सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा मुज़फ्फरनगर सहित समाजवादी पार्टी के कार्यकाल में हुए सभी दंगों की सीबीआई जांच कराये जाने सम्बन्धी पीआईएल में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के दायर हलफनामे में कहा गया है कि मुजफ्फरनगर दंगों की तुलना 2002 के गुजरात दंगों से नहीं की जा सकती है. गृह सचिव कमल सक्सेना द्वारा दायर हलफनामे में राज्य सरकार के कार्यों का बचाव करते हुए इस बात से इनकार किया गया है कि सरकार के कर्मचारियों ने किसी धर्म-विशेष के प्रति पक्षपात किया है.
राज्य सरकार ने इस बात को भी पूरी तरह गलत बताया है कि मुज़फ्फरनगर दंगे 27 अगस्त 2013 के छेड़छाड़ और तिहरे हत्याकांड से जुड़ा हुआ है. यहाँ तक कि मृतकों की अंत्येष्ठी के बाद पथराव और आगजनी, 30 अगस्त को जुमे की नमाज़ के बाद शहीद चौक पर भारी भीड़ के जमा होने तथा 31 तारीख को जाट समुदाय द्वारा पंचायत आयोजित किये जाने जैसे अभिलेखों पर उपलब्ध तथ्यों को भी राज्य सरकार ने हलफनामे पर इनकार किया है.
डॉ ठाकुर के इस आरोप कि मार्च 2012 के बाद राज्य में कई साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं, के विषय में हलफनामे में कहा गया है कि “उत्तर प्रदेश राज्य के देश के सबसे बड़े राज्यों में होने के कारण क़ानून व्यवस्था सम्बंधित कई सारी घटनाएं होती ही रहती हैं” और उनसे “अंततोगत्वा और तेजी के साथ” निपटा जाता है, यद्यपि उनके द्वारा मथुरा, प्रतापगढ़, बरेली, फैजाबाद सहित कई दंगों के सम्बन्ध में प्रस्तुत ढिलाई के बारे में हलफनामे में कोई भी तथ्यपरक बात नहीं बतायी गयी हैं
इसी प्रकार से इस हलफनामे में लखनऊ पुलिस द्वारा 18 अगस्त 2012 को म्यांमार और असम में मुस्लिमों पर किये गए उत्पीडन के विरोध में आयोजित प्रदर्शन में बुद्ध पार्क में किये गए भारी तोड़फोड़ और जुलाई 2013 में शिया-सुन्नी दंगों में की गयी कमजोर कार्यवाही के सम्बन्ध में भी स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी है.





