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सुभाष राय के खिलाफ दयानंद पांडेय की भड़ास (पार्ट एक)

: ए भाई अइसे ही आग जलाएंगे आप? : भोजपुरी में एक कहावत है कि जे गुड खाई ते कान छेदाई! दुर्भाग्य से जनसंदेश टाइम्स के पूर्व प्रधान संपादक सुभाष राय के साथ यही हो गया है। जब गुड खा रहे थे तब उनको किसी की सुध नहीं थी। साहित्य संस्कृति के नाम पर पूरे अखबार में सिर्फ़ काकस कहिए नेक्सस कहिए, के ही काम के लिए वह जाने गए। अभी पोद्दार को लिखी चिट्ठी में भी उन्होंने अपने सिर्फ़ तीन सहयोगियों के ही नाम लिए हैं। तो क्या बाकी सहयोगी लोग भेड़ बकरी थे? उनको बड़ा गुमान है कि उन्होंने जनसंदेश को साहित्य संस्कृति से लबरेज़ कर दिया है। यह सही भी है कि जहां तमाम अखबारों ने साहित्य संस्कृति के नाम पर शून्य कर रखा है, सुभाष राय ने उसे अपनी भरसक पूरा क्या कुछ ज़्यादा ही स्पेस दिया जनसंदेश में। इसके लिए उन्हें ज़रूर साधुवाद दिया जाना चाहिए।

: ए भाई अइसे ही आग जलाएंगे आप? : भोजपुरी में एक कहावत है कि जे गुड खाई ते कान छेदाई! दुर्भाग्य से जनसंदेश टाइम्स के पूर्व प्रधान संपादक सुभाष राय के साथ यही हो गया है। जब गुड खा रहे थे तब उनको किसी की सुध नहीं थी। साहित्य संस्कृति के नाम पर पूरे अखबार में सिर्फ़ काकस कहिए नेक्सस कहिए, के ही काम के लिए वह जाने गए। अभी पोद्दार को लिखी चिट्ठी में भी उन्होंने अपने सिर्फ़ तीन सहयोगियों के ही नाम लिए हैं। तो क्या बाकी सहयोगी लोग भेड़ बकरी थे? उनको बड़ा गुमान है कि उन्होंने जनसंदेश को साहित्य संस्कृति से लबरेज़ कर दिया है। यह सही भी है कि जहां तमाम अखबारों ने साहित्य संस्कृति के नाम पर शून्य कर रखा है, सुभाष राय ने उसे अपनी भरसक पूरा क्या कुछ ज़्यादा ही स्पेस दिया जनसंदेश में। इसके लिए उन्हें ज़रूर साधुवाद दिया जाना चाहिए।

लेकिन क्या सिर्फ़ स्पेस दे देना ही काफी हो जाता है? क्या वह बताएंगे कि कौन सी ऐसी खबर थी साहित्य में ही सही जिसे उनके समय में जनसंदेश ने ब्रेक की? बाकी खबरों में तो आप की दिलचस्पी थी ही नहीं तो खैर क्या ब्रेक करते? हालांकि सच यह है कि किसी भी अखबार में खबर ही उस की देह होती है। फ़ीचर, साहित्य, संस्कृति आदि वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार होते हैं। और जब देह ही नहीं रहेगी तो बाकी चीज़ों का होना न होना कोई मायने नहीं रखता। तो बाकी खबरों को देखने का शायद अवकाश नहीं था आप के पास। प्रबंधन का निर्देश भी हो सकता है रहा हो। क्योंकि कुशवाहा तो अभी बागी हुए हैं न? और खबरें तो सरकार के खिलाफ़ तब लिखी भी जातीं तो भला कैसे? लेकिन यह कमी छुपाने के लिए साहित्य से बडी मुफ़ीद चीज़ और क्या हो सकती थी भला?

फिर आप तो कवि भी थे। विचार विमर्श ज़रूरी था आप के लिए। चलिए माना। पर जनसंदेश के निकलने के समय एक बड़ी घटना घटी साहित्यिक हलके में। कि बरसों से चले आ रहे हिंदी संस्थान के ८३ में से ८० पुरस्कार मायावती सरकार ने एक झटके में खत्म कर दिए। हिंदी संस्थान में लंबे समय तक कोई कार्यकारी अध्यक्ष या निदेशक नहीं रहा। हमारे साहित्यकार संपादक ने कौन सी अलख जगाई? बताएंगे कि कौन सी बहस चलाई। कि हिंदी संस्थान के पुरस्कार बहाल हों? कि कार्यकारी अध्यक्ष या निदेशक भी आ जाएं? वह तो भला हो पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी और एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर का, जिन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर एक जनहितत याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की और हिंदी संस्थान को कार्यकारी अध्यक्ष और निदेशक मिल गए। नहीं तो किसी भी अखबार या चैनल में तो दम नहीं ही था कि मायावती सरकार के इस तुगलकी फ़ैसले को चुनौती दे कर मुहिम चला पाता। अखबारों ने तो इस मसले पर नामवर सिंह सरीखे लेखकों की टिप्पणियों को भी खुल कर नहीं छापा। कि मायावती कहीं नाराज न हो जाएं।

खोखले और अमूर्त विषयों पर बहस चलाना बहुत आसान है। बहुत आसान है चीन, वियतनाम, अमरीका रुस, या इराक और इरान पर बात करना। मुस्लिम, दलित या स्त्री विमर्श पर लफ़्फ़ाज़ी हांकना और हंकवाना। गोलमोल और आध्यात्मिक ज़ुमलेबाज़ी करना। पर ज़मीनी सच्चाई बयान करना और उसको निबाहना तो ज़मीनी आदमी या अखबार ही कर सकता है। और अब क्या करें कि अब हमारे पास न तो ज़मीनी पत्रकार रह गए हैं, न लेखक। रही बात अखबार चैनल आदि की तो जब सारे गिरहकट, माफ़िया, भ्रष्ट राजनीतिग्य, बिल्डर या पूंजीपति ही चला निकाल सकते हैं, निकाल रहे हैं तो उनसे ज़मीनी होने की उम्मीद करना दिन में तारे देखना हो गया है।

