अभी पोद्दार को लिखी चिट्ठी से पता चला कि आप का जनसंदेश टाइम्स लेखकों को पारिश्रमिक भी देता था। जो कि अब छह महीने से पोद्दार दाब के बैठे हैं। ए भाई कब से? यह तो भाई नई सूचना है। अभी तक तो आप अपने अखबार से लगायत फ़ेसबुक पर लिख-लिख कर यही कह रहे थे कि हम पैसा नहीं दे पा रहे हैं। और कि फ़ेसबुक पर तो कई उत्साहियों ने अपना वेतन तक देने की पेशकश कर दी थी। मैंने तो तब एक लंबा लेख भी लिखा था कि हिंदी लेखकों और पत्रकारों के साथ घटतौली की अनंत कथा। पर आपने उस लेख पर सांस भी नहीं ली। हां यह ज़रूर हुआ कि उस लेख के बाद आप ने लेखकों से पैसा न लेने की अपील लिखनी ज़रूर बंद कर दी।
सच तो यह है सुभाष राय जी आप ने जनसंदेश टाइम्स के मार्फ़त लेखकों में सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति की औए एक खेमे की गोद में जा कर बैठ गए। उन्होंने कहा उठो तो आप उठ गए। उन्होंने कहा बैठो तो आप बैठ गए। कभी कभार लेट भी गए। और साहित्यिक स्पेस देने का स्वांग भरते रहे। राजनीति करना और बात है, साहित्यिक स्पेस देना और बात। गुड आप खाएं और कान कोई और छेदाय, यह आज तक कभी किसी समाज में हुआ नहीं। खेत खाय गदहा मार खाय जुलहा ज़रूर बार-बार होता रहा है, रहेगा।
अब जिन लेखकों का पारिश्रमिक आप मार कर जा चुके हैं उन लेखकों का क्या जुलाहा वाला हाल नहीं हुआ? एक बात और बताऊं आप को। जनसत्ता जब शुरू हुआ तो विज्ञापन का टोटा बहुत रहता था। तो वह बड़ी बड़ी खबरें छापता था। फ़ीचर छापता था। यही टोटा आप के जनसंदेश में भी था। आप के पास बड़ी बड़ी खबरें नहीं थीं, फ़ीचर नहीं था तो आपने लेखकीय सरोकार खोज लिया। इतने ज़्यादा पैसे वाले के अखबार में लोगों को कम वेतन पर रखना आप को शुरू में ही कैसे सुहाया? बता सकेंगे आप? लेखकों की तो खैर बात छोड़ ही दें। पैसे के लिए लोग लिखते भी नहीं। आप ने बार – बार आपनी चिट्ठी में सम्मान का रोना जो रोया है न, बस ये लेखक यही भर चाहते हैं। कुछ और नहीं। पर दिक्कत यह है कि जब लोग नए-नए संपादक बनते हैं तो बनिए को तरह-तरह से बताते फिरते हैं कि ऐसे-ऐसे पैसा बच सकता है। और राजा बेटा बन कर घूमते रहते हैं। जब अपने पेट पर लात पड़ती है तो सारे आदर्श, मूल्य और जाने क्या क्या याद आ जाता है।
एक एसपी सिंह संपादक हुए हैं। पूरा नाम सुरेंद्र प्रताप सिंह। आजतक से जाने जाते हैं। रविवार में भी थे। नवभारत टाइम्स में समीर जैन को एक से एक नुस्खे बताते थे पैसे बचाने के। डेढ हज़ार, दो हज़ार जब कनवेंस अलाउंस था दिल्ली में रिपोर्टरों का तब वह डेढ दो हज़ार पर स्ट्रिंगर रखवाते थे। पर जब अपने पर आई तो सीधे राज्यसभा चले गए सवाल उठवाने। बड़े-बड़े किस्से हैं मेरे पास ऐसे संपादकों के। कि राजा का बाजा बजाने के चक्कर में बहुत सारे साथियों का बाजा बजवा गए हैं। आप कोई एक अकेले नहीं हैं सुभाष राय जी। समूची संपादकों की फ़ौज यत्र-तत्र खड़ी है जो अपने ज़रा से फ़ायदे के लिए अखबार मालिकों के आगे कर्मचारियों, सहयोगियों के मसले पर जयचंद, मानसिंह, विभीषण बन कर खड़े हो जाते हैं। और जब अपने पर आती है उन्हें राणा प्रताप याद आ जाते हैं। क्रांति और जाने क्या-क्या आदर्श, मूल्य आदि इत्यादि आ जाते है। पाब्लो नेरुदा, नाजिम हिकमत, दुष्यंत कुमार याद आ जाते हैं। खुद तो गदहा बन कर खेत खा जाते हैं, बिचारे जुलाहों को पिटने के लिए छोड़ जाते हैं। यह यों ही थोड़े ही हो गया है कि अखबारों में आज की तारीख में भी लोग दो चार पांच हज़ार की नौकरी करने को अभिशप्त हो गए हैं। इन्हीं गधे संपादकों की कृपा है, कुछ और नहीं। आगे फिर कहीं संपादक बनिएगा तो याद रखिएगा कि गधा बन कर खेत खा कर पिटने के लिए सहयोगियों और लेखकों को जुलाहा मत बनाइएगा। आप कवि हैं, बाकी भडुए, दलाल टाइप साक्षर संपादकों से सचमुच कुछ अलग भी हैं। सो बिन मांगी राय दे दी है। आप जल्दी ही कहीं अच्छी जगह फिर संपादक बनें और यह गलतियां करने से बचें यही कामना है। क्यों कि अभी कहीं बड़ी मुग्धता के साथ आप ने लिखा है कि बाबूलाल कुशवाहा ने कभी अपने संपादक से मिलने की कोशिश नहीं की और मैं भी कभी उन से मिलने नहीं गया।
क्या कवि लोग इतने नादान होते हैं? अरे कुशवाहा कैसे मिलते भला आप से? वह तो एक तो तब नोट गिनने से फ़ुर्सत नहीं पाए होंगे। दूसरे ये पैसे वाले लोग अपने चाकरों से नहीं मिलते। आप अपने को मानते रहे होंगे संपादक पर वह आप को चाकर समझता रहा होगा। और आप को क्या लगता है अच्छा बुरा जो भी आप के साथ दुर्भाग्य से घटा है, वह सब बिना कुशवाहा या सौरभ जैन आदि की मर्जी के घटा है? बहुत भोले हैं भई आप सुभाष जी। चलिए एक वाकया आप को बताता चलता हूं।
एक समय स्वतंत्र भारत और पायनियर लखनऊ के सब से बड़े अखबार थे। जयपुरिया ने इसे थापर को बेच दिया। यह एक लंबी कहानी है। पर थापर भी एक बार लखनऊ आए पायनियर कंपनी के शेयर होल्डर्स की मीटिंग में बतौर चेयरमैन। तब यह ताज होटल नहीं बना था। सो क्लार्क अवध होटल में मीटिग हुई। एयरपोर्ट से थापर होटल आए और गए। पर तब विधान सभा मार्ग स्थित पायनियर स्वतंत्र भारत का दफ़्तर था, रास्ते में। लेकिन थापर ज़रा देर रुक कर झांकने भी नहीं आए। इन सभी धनपशुओं का चरित्र हमेशा से एक रहा है और रहेगा। क्रांतियां और लोग आते जाते रहेंगे, इनका चरित्र नहीं बदलेगा। बाद में एक प्रधान संपादक की डिच के चलते एक शराब डील में थापर को धक्का पहुंचाया इन्हीं मुलायम सिंह यादव ने बतौर मुख्यमंत्री तो थापर का अखबार से यकीन उठ गया। और बेच दिया पायनियर और स्वतंत्र भारत कौड़ियों के दाम। यह दोनों अखबार अब किस तरह हांफ रहे हैं, हम सब देख रहे हैं। लेकिन इस खरीद फ़रोख्त में जो सैकड़ों लोग बेरोजगार हुए, उनके घरों के चूल्हे अब भी कैसे जलते हैं, यह भला कितने लोग देख रहे हैं? और आप को लगता है कि कुशवाहा ने आप के साथ सदाशयता की? अरे जो दस हज़ार करोड़ स्वास्थ्य का डकार गया, जिस ने खनन का काला करोबार किया, जेल जाने से बचने के लिए भाजपा जैसी पार्टी को खरीद बैठा, हत्या के दाग लिए सीबीआई को झांसा देता फिरता हो, उसका न मिलना आप को मुग्ध कर देता है? कि उसने कभी हस्तक्षेप नहीं किया अखबार के काम काज में? अरे जागिए पूर्व प्रधान संपादक महोदय, आपके साथ जो भी कुछ अप्रिय घटा, सब उसी ने किया है। कवि जी, जानिए कि अगर आप किसी अधिकारी, मंत्री या और भी किसी से मिलने जाते हैं तो उस का पीए, चपरासी या नौकर आप से अभद्रता से पेश आता है तो समझिए कि यह पीए, चपरासी या नौकर नहीं, वह व्यक्ति ही आप से अभद्रता कर रहा है। अरे भाई उसके जाल में लिपट कर तीन-तीन डाक्टरों की हत्या हो गई। कौन जान पाया? वह तो पिछड़ों का स्वयंभू नेता बना घूम रहा है। और आप हैं कि मुग्ध हैं? धन्य हैं कवि जी आप भी। तिस पर दुष्यंत को गुहराते हुए कहते हैं कि मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही आग जलनी चाहिए। ए भाई
अइसे ही आग जलाएंगे आप?
समाप्त
इससे पहले वाला यहां पढ़ें- पार्ट एक
लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दयानंद के लिखे अन्य लेखों को यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं- भड़ास पर दनपा





