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स्पॉट फिक्सिंग बनाम घोटाले

हाल ही में एक स्पॉट फिक्सिंग हुई. हुई वो इसलिए क्योंकि पकड़ में आ गई. चन्देल. चवन और श्रीसंत गिरफ्तार हुए, पूछताछ हुई और कथित तौर पर उन्होंने अपना गुनाह क़ुबूल भी कर लिया . लेकिन इस फिक्सिंग ने तो कमाल ही कर डाला. सारे देश में हंगामा सा मच गया. सारा का सारा मीडिया गुनाहगारों पर चीखने लगा. कुछ अति-उत्साही लोग सड़क पर निकल आये और श्रीसंत के पोस्टर जलाने लगे. टीवी चैनल्स पर बहस छिड़ गई. तीनो खिलाड़ियों की अच्छी लानत-मलामत की जाने लगी. और दो दिन तो ऐसा लगा कि सारे देश में मैच फिक्सिंग के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं है.

हाल ही में एक स्पॉट फिक्सिंग हुई. हुई वो इसलिए क्योंकि पकड़ में आ गई. चन्देल. चवन और श्रीसंत गिरफ्तार हुए, पूछताछ हुई और कथित तौर पर उन्होंने अपना गुनाह क़ुबूल भी कर लिया . लेकिन इस फिक्सिंग ने तो कमाल ही कर डाला. सारे देश में हंगामा सा मच गया. सारा का सारा मीडिया गुनाहगारों पर चीखने लगा. कुछ अति-उत्साही लोग सड़क पर निकल आये और श्रीसंत के पोस्टर जलाने लगे. टीवी चैनल्स पर बहस छिड़ गई. तीनो खिलाड़ियों की अच्छी लानत-मलामत की जाने लगी. और दो दिन तो ऐसा लगा कि सारे देश में मैच फिक्सिंग के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं है.

आइये ज़रा गौर करें. समझने की कोशिश करें कि क्या है स्पॉट फिक्सिंग. कुछ खिलाड़ियों को सटोरियों से रिश्वत मिलती है और वे उनकी मांग के मुताबिक़ अपने स्वाभाविक खेल में दो चार परिवर्तन कर देते हैं. ये दो-चार पूर्व-निश्चित प्रदर्शन इनके बारे में पहले से जानने वाले सटोरियों के लिए फायदे का सौदा बन जाते हैं और बाकी अनजान -नादान लोगों के लिए घाटे का सट्टा. इसमें आप किसे दोषी ठहराते हैं और कहाँ दोषी ठहराते हैं ! ज़रा सोचिये , यहाँ इस पूरी प्रक्रिया में गलत कहाँ हो रहा है..और क्या हो रहा है ?

सटोरिये ने रिश्वत दी – गलत हुआ. खिलाड़ियों ने रिश्वत ली – गलत हुआ. सट्टेबाजों ने सट्टा खिलाया – गलत हुआ. लोगों ने सट्टा खेला – गलत हुआ. खिलाड़ियों ने पूर्व-निर्णीत प्रदर्शन किया – गलत हुआ. इस प्रक्रिया में पांच गलत काम हुए जो तीन लोगों ने  किये. इसका फायदा भी इन्ही तीनो को और नुक्सान भी इन्ही तीनो को होना है. बाकी देश और दुनिया की जेब में इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. ध्यान दीजिये यहाँ गलत का मतलब है अनैतिक, आपराधिक नहीं ! यह वही अंतर है जो पाप और अपराध में होता है. पाप की सज़ा क़ानून नहीं देता अपराध की देता है. झूठ बोलना पाप है पर झूठ बोल कर किसी को किसी अपराध में फंसा देना अपराध  है. अनीति अनुचित है पर गैर-कानूनी नहीं !

सजा उसी काम के लिए दी जाती है जो गैर-कानूनी हो. यहाँ पर अगर अनैतिक कार्य को आपका क़ानून गैर-कानूनी मानता है तो सज़ा इसमें लिप्त हर उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए जिसने यहाँ गैर-कानूनी कार्य किया है. सट्टा खिलाने वाले सभी सटोरिये धर लिए जाएँ, सट्टा खेलने वाले सभी लोग पकड़ लिए जाएँ और सभी वे खिलाड़ी जो पैसा लेकर खेल में अस्वाभाविक प्रदर्शन करें वे भी गिरफ्तार किये जाएँ. अब आप देखिये ऐसा क्या है सट्टेबाजी में जो रिश्वत से बढ़ कर संगीन है ? ऐसा क्या है सट्टेबाजी में जो लाटरी में नहीं है ?

