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सुप्रीम कोर्ट ने सेबी से पूछा- क्‍यों नहीं हुई सहारा समूह की सम्‍पत्ति जब्‍त?

नई दिल्ली : सहारा समूह को आज उस समय बड़ा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने यह कह दिया कि न्यायिक आदेश के बावजूद निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपया नहीं लौटाने के मामले में सेबी उसकी दो कंपनियों के खाते और संपत्ति जब्त करने के लिये स्वतंत्र है।

नई दिल्ली : सहारा समूह को आज उस समय बड़ा झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने यह कह दिया कि न्यायिक आदेश के बावजूद निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपया नहीं लौटाने के मामले में सेबी उसकी दो कंपनियों के खाते और संपत्ति जब्त करने के लिये स्वतंत्र है।

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की खंडपीठ ने 31 अगस्त, 2012 के आदेश के अनुरूप सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कार्पोरेशन के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं करने के कारण सेबी को भी आड़े हाथ लिया। इस आदेश के तहत न्यायालय ने सेबी को इन कंपनियों के खाते सील करने और संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही सहारा समूह के खिलाफ न्यायालय के आदेश पर अमल नहीं करने के संबंध में अवमानना की कार्यवाही का नोटिस भी जारी किया और समूह को नोटिस का जवाब देने के लिए चार सप्‍ताह का समय दिया है।
 
न्यायालय ने आज सेबी से जानना चाहा कि उसने सहारा समूह के खिलाफ फैसले पर अमल की दिशा में क्या किया है। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘आप क्या कदम उठा रहे हैं? आप कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। फैसले में आपसे कहा गया था कि आपको क्या करना है लेकिन आप वह नहीं कर रहे हैं।’’ इस पर सेबी ने कहा कि वह कार्रवाई कर रहा है और उसने कंपनी को नोटिस जारी करने के साथ ही बैंक खाते सील करने के लिये मुंबई की दीवानी अदालत से भी संपर्क किया है।
 
न्यायाधीश सेबी के इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुये और उन्होंने कहा कि नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है। सेबी को पिछले साल के आदेश का पालन करना होगा। न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘आपने नोटिस क्यों दिया, और कार्रवाई क्यों नहीं की। आपको हमारे आदेश पर अमल करना है।’’ 
 
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कंपनियों के खिलाफ उसके समक्ष लंबित अवमानना की कार्यवाही इस समूह के खिलाफ सेबी की कार्रवाई में बाधक नहीं होगी। शीर्ष अदालत ने गत वर्ष 31 अगस्त को सहारा समूह की इन दो कंपनियों को निवेशकों का करीब 24 हजार करोड़ रुपया तीन महीने के भीतर 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने आम निवेशकों से धन एकत्र करने के दौरान नियम कानूनों के उल्लंघन के लिये इन कंपनियों की तीखी आलोचना की थी। न्यायालय ने कहा था कि इस तरह के आर्थिक अपराधों से सख्ती से निबटना चाहिए।
 
दूसरी ओर, सहारा समूह ने धनराशि नहीं लौटाने को न्यायोचित ठहराते हुये कहा कि न्यायालय का फैसला आने से पहले ही निवेशकों का अधिकांश धन लौटाया जा चुका है। इन कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा कि कुछ भी बकाया नहीं है और दस हजार करोड़ रुपए जमा कराना मुश्किल है। न्यायालय सहारा समूह की दो कंपनियों के खिलाफ सेबी की अवमानना कार्यवाही के लिये दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
 
इससे पहले, पांच दिसंबर को इस समूह को तत्काल 5120 करोड़ रुपए का भुगतान करने पर अपने तीन करोड़ से अधिक निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपए 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने के लिये शीर्ष अदालत से नौ सप्ताह का समय मिल गया था। प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सहारा समूह को कि 5120 करोड रुपए का डिमांड ड्राफ्ट तत्काल सेबी को सौंपने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने कहा था कि शेष राशि फरवरी के पहले सप्ताह तक दो किश्तों में सेबी के पास जमा करानी होगी।
 
सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन ने 13 मार्च 2008 को 19400.87 करोड़ रुपए और सहारा हाउसिंग इंडिया कापरेरेशन ने 6380.50 करोड़ रुपए एकत्र किये थे। लेकिन समय से पहले वापस ले लिए गए निवेश के बाद इन कंपनियों पर 31 अगस्त को निवेशकों का कुल 24029.73 करोड़ रुपए बकाया था। इस समूह को करीब 38 हजार करोड़ रुपए का भुगतान करना पड सकता है जिसमें 24029.73 करोड़ रुपए मूल धन और करीब 14 हजार करोड़ रुपए ब्याज शामिल है। (एजेंसी)

 

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