: नाम बदलने से बदल जाएगा बहुत कुछ : ब्रांड नेम क्या होता है यह आनंद बाजार पत्रिका को समझ में आ चुका है. करोड़ों खर्च करने के बाद भी प्रबंधन की धुकधुकी चल रही है. स्टार ब्रांड से अलग होने के बाद एबीपी को ही ब्रांड बनाने की तैयारी में जुटा आनंद बाजार पत्रिका समूह एक जून के बाद मार्केट की स्थिति को लेकर परेशान है. एक जून से ब्रांड तो बदलेगा ही, ऑन स्क्रीन भी बहुत कुछ बदल जाएगा. पर इतने सालों से जिस स्टार न्यूज ने अपना झंडा गाड़ रखा था, उसके ब्रांडिंग उसके साये से इतना जल्द बाहर निकल पाना कोई हंसी-खेल नहीं दिख रहा है.
सबसे बड़ी बात है कि स्टार न्यूज जैसे ब्रांड के साथ जुड़े कर्मचारी भी अंदर से परेशान हैं. उन्हें भी ब्रांड का मतलब पता है. जब सारी दुनिया ब्रांड नेम की तरफ भाग रही है. लोगों की जीवन शैली ब्रांडों में ढलती जा रही है, उस स्थिति में एक जमे-जमाए, जाने-पहचाने ब्रांड से अलग होकर एक नए ब्रांड को जमाने की शुरुआत करना पत्रकारों को अखर रहा है. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो कई लोग दूसरे ब्रांडों में अपने-अपने जुगाड़ भिड़ा रहे हैं. अपने संबंधों को खंगाल रहे हैं. इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.
स्टार न्यूज की स्टार एंकर अंजना कश्यप के आजतक जाने की चर्चा है. संभावना है कि वे अगले कुछ दिनों में आजतक के स्क्रीन पर दिखने लगें. हो सकता है अंजना का जाना पूर्व निधार्रित रहा हो, उन्हें बेहतर मौका मिल रहा हो, पर उनके जाने का जो समय है, वह अलग चुगली कर रहा है. मार्केट में यह चर्चा आम है कि स्टार न्यूज का ब्रांड नेम खतम होने के चलते ही अंजना कश्यप आजतक जैसे ब्रांड नेम से जुड़ने की तैयारी में हैं. खुद ब्रांड बन चुकी अंजना को शायद ब्रांड की अहमियत पता है, तभी वो एबीपी के होर्डिंग्स में भी कहीं नजर नहीं आईं.
स्टार न्यूज की परछाईं से निकलकर अपनी ब्रांडिंग स्थापित करना इतना आसान भी नहीं है, जितना आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप दिखाने की कोशिश कर रहा है. उसे पता है कि मार्केट का निर्धारत ब्रांड करता है. अगर एबीपी न्यूज ब्रांड नहीं बना तो मार्केट भी स्टार की सारी टीम होने के बाद भी उसे झेल नहीं पाएगा. क्योंकि पूरा बाजार साख औरे ब्रांड से ही चलता है. मार्केट बड़ा निष्ठुर होता है, उसे किसी का सरोकार नहीं बल्कि अपना फायदा दिखता है. और यदि एबीपी न्यूज से उसे फायदा नहीं मिला तो वो स्टार न्यूज के डमी को भला ढोएगा ही क्यों? उसे नई या पुरानी टीम से कुछ लेना देना नहीं होता है.
एबीपी ग्रुप भी यही दिखाने की कोशिश कर रहा है कि स्टार न्यूज के सारे जाने पहचाने लोग एबीपी न्यूज के हिस्से हैं और इस तरह कुछ नहीं बदला है, सिवाय नाम के. टीवी, अखबार, वेबसाइट्स, होर्डिंग्स आदि के जरिए स्टार न्यूज के एबीपी न्यूज बन जाने का जोरशोर से प्रचार किया जा रहा है. सूत्र बताते हैं कि इस प्रचार-प्रसार में ही चैनल ब्रांडिंग के लिए चालीस करोड़ रुपये तक खर्च कर रही है. मार्केट इकानामी के इस दौर में हर कंपनी का पूरा जोर ब्रांड वैल्यू पर होता है और जब आपका नाम ही खिसक जाए तो जाहिर है दुनिया को यह बताने में काफी मेहनत करनी पड़ती है कि नाम बदला है, काम नहीं. पर स्टार न्यूज से एबीपी न्यूज में स्थानांतरण इतना स्मूथ नहीं है