन कर लेना पता नहीं कैसा होगा. श्रद्धांजली और विरोध का दौर शुरू हो गया है जिसमें एक पक्ष में साहब के सहारे राजनीति हल करने वाले है जिनका उद्देश्य मंत्री को निशाना बनाना है और दूसरे पक्ष में मंत्री है. लेकिन इसी बीच साहब से भी पहले मरे उन दो लोगों को एक बार याद करते हुए उनके लिए भी चन्द शब्द दर्ज करना पत्रकारिता और इसके सहारे के एक्टिविज्म हल करने वालों के लिए शायद जरूरी ना हो. बालीपुर ग्राम प्रधान और उनके भाई को श्रद्धान्जलि. इनकी गलती इतनी थी यह साहब नहीं थे. और इनके सहारे राजनीति हल नहीं हो पाती. मौत और हत्या भी राजनैतिक वजन मांगती है. और अब पत्रकारिता के शब्द वजन के आधार पर लुढकते हैं.
हरिशंकर शाही के फेसबुक वॉल से.






