भोले-भाले लोगों को फर्जी और गलत किस्म के चिकित्सकीय इलाजों के चक्कर से बचाने के लिए संसद द्वारा औषधि एवं जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 पारित किया गया. इस क़ानून के बनने के साठ साल बाद भी इसका जम कर उल्लंघन हो रहा है. लखनऊ स्थित आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने इस स्थिति पर रोक लगाने के लिए एक जनहित याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर किया है. इसकी सुनवाई कल (10 अप्रैल) को जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस डॉ. सतीश चंद्र के सामने होगी.
इस एक्ट की धारा 3 के अनुसार लोगों की सेक्स क्षमता की वृद्धि, महिला के गर्भ धारण, मासिक धर्म आदि के जुड़ा कोई भी विज्ञापन प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है. इसी प्रकार से डायबेटीज, अन्धता, बहरापन, पागलपन, सफ़ेद दाग, मोटापा सहित 54 बीमारियों से जुड़े किसी भी प्रकार के विज्ञापन पर पूरी तरह रोक है. धारा 5 में सभी प्रकार के जादुई उपचार, जैसे तंत्र-मन्त्र, कवच, ताबीज से जुड़े विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध है. धारा 7 में इनके उल्लंघन को संज्ञेय अपराध बताया गया है.
याचिका में अमिताभ और नूतन ने यह प्रार्थना की है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय, आरएनआई तथा डीएवीपी को यह सुनिश्चित करने को निर्देशित किया जाए कि किसी भी समाचारपत्र तथा टीवी चैनल पर इस प्रकार के गैर-कानूनी विज्ञापन नहीं प्रसारित होंगे और यदि ऐसे विज्ञापन छपते या प्रसारित होते हैं तो सम्बंधित समाचारपत्र अथवा टीवी चैनल के खिलाफ लाइसेंस तथा रजिस्ट्रेशन रद्द करने, सरकारी विज्ञापन रोकने से ले कर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने तक सभी कार्रवाई की जायेगी.
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