यहाँ दो बातें स्पष्ट दिखती हैं – सट्टेबाजी आम रिश्वतबाज़ी से कहीं बड़ा जुर्म है और लाटरी तो गैर-कानूनी नहीं पर पैसे की शर्त लगाना याने कि सट्टेबाजी करना गैर-कानूनी है. रिश्वत आज हमारे देश में एक आम चलन है, हम बड़ी आसानी से कहते हैं कि फलां जगह चले जाओ..फलां आदमी को पैसे दे दो, तुम्हारा काम हो जाएगा. न बोलने वाला हिचकता है न सुनने वाला चौंकता है. होता भी ठीक वैसा ही है. शायद ही कोई ऐसा सरकारी विभाग हो जहां रिश्वत प्रचलन में न हो. जो पकड़ में आ गया वो भ्रष्टाचारी, जो न पकड़ाए वो धर्माधिकारी ! रिश्वत को राष्ट्रीय भाषा में ऐसे कह सकते हैं कि देश की नसों-नाड़ियों में खून की तरह बहने वाली बीमारी है ये ! फिर भी ये बड़ी बात नहीं मानी जाती. और अब तो आलम ये है कि आम तौर पर न्यूज़ चैनल और अखबार वाले रिश्वत के लेन-देन  की ख़बरों को महत्त्व नहीं देते अर्थात इस अपराध को  महत्वपूर्ण नहीं माना जाने लगा है. वजह साफ़ है कि हमने रिश्वत को  स्वीकार कर लिया है, इसको जीवन का सच मान लिया है और ये भी मान लिया है कि डायबिटीज़ की तरह इसे भी ज़िन्दगी के साथ जीना है. इसका कोई इलाज नहीं. इसे हम समाजशास्त्र की भाषा में समाज का मंद-आपराधीकरण भी कह सकते हैं.  

अब देखिये सट्टेबाजी और लाटरी में क्या फर्क है ? ज़्यादा फर्क नहीं है. एक ही सिद्धांत दोनों के मूल में लागू होता है. शर्त लगाइए – पैसा कमाइये या गंवाइये ! कितने लोग जीतते हैं लाटरी, ज़रा सोचिये. खेलने वालों की छोडिये, जीतने वालों की बात कीजिये. लाटरी  गैर-कानूनी क्यों नहीं है, जबकि सट्टा सरेआम गैर-कानूनी है ? आप कह सकते हैं कि सट्टे में बे-ईमानी होती है..तो क्या लाटरी में बे-ईमानी नहीं होती ? कोई दे सकता है कोई सबूत कि लाटरी में बे-ईमानी नहीं होती ?

और हाँ, यहाँ बे-ईमानी शब्द को स्पष्ट करना भी आवश्यक है. सामान्य तौर पर और यहाँ भी बे-ईमानी अर्थात अनुचित. बे-ईमानी का मतलब गैर-कानूनी नहीं होता. अगर ऐसी बात है तो सट्टेबाजी में क्या गलत है ? क्या गैर-कानूनी है सट्टेबाजी में ?

अब आइये असली मुद्दे पर. सट्टेबाजी के पीछे इतना हंगामा कर रहे लोग, इतना ढोल पीट रहा मीडिया ये क्यों भूल जाता है कि मूलरूप से सट्टेबाजी से आम आदमी को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता. सिर्फ उसे ही नुक्सान पहुंचता है जो सट्टा खेलता है.  सट्टा खेलने का फैसला उसका निजी फैसला है. इसमें किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता. बिलकुल इसी तरह होता है  लाटरी हारने वाले का मामला भी. आप खेले – आपका निर्णय – आप जीते आपका लाभ.  और इसी तरह अगर  आप हारे – आपकी ज़िम्मेदारी – आपका नुक्सान ! इसमें इतना शोर मचाने वाली क्या बात हो गई?

शोर तो इस बात पर मचाया जाना चाहिए कि देश में जो बाकी बड़ा और काफी बड़ा बुरा हो रहा है उस पर इतनी खामोशी क्यों ?  सट्टेबाजी सीधा सीधा बे-ईमानी का जुर्म है जो कायदे से बे-ईमानी की वजह से जुर्म है ही नहीं..अर्थात उचित-अनुचित या नीति-अनीति से जुड़े हुए कार्यों को क़ानून में सज़ा या पुरस्कार का विषय नहीं माना जाता..वरना सुबह से शाम तक झूठ बोलने वाले अस्सी प्रतिशत लोग रोज़ ही जेल में बंद होते. फिर सट्टेबाजी कहाँ का गुनाह है ?

