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सोनिया गांधी भला क्यों जानें किसानों का दरद

खाद्य सुरक्षा बिल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नाक का सवाल बना लिया है। आका के इरादे पर नतमस्तक केंद्रीय मंत्रिमंडल रविवार को इस पर दोबारा विचार करने वाली है। अध्यक्ष का मान रखने की अदावत है कि किसी भी सूरत में सरकार इसे संसद के मौजूदा सत्र में पेश कर देना चाहती है। सहकारिता क्षेत्र के विरोध और कृषि मंत्री शरद पवार समेत कांग्रेस के ही कई सांसदों के व्यवहारिक एतराज पर इस बिल को पिछले हफ्ते ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया था। अब शरद पवार के एतराज को कम करने की पहल कर लिए जाने की बात कही जा रही है। मुमकिन है कि कैबिनेट से खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के मौजूदा सत्र में ही पेश करने के लिए मंजूरी ले ली जाए।

खाद्य सुरक्षा बिल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नाक का सवाल बना लिया है। आका के इरादे पर नतमस्तक केंद्रीय मंत्रिमंडल रविवार को इस पर दोबारा विचार करने वाली है। अध्यक्ष का मान रखने की अदावत है कि किसी भी सूरत में सरकार इसे संसद के मौजूदा सत्र में पेश कर देना चाहती है। सहकारिता क्षेत्र के विरोध और कृषि मंत्री शरद पवार समेत कांग्रेस के ही कई सांसदों के व्यवहारिक एतराज पर इस बिल को पिछले हफ्ते ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया था। अब शरद पवार के एतराज को कम करने की पहल कर लिए जाने की बात कही जा रही है। मुमकिन है कि कैबिनेट से खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के मौजूदा सत्र में ही पेश करने के लिए मंजूरी ले ली जाए।

सवाल है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर इतना बेताब क्यों हैं? टका सा जवाब है कि यह उनके ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने गरीबों को दो जून की रोटी मुहैया कराने की गारंटी देने वाले इस विधेयक के प्रस्ताव पर 2009 में ही सहमति प्रकट कर दी थी। इसे सूचना का अधिकार देने वाला आरटीआई कानून, ग्रामीणों को रोजगार की गारंटी देने वाले मनरेगा कानून और सबको शिक्षा प्राप्ति का अधिकार देने वाली शिक्षा का अधिकार कानून की तर्ज पर बनाया जाना है। लेकिन तीन सालों से ऐन केन प्रकारेण यह कैबिनेट तक नहीं पहुंच पाया। संसद के शीतकालीन सत्र से पहले इसे कैबिनेट तक लाया गया। लेकिन जब कैबिनेट में ही इसपर विवाद मच गया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का धैर्य जवाब दे गया। बताते हैं कि उन्होंने इसे लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आगे नाराजगी तक दर्ज कराई है। अब घबराहट से भर कर प्रधानमंत्री ने रूस के दौरे से वापस आते ही इसपर दोबारा कैबिनेट की सहमति बनाने का विचार बनाया है। इसके लिए कृषि मंत्री शरद पवार की आपत्ति के निपटारे की कोशिश की जा रही है।

सवाल है कि आखिर शरद पवार या किसी और को हर भारतीय को खाद्यान्न मुहैया कराने की गारंटी देने वाले इस पवित्र मकसद पर आपत्ति क्यों हो रही है? इस प्रति सवाल का जवाब थोड़ा पेचीदा और जटिल है। दरसल कांग्रेस अध्यक्ष के इस प्रस्तावित ड्रीम प्रोजेक्ट को किसानों के लिए अहितकर माना जा रहा है। इसलिए किसान राजनीति के पृष्ठभूमि वाले तमाम नेता इसका विरोध कर रहे हैं। साथ में विरोध बजट में तकरीबन एक लाख दस हजार करोड़ रुपए के प्रावधान को लेकर है। विशुद्ध तौर पर कल्याण या सब्सिडी के मद में हो रहे बजटीय प्रावधान पर मनमोहन सरकार की खुली अर्थनीति के नियंताओं का वैसे भी विरोध रहा है। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने धन के प्रावधान की समस्या ज्यादा जटिल नहीं बनने दी है। कांग्रेस अध्यक्ष की इच्छा के अनुपालन के लिए वित्त मंत्रालय ने बजटीय प्रावधान की अनुशंसा को मंजूरी दे दी है।

अब विरोध का वाजिब कारण इस आशंका को लेकर है कि इससे देश के किसानों में गुस्सा बढे़गा। किसानों का गुस्सा गरीबों को खाद्यान्न मुहैया कराने के प्रावधान से नहीं बल्कि कानून के रास्ते खाद्यान्न के लिए विशालकाय बजटीय प्रावधान से है जिससे आने वाले दिनों में अन्न आयात का रास्ता खुल जाएगा। सहकारिता आंदोलन के अगुआ इस विधेयक पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहते हैं कि एक ओर अन्न उत्पादन में देश को स्वावलंबी बनने का गर्व देने वालों किसानों को किसानी के कारोबार से विमुख होता देख सरकार मौन है। दूसरी तरफ विदेशों से अन्न आयात का रास्ता खोलकर सरकार रही सही कसर पूरा करने जा रही है कि किसानी भारतीयों के हक की बात ही नहीं रहे। सहकारिता आंदोलन और किसान नेताओं की तरफ से निकले इसी बात ने कैबिनेट की पिछली बैठक में कृषि मंत्री शरद पवार समेत कांग्रेस के ही कई मंत्रियों ने खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक के विरोध में खड़ा कर दिया। कैबिनेट की बैठक में सहकारिता क्षेत्र के अगुआ नेताओं के विरोध का हवाला दिया गया। जो खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक का इस बिनाह पर विरोध कर रहे हैं कि इसकी केंद्र में किसान के हित को शामिल नहीं किया गया है। एक तरफ किसानी के नुकसान से गरीबों की संख्या बढ़ रही है वहीं बढ़ी संख्या के गरीबों को खाद्य सब्सिडी देने का व्यवसायिक रास्ता तैयार किया जा रहा है। इस रास्ते से देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कृषि खपत में पैठ बनाने का मौका मिल जाएगा।