हां इन के अखबारों में एक से एक मेधावी, एक से एक प्रोफ़ेशनल कहार बन कर पानी भर रहे हैं। भडुवई, चमचई, लबारी और लायज़निंग कर रहे हैं।चाकरी कर रहे हैं। तो ऐसे में सुभाष राय जी डींगें हांकना ज़्यादा दिन मेरा या आप का चलने वाला नहीं है। इसी लखनऊ में एक पत्रकार थे एसके त्रिपाठी। इंडियन एक्सपेस के संवाददाता थे। कभी झुकते नहीं थे। न हांकते थे। चुपचाप काम करते थे। एक नहीं, अनेक खबरें ब्रेक करने का उनमें हौसला था। बहुतेरी खबरें उनके खाते में दर्ज हैं। इटावा के रहने वाले थे। मुलायम सिंह की पूरी हिस्ट्रीशीट छाप दी थी। डाकू तक लिखा ही नहीं स्टैब्लिश भी किया। तब वह चौधरी चरण सिंह के सिपाहसलार थे। बल्कि महासचिव थे। लेकिन त्रिपाठी जी को संकेतों में भी कुछ कहने की वह हिम्मत नहीं कर पाए। यह १९८३-८४ की बात है। अब तो खैर वही मुलायम सिंह खुलेआम जब-तब पत्रकारों से उनकी हैसियत पूछते रहते हैं और कि नौकरी ले कर उसकी हैसियत बताते भी रहते हैं।

चारा घोटाला तो सभी लोग जानते हैं। पर एक चारा मशीन घोटाला भी हुआ था। एक छोटी सी खबर इंडियन एक्सप्रेस में दिल्ली डेटलाइन से छपी तो त्रिपाठी जी ने लखनऊ से उसका एक बड़ा सा फ़ालो-अप लिखा और केंद्र सरकार में तबके कृषि मंत्री बलराम जाखड़ का इस्तीफ़ा हो गया था। मुझे याद है कि उन दिनों देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। वृद्धों को उस समय ९०० रुपए का पेंशन देने का पुन्य कमा रहे थे। घूम घूम कर। लखनऊ भी आए थे। वीआईपी गेस्ट हाऊस में प्रेस कांफ़्रेंस कर रहे थे। मैं त्रिपाठी जी के बगल में ही बैठा था। उन्होंने देवीलाल से धीरे से कुछ अप्रिय सवाल पूछ लिए। देवीलाल ने अपनी अप्रिय हरियाणवी लंठई में टालने की कोशिश की।

त्रिपाठी जी ने फिए सवाल दुहरा दिया तो देवीलाल ने पूरी लंठई में उनको लगभग डांट कर कहा, 'चु्प्प कर!' त्रिपाठी जी धीरे से खड़े हो गए जाने के लिए। मैंने पूछा, 'क्या हुआ?' तो वह बोले, 'देख तो रहे हैं कि क्या और कैसे बात कर रहे हैं यह?' मैं भी उठ कर खड़ा हो गया। बगल में यूएनआई के सुरेंद्र दुबे बैठे थे। उन्होंने पूछा कि, 'क्या हुआ?' मैंने बताया कि देवीलाल जी ने त्रिपाठी जी से बदसलूकी से बात की है।' सुरेंद्र दुबे तमतमा कर खड़े हो गए। लगभग आह्वान किया कि, 'प्रेस कांफ़्रेंस यहीं खत्म!' सभी लोग उठ कर खड़े हो गए। बाइकाट के लिए। अंतत: देवीलाल को हाथ जोड़ कर त्रिपाठी जी से माफ़ी मांगनी पड़ी। यह १९८५-८६ का दृश्य है। पर अब कहां वो फ़ुर्सतें, अब कहां वो रात दिन! अखबार तब भी पूंजीपतियों के ही थे, अब भी हैं। पर दृश्य बदल गया है।

मायावती और मुलायम सिंह यादव दोनों के ही खिलाफ़ आय से अधिक संपत्ति के मामले वर्षों से लंबित है सुप्रीम कोर्ट में। सीबीआई ने कोर्ट में सूची सौंप रखी है। किसी अखबार या चैनल में है दम जो यह सूची छाप दे या दिखा दे? कहा न कि दृश्य बदल गया है। और अपने सुभाष राय ज़मीनी पत्रकारिता, दैनिक अखबार में ज़्यादातर छपी सामग्री को दुबारा परोस कर साहित्यिक सांस्कृतिक स्पेस देने का दम भर रहे हैं। यह तो उंगली कटा कर शहीद बनने का उपक्रम है भाई। अगर नहीं है तो यही बता दीजिए कि क्या साल भर में आप ने किसी नए कवि, कहानीकार या आलोचक को प्रस्तुत किया? या स्थापित किया क्या? उसका नाम तो बता दीजिए। अच्छा मुश्किल है? तो किसी स्थापित रचनाकार का ही नाम बता दीजिए जिसकी रचना या आलोचना ने जनसंदेश में छप कर पाठकीय जगत या आप के साहित्यिक जगत में धूम मचा दी हो? बताइएगा ज़रूर। देर सबेर।

….जारी…..


इसके बाद वाले पार्ट को पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट दो


लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और  [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दयानंद के लिखे अन्य लेखों को यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं- भड़ास पर दनपा

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