Pankaj Srivastava : ‘वंदेमातरम्’ विवाद रह-रह कर सर उठाता रहता है। इस बार छिड़े विवाद के “दुल्हेमियां” यानी बीएसपी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ( हुजूर,लोकसभा के सत्रावसान के समय ‘वंदेमातरम्’ बजते ही उठ कर चल दिए थे) कहते हैं कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी के आगे सिर नहीं झुकाया जाता। उनकी नजर में ‘वंदे मातरम्’ भारत के देवीस्वरूप की आराधना है, लिहाजा गाना हराम है। पर क्या सचमुच मामला इतना सीधा और सादा है…?
1. पहली बात तो ये कि लोकसभा में वंदेमातरम् गाने की जरूरत नहीं होती। रिकॉर्ड बजता है। बस सम्मान में खड़ा होना जरूरी है। सुनना गैरइस्लामी होता तो मुसलमान, आरती और भजन सुनकर कान में रुई ठूँस लेते। मैंने तो ऐसा कहीं नहीं देखा। उल्टे, रुपहली दुनिया से निकला सबसे शानदार भजन यानी ‘’मन तड़पत हरि दर्शन को आज” मुसलमानों का ही रचा है। लिखा शकील बंदायूनी ने, संगीत नौशाद का और गाया मो.रफी ने। फिल्म थी बैजू बावरा।
2. ‘वंदेमातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा हासिल है। सत्रावसान में उसे बजाया जाना एक नियम है। अगर कोई सांसद बनना चाहता है तो उसे इस नियम का पालन करना ही होगा। वरना बाहर रहकर ऐसी तहरीक चलाए कि ‘वंदेमातरम्’ नियमों की किताब से रुखसत पाए।
3. जनाब शफीकुर्रहमान लोकसभा में चार बरस तो गुजार ही चुके हैं ( पहले जीतें हों तो पता नहीं)। संसद में उन्होंने कोई और योगदान दिया हो, ऐसा लगता नहीं। इन चार सालों में ‘वंदेमातरम्’ का मुद्दा एक बार भी नहीं उठाया। हां, अल्लाह के अलावा किसी के आगे सिर ना झुकाने का दावा करने वाले बर्क साहब को बीएसपी सुप्रीमो मायावती के सामने दस्तबस्ता झुकते कई बार देखा गया है। यानी उनकी कोशिश इस मुद्दे को अगले चुनाव में भुनाने की है। ये वोटों के लिए मजहब की तिजारत है।
4. इसमें शक नही कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास आनंदमठ मुस्लिम विरोध से भरा हुआ है। ‘वंदेमातरम’ इसी का हिस्सा है। लेकिन इसके सिर्फ पहले दो बंद को ही राष्ट्रगीत की मान्यता है जिसका एक भी शब्द सांप्रदायिक नहीं है। राष्ट्रगीत का दर्जा देने से पहले संविधान निर्माताओं ने इसके तमाम पहलुओं पर काफी बहस की थी। इस गीत को एक स्वतंत्र रचना के रूप में स्वीकार किया गया जिसका आनंदमठ से कोई लेना-देना नहीं।
5. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदेमातरम्’ बिलकुल सेक्युलर रूप में ही इस्तेमाल हुआ। ये देश के हर कोने में बिजली की तरह कौंधा और हजारों लोग इसे गाते हुए कुर्बान हो गए। ऐसी क्रांतिकारी भूमिका किसी दूसरे नारे या गीत की नहीं रही। भगत सिंह और एचएसआरए के उनके साथी भी ‘वंदेमातरम्’ बोलते-गाते थे और कांग्रेस के अधिवेशनों में इसे तब भी गाया जाता था जब मौलाना आजाद अध्यक्ष थे। मौलाना आजाद का इस्लाम ज्ञान, बर्क साहब से हजार दर्जे बेहतर था, इसका दावा कर सकता हूँ।
6. जनगणमन के खिलाफ दुष्प्रचार मे जुटी संघ बिरादरी ने आजादी के बाद ‘वंदेमातरम्’ गाने को देशभक्ति की कसौटी बताना शुरू किया। सांप्रदायिक इरादों से भरे आयोजनों में ‘वंदेमातरम्’ का घोष मुसलमानों को चिढ़ाने वाले अंदाज में किया जाता है। और मुसलमानों के एक हिस्से ने चिढ़कर उनका काम आसान कर दिया। इस बिरादरी ने ‘वंदेमातरम्’ को हड़पने मे काफी कामयाबी पा ली है, खासतौर पर इसलिए भी कि प्रगतिशील बिरादरी इससे बिदकती रही।
7. वैसे, इस गीत का मां को सलाम करने का अर्थ भी कम प्रचलित नहीं है। ए.आर.रहमान जब ‘मां तुझे सलाम’ गाते हुए वंदे मातरम् का आलाप लेते हैं तो ये अर्थ और निखरकर सामने आता है।
8. लुब्बोलुआब ये कि ये बहस निहायत गैरजरूरी और शातिर इरादों से भरी है। बर्क साहब ने ‘बनाने’ की कोशिश की है और तमाम भाई लोग खुशी-खुशी ‘बन’ भी रहे हैं।
9.आखिरी बात ये कि जिन्हे चुनाव नहीं लड़ना, उन्हें सच बोलने से परहेज नहीं करना चाहिए। फिर चाहे हिंदू नाराज हों या मुसलमान।
आईबीएन7 में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.






