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सौ से ज्यादा विधायक और दर्जनभर से ज्यादा सांसद नक्सलियों के मददगार!

नक्सल प्रभावित इलाकों के अधिकतर विधायक और सांसद इस बात से हैरान-परेशान हैं कि उन्हें केंद्र के ‘इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान’ से दूर रखा जा रहा है। उनका तर्क है कि विधायक और सांसद स्थानीय स्तर की सभी समस्याओं को जानते हैं, लोगों को पहचानते हैं और सबसे बड़ी बात कि स्थानीय भूगोल की अच्छी समझ भी रखते हैं, उन्हीं लोगों के बीच से चुनकर भी आते हैं। तब क्या कारण है कि केंद्र की विकास योजनाओं में उन्हें पूछा तक नहीं जा रहा?

नक्सल प्रभावित इलाकों के अधिकतर विधायक और सांसद इस बात से हैरान-परेशान हैं कि उन्हें केंद्र के ‘इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान’ से दूर रखा जा रहा है। उनका तर्क है कि विधायक और सांसद स्थानीय स्तर की सभी समस्याओं को जानते हैं, लोगों को पहचानते हैं और सबसे बड़ी बात कि स्थानीय भूगोल की अच्छी समझ भी रखते हैं, उन्हीं लोगों के बीच से चुनकर भी आते हैं। तब क्या कारण है कि केंद्र की विकास योजनाओं में उन्हें पूछा तक नहीं जा रहा?

इन नेताओं का अपना तर्क है कि यदि सरकार सहयोग लेती है, तो नक्सली इलाकों के विकास में न सिर्फ तेजी आ सकती है, बल्कि राह से भटके लोगों को भी सही रास्ते पर लाया जा सकता है। सवाल है कि जब तमाम सरकारी योजनाओं के संचालन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सांसद और विधायकों की भूमिका होती है, तो फिर नक्सली इलाके से जुड़ी विकास की इस महत्वपूर्ण योजना से जनप्रतिनिधियों को क्यों अलग रखा जा रहा है?

छत्तीसगढ़ कोटा के कांग्रेसी विधायक लखमा कवासी कहते हैं, ‘अगर सरकार की आईएपी योजना को सही लोगों तक पहुंचाना है, तो स्थानीय नेताओं को उससे जोड़ना ही चाहिए। शहरी इलाकों में इस योजना के दर्शन तो हो जाते हैं, लेकिन जंगल के भीतर और गांवों में जहां इस योजना की ज्यादा जरूरत है, वहां इसका नामों-निशान तक नहीं है। केवल पुलिस और कलेक्टर के जरिए इस काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता। ऐसे में हम कह सकते हैं कि नक्सली इलाकों की यह योजना ‘लूट’ की शिकार हो रही है और सरकारी महकमों के लिए यह लूट का जरिया बन गया है।’

ऐसा नहीं है कि आईएपी के बारे में कांग्रेस नेता ही इस तरह की बात कह रहे हों। इस प्रदेश के कई भाजपा नेता भी इस योजना को लूट के सिवा कुछ नहीं मान रहे हैं। घोर नक्सली जिला दंतेवाड़ा से विधायक हैं भाजपा के भीमा मांडवी। मांडवी कहते हैं, ‘हम जनता के प्रतिनिधि हैं और जनता हमें वोट देती है। हमलोग यहां के भूगोल से परिचित हैं और साथ ही जनसमस्याओं से भी। इस योजना में अगर सरपंच से लेकर विधायक और सांसद को जोड़ा जाता, तो संभव है योजना के कुछ बेहतर परिणाम निकल कर आते। हर जिले को मिले 30 करोड़ रुपये कहां जा रहे हैं? यह तो सरकार ही बता पाएगी।’ कुछ इसी तरह के विचार कांकेर से भाजपा की विधायक सुमित्रा मारकोले का भी है। सुमित्रा कहती हैं, ‘आईएपी योजना से हम लोगों का कोई मतलब नहीं है। विधायकों को विश्वास में लेकर अगर नक्सली इलाकों में यह योजना चलाई जाए, तो परिणाम ज्यादा अच्छे निकल सकते हैं। सरकार को इस योजना से स्थानीय नेताओं को जोड़ना चाहिए।’

बिहार जहानाबाद के वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजित सिंह केंद्र सरकार की इस योजना से काफी नाराज हैं। अजित सिंह की सोच है कि नक्सली इलाकों में काम करना इतना आसान होता, तो अभी तक इलाके का कायाकल्प हो गया होता। अक्सर देखा गया है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों का विरोध होने की बात सामने आती है और सरकारी या निजी एजेंसियां जान के भय से काम को अंजाम तक नहीं पहुंचा पातीं। इस सवाल का जवाब लखमा कवासी देते हैं। कवासी का मानना है कि नक्सलियों के विरोध के बावजूद जनता वोट तो देती है, लेकिन विकास के मसले पर उनकी राय नहीं ली जाती। ऐसे में मुट्ठी भर नक्सली विकास कामों का विरोध कर जाते हैं और वोट डालने वाली वही जनता कुछ नहीं कर पाती। इसके लिए जरूरी है, विकास कामों में जनता और नेताओं की भागीदारी का होना।’

उत्तर प्रदेश का सोनभद्र इलाका भी नक्सलवाद की चपेट में है। यहां के दो विधान सभा क्षेत्र दुद्धी और राबर्ट्सगंज से बसपा विधायक हैं सत्यनारायण जैसल। जैसल कहते हैं कि नक्सली क्षेत्र में अब तक कोई भी काम ठीक से नहीं हो पा रहा है। जहां तक केंद्र सरकार की आईएपी योजना का सवाल है, तो इस योजना को पूरी तरह से पुलिस और कलेक्टर के हवाले कर दिया गया है। सच्चाई यह है कि इस योजना का अभी तक कोई लाभ इस इलाके को नहीं मिला है।’ केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक नौ राज्यों के 83 जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं। आंध्रा के कुल 22 जिलों में 16, बिहार के।

क्या है आईएपी योजना : आईएपी योजना, पंचायती राज मंत्रालय के अंतर्गत चलने वाली पिछड़े और जनजातीय इलाकों के विकास के लिए योजना आयोग द्वारा संचालित कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आईपीए के फंड मूल रूप से बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड से ही लिए जा रहे हैं। इस योजना को देश के उन जिलों में 2010 से चलाया जा रहा है, जो अति पिछड़े और जनजातीय इलाके हैं। इन्हीं इलाकों में नक्सलवाद ज्यादा है। इस योजना को चलाने की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर, जिला एसपी और फॉरेस्ट अफसर के ऊपर है। इसके लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनाई गई है। यही कमेटी इलाके के लिए योजना बनाती है। योजना के तहत सड़क, आंगनवाड़ी, स्कूल बिल्डिंग, स्वास्थ्य व्यवस्था, पानी और बिजली को प्राथमिकता में रखा गया है। पिछड़े और जनजातीय इलाकों में तैनात अर्द्धसैनिक बल और ‘कोबरा’ से इस योजना को चलाने में सहयोग लिया जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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