सट्टेबाजी का पक्षपाती नहीं होना चाहिए. ये कोई अच्छी बात नहीं है जिस तरह से जुआं, शराब या धूम्रपान..उसी तरह से सट्टेबाजी. भले ही नुकसान सबको या देश के हर नागरिक को नहीं पहुंचता, सिर्फ उसी को पहुंचता है जो ये करता है, तो भी ये गलत है लेकिन अपराध ये फिर भी नहीं. जिस श्री संत के लिए आज मीडिया आलोचनाओं का हल्ला  बोल खेल रहा है, कभी उसकी तारीफ़ करते नहीं थकता था. मत भूलिए कि श्री संत अभी तीन दिन पहले तक हमारा एक राष्ट्रीय नायक था जो कि भारत के क्रिकेट के दो विश्व-विजेता दलों का सदस्य रहा है – प्रथम टी-20 विश्वकप जीतने वाली धोनी की जमात में वह भी था.  अट्ठाईस साल बाद क्रिकेट का विश्वकप जीतने वाले भारतीय क्रिकेट दल में भी श्री संत शामिल था. सारे देश में खिलाड़ियों का गुणगान हुआ. हम सब फूले न समाये. देश का मान बढ़ा, हमारा राष्ट्रीय गौरव बढ़ा. तो आज फिर ऐसा कौन सा बड़ा गलत काम कर दिया श्री संत ने कि आप उसे क्षमा नहीं कर सकते ? कितना बड़ा गुनाह हो गया कि पूरी दिल्ली पुलिस इसमें जीजान से जुट गयी. दिल्ली पुलिस के सेनापति खुद इन्टेरोगेशन के लिए पहुँच गए. राजधानी की पुलिस इतनी चुस्त-चौकस नज़र आने लगी कि सब भूल गए कि इसी शहर में पिछले छह महीनों  से बलात्कार की घटनाएं सुरसा बनी हुई थीं.

खैर छोडिये, हो सकता है पुलिस या मीडिया ये कहे कि बलात्कार से देश को उतना नुकसान नहीं पहुंचता जितना सट्टेबाजी से. बलात्कार का शिकार एक ही आदमी होता है -उसका तो सिर्फ मन और तन विदीर्ण होता है,.. किन्तु सट्टेबाजी में सारे देश का ह्रदय विदीर्ण होता है, इसलिए सट्टेबाजी बड़ा अपराध है. हाँ, अगर टीआरपी की दौड़ हो, बलात्कार में ऐसा कुछ ख़ास हो जो बिक सके, अगर उसे रेयरेस्ट ऑफ़ दि रेयर कहा जा सके तो बात अलग है ..तब तो उस पर दो चार दिन 'खेला' जा सकता है. तब बलात्कार टीवी चैनल्स के लिए अहम् खबर हो जाती है. चलिए, अब इस अरण्य-रोदन को यहीं छोड़ कर आगे बढ़ते हैं और विषय के मूल में पहुँचते हैं.

बात करते हैं घोटालों की. देश में शायद ही कोई कोई ऐसी तिमाही या चौमाही जाती हो जब हमें किसी नए घोटाले की खबर न मिलती हो. इनमें से कम से कम साठ-सत्तर प्रतिशत छोटे-बड़े घोटाले तो ओन दि स्पॉट रफा-दफा हो जाते हैं, पब्लिक को उसकी भनक तक नहीं लगती.  कुछ लोग मालामाल हो जाते हैं – अपराधी कंगाल होने से बच जाते हैं.. नीति और उचित-अनुचित गए तेल लेने ..देश गया भाड़ में.  साल में चार-छह बड़े घोटाले अब आम बात हो गई है भारत में.  जिन बड़े घोटालों की बात यहाँ की जारही है वे लाखों या करोड़ों के नहीं, कई लाख करोड़ के होने लगे हैं आज कल. पर कभी क्या किसीने देखा कि मीडिया उस पर इस तरह उफना पड़ रहा हो ? कभी आपने मीडिया को उस पर 'खेलते' देखा है ? कभी आपने तीन चार दिन लगातार चैनलों को इन असली गुनाहगारों को कमर कस कर सज़ा दिलवाने की अपील करते देखा है ?