सहकारिता क्षेत्र से जुडे नेताओं का सुझाव है कि इतने बजटीय प्रावधान को अगर किसानी को ताकतवर बनाने में लगाया जाएगा तो हैरान परेशान किसान देश के गरीबों को खुद ब खुद खाद्यान्न की गारंटी दे देगा। किसानों की राय से खाद्यान्न सुरक्षा कानून से अन्न के आयात का रास्ता खुलेगा जो अन्न के मामले में हमारे स्वावलंबन की अहसास पर चोट करता है। यह चोट इसलिए भी खतरनाक है कि दिन प्रतिदिन किसानों में उपेक्षा का भाव गहराता जा रहा है। किसानी के नुकसान ने पिछले दस सालों में बीस करोड़ से ज्यादा लोगों को किसानी का काम छोड़कर सड़क और भवन निर्माण का मजदूर बन जाने को मजबूर किया है। “पीपली लाइव” फिल्म की कथानक सच साबित हुआ जा रहा है। किसानी का काम नुकसान का सौदा बना जा रहा है। प्रमाणिक आंकडे़ के मुताबिक दस सालों दो लाख दस हजार किसानों ने किसानी के चौपट हो जाने से खुदकशी कर ली है। किसानों के लिए सप्लाई की गई बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बीस फीसदी बीज फूट ही नहीं पा रही। मौसम पर बीज नहीं फूटने से किसान परेशान है। फिर भी मेहनत करके अगर वह बंपर उत्पाद करता है तो फिर उसके लिए उचित मूल्य देने वाले खरीदार के तलाश का संकट है। 

किसानी के हालात की विकटता को देखकर ही खाद्य सुरक्षा कानून का विरोध हो रहा है। एक ओर जहां फसल उत्पादों की समुचित मूल्य हासिल करने के लिए पंजाब, विदर्भ और झारखंड में किसान बुरी तरह से आंदोलनरत है। पंजाब और विदर्भ में किसानों ने तो मायूसी की हद पार कर दी है। विरोध पर उतरे किसान हजारों क्विंटल आलू सड़क पर फेंक कर टैक्टर से रौंदवाना मुनासिब समझ रहे है। मुफ्त में बिचौलियों को सुपुर्द करने के बजाय किसान धान की बोरियां आग के हवाले कर देना ठीक समझ रहे हैं। उस वक्त खाद्यान्न गारंटी कानून की पैरवी करना सरकार में बैठे लोगों के लिए मुसीबत का कारण बन गया है। किसानों के आसरे राजनीति करने वालों के लिए इसका समर्थन खतरनाक है। ऐसी विपरीत हालत में खाद्य सुरक्षा बिल का विरोध शरद पवार जैसों ने किसानों की असुरक्षा के खतरे को देखते हुए कर रहे हैं।

लेकिन सत्ता शीर्ष की जिद देखिए कि गरीबों के लिए मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने के नाम पर विशालकाय बजटीय प्रावधान के लिए केंद्र सरकार को मजबूर किया जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ के अध्यक्ष डॉ चंद्रपॉल सिंह यादव का बिल का विरोध में दलील देते हुए कहना है कि इसका विरोध इसलिए नहीं हो रहा है कि कोई वंचितों तक खाद्यान्न पहुंचने के रास्ते में बाधक बनना चाहता है। बल्कि विरोध इस खतरे को भांपते हुए हो रहा है कि खाद्य सुरक्षा गारंटी के नाम में विदेशों से अन्न आयात का पिटारा खुल जाएगा। आयात का रास्ता खुलने से व्यापारियों और बिचौलियों की चांदी कटेगी। रही सही कसर पूरी होने लगेगी। कीमत की प्रतिद्वंदिता में फंसकर किसान और ज्यादा संख्या में दम तोड़ने लगेंगे। खाद्यान्न आयात का यह रास्ता तबाही के कगार पर खडे़ किसानों को औऱ बर्बाद करके रख देगा।

किसानों को उपज पर महज पंद्रह प्रतिशत मुनाफा सुनिश्चित करने की स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पर बरसों से गौर नहीं किया जा रहा है। हंगामे के डर से नतमस्तक हुई सरकार ने एफडीआई के जरिए वॉल मार्ट को न्यौतने का काम बंद डब्बे में रख दिया। अब छवि नुकसान की भरपाई के लिए खाद्य सुरक्षा कानून की बात को ढोल नगाडे़ के साथ पेश करने की तैयारी कर रही है। लेकिन इस प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर भी समाज के सबसे बडे़ तबके यानी किसानों में विष भरा है और सरकार की नियत पर गंभीरता से शक किया जा रहा। खाद्यान्न गारंटी विधेयक के प्रारूप के तहत मौजूदा स्थिति में सरकार को छह करोड़ बीस लाख टन खाद्यान्न हर साल खरीदना होगा। इससे एक लाख करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी का एलान होगा। कानून की भरपाई के लिए सब्सिडी की इस रकम से बडे़ खरीद के इस खेल से घोटाले की साजिश का रास्ता खुलता है।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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