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दिल्ली

सीबीआई ने इस बार प्रधानमंत्री को ही फंसा दिया!

सीबीआई के बारे में कहा जाता है कि यह विरोधियों को फंसाने का सबसे बड़ा तंत्र है, लेकिन इस बार सीबीआई ने ऐसा दांव मारा है कि सरकार तो सरकार, उसके सरताज यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उसके जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। कोयला-घोटाले पर अपनी 14वीं एफआईआर में सीबीआई ने ‘हिंडालको’ के आदित्य बिड़ला ग्रुप और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख को फंसाया है लेकिन पारेख ने कहा है कि बिड़ला को कोयला-खदान देने का दोष यदि उनका है तो उनसे बड़ा दोष तो प्रधानमंत्री का है, क्योंकि उस समय वे ही कोयला मंत्री थे। उनके दस्तखत के बिना पारेख की सिफारिश की कोई कीमत नहीं होती।

सीबीआई के बारे में कहा जाता है कि यह विरोधियों को फंसाने का सबसे बड़ा तंत्र है, लेकिन इस बार सीबीआई ने ऐसा दांव मारा है कि सरकार तो सरकार, उसके सरताज यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उसके जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। कोयला-घोटाले पर अपनी 14वीं एफआईआर में सीबीआई ने ‘हिंडालको’ के आदित्य बिड़ला ग्रुप और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख को फंसाया है लेकिन पारेख ने कहा है कि बिड़ला को कोयला-खदान देने का दोष यदि उनका है तो उनसे बड़ा दोष तो प्रधानमंत्री का है, क्योंकि उस समय वे ही कोयला मंत्री थे। उनके दस्तखत के बिना पारेख की सिफारिश की कोई कीमत नहीं होती।

कोयला-खदानों की बंदरबांट में सरकार को लगभग दो लाख करोड़ रुपए का अनुमानित घाटा हुआ है। इस घाटे या लूटपाट को अनावृत्त करने का काम सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन में सीबीआई कर रही है। कोयले की इस खोज-पड़ताल में अब तक देश के अनेक जाने-माने उद्योगपतियों का मुंह काला हो चुका है। उनमें से कई कांग्रेस के सांसद भी हैं। उन पर शक है कि उन्होंने खदानों की नीलामी की प्रस्तावित नीति को उलटवा दिया। उसके बदले उन्होंने मनमाने ढंग से खदानें अपने नाम करवा लीं।

इस प्रक्रिया में अफसरों और नेताओं को लाखों-करोड़ों की रिश्वत मिलने का पूरा अंदेशा है। कोयला मंत्रालय के राज्य मंत्रियों को मंत्रिपद से हाथ धोना पड़ा है और उनकी जांच भी हो रही है। कोयला-खदानें बांटते वक्त यह ध्यान भी नहीं रखा गया कि जिन्हें खदानें दी जा रही है, वे उस कोयले का क्या करेंगे? उनके कारखाने हैं या नहीं, उन्हें कोयले की जरूरत है या नहीं, वे कोयला खोदकर निकाल भी सकते हैं या नहीं? इन सब कसौटियों को भी कई मामलों में ताक पर रख दिया गया था। कई ऐसे उद्योगपतियों को खदानें दे दी गईं, जिनका एक मात्र लक्ष्य उनको कई गुना दाम पर बेचकर अंधाधुंध मुनाफा कमाना था। ज्यादातर खदानों में अभी तक खुदाई शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन खदानें खुदें या न खुदें, सरकार की कब्र खुदना शुरू हो गई है।

कोयला खदानों को लेकर सरकार इतनी बदनाम हो गई कि बेचारे प्रधानमंत्री को टीवी और रेडियो चैनलों पर आकर सफाई देनी पड़ी। संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ और सांसदों ने शिष्टता की मर्यादा भी नहीं रखी। उन्होंने ‘प्रधानमंत्री चोर हैं’ जैसे उत्तेजक नारे भी लगाए। अभी जैसे ही आदित्य बिड़ला ग्रुप के कुमारमंगलम बिड़ला का नाम उछला, सारे उद्योग-जगत में बेचैनी फैल गई। अनेक उद्योगपतियों का कहना है कि बिड़ला-परिवार को बदनाम करने का यह सीबीआई का पैंतरा आत्मघाती सिद्ध होगा। इससे अनेक उद्योगपति हतोत्साहित होंगे।

कुमारमंगलम बिड़ला को आरोपी बनाने का अप्रत्यक्ष अर्थ यह है कि उन्होंने अफसरों को मोटी रिश्वत दी होगी और जो ओडिशा की तलवीरा-2 खदान उनको दी गई है, उसके पीछे कोई न कोई भारी षड्यंत्र होगा। सीबीआई का कहना है कि उसके पास ठोस प्रमाण हैं, जिनके आधार पर उसने कुमारमंगलम के खिलाफ ‘प्रथम सूचना रपट’ लिखवाई।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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