जिन घोटालों से देश का नुकसान हो रहा है, जिन घोटालों से आम आदमी के मेहनत के पैसों की जेब कटती है, जिनसे इस देश के नागरिक पर प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय घाटे  का बोझ बढ़ता है, जिनसे हमारे देश की आर्थिक जड़ें खोखली होती हैं – क्या वे घोटाले महत्वपूर्ण नहीं हैं ? आपमें से किसी ने अगर किसी पकड़ में आये जेबकतरे की पब्लिक के हांथों  धुनाई देखी हो तो दिखा होगा कि उस बदनसीब इंसान के शरीर का शायद ही कोई हिस्सा ऐसा बचा होगा जो चोट खाने से रह गया हो.  क्या कहेंगे हम अगर कोई ये सवाल कर दे कि बड़े-बड़े घोटालों से देश की जेब काटने वाले जो जेबकतरे संसद में बैठे हैं उनकी पब्लिक कुटाई कब होगी ?

तो इसका कोई जवाब नहीं है किसी के पास. इन महा-पुरुषों की किस ढंग की निंदा-आलोचना होनी चाहिए ? इन्हें किस तरह की सज़ा मिलनी चाहिए ? क्या मीडिया का ये कर्त्तव्य नहीं होता कि इतने बड़े जेबकतरों का पूर्ण बहिष्कार करे और उन्हें तभी घास डाले जब तक कि वे क़ानून के दरबार से इस पार या उस पार न हो जाएँ. दागी के लिए समाज में सज़ा के पहले कोई जगह नहीं होनी चाहिए. जो लोग आज दो चार खिलाड़ियों के स्पॉट फिक्सिंग में शामिल होने पर आईपीएल बंद कराने की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, कहीं उनसे कोई पूछ न बैठे कि आईपीएल के बाद कल को कहीं अगर संसद भी बंद करानी पड़ गई तो क्या होगा ?

सवाल ये भी किया जा सकता है कि आईपीएल में छोटी रिश्वत लेने वालों को आपने आईपीएल से तो बाहर कर दिया पर संसद के ऐसे लोगों को संसद से बाहर क्यों नहीं कर दिया जाता ? देश के कुल आर्थिक नुकसान को आधार माने तो घोटालों के कारण संसद को तो तुरंत ही बंद कर देना चाहिए – क्योंकि वहां विराजे कुछ देश की जनता के प्रतिनिधियों के माथे पर कई घोटालों के कर्णधार होने का आरोप चस्पा है.  क्या कहेंगे आप? क्या करेंगे आप? कितने आईपीएल बंद करेंगे आप?

ज़रा इस बात पर भी तो गौर कीजिये कि दिन भर का थका हारा मंहगाई और बेरोज़गारी की मार का मारा जब एक आम आदमी शाम को अपने घर पहुंचता है तो चार घंटे के इस फटाफट क्रिकेट से उसे जो ख़ुशी हासिल होती है, वो उसके लिए कीतनी कीमती है, इसका अनुमान भी कीजिये. क्या आप उसके जीवन की एक छोटी सी ये ख़ुशी भी छीन लेना चाहेंगे ?

मुझे याद है मेरे इंग्लैंड प्रवास के दौरान वहां के एक एशियाई टेलीविज़न चैनल में चल रहे एक शो ‘लेट्स टॉक’ में किसी अप्रवासी भारतीय ने ये जोक सुनाया था कि किसी ने पूछा दुनिया में ऐसी एक जेल बताओ जिसे जेल नहीं कहा जाता और जहां अपराधियों को तनख्वाह भी दी जाती है और जहां उन्हें कोई काम भी नहीं करना पड़ता – तो जवाब मिला – भारत की संसद ! दुर्भाग्य से मैं उस शो के होस्ट की भूमिका में था और मुझे कडवा घूँट पी कर रह जाना पड़ा. यह यक्ष प्रश्न नहीं तो और क्या है ..क्या जवाब है इस सवाल का ?

दो पंक्तियाँ किसी ने शायद इस हाल पर ही लिखी होंगी –

जाने कितने सवालों के जवाब में हमारी खामोशी
न जाने कितने सवालों की आबरू रखे !!

पारिजात त्रिपाठी

निर्देशक

मीडिया इंडिया विज़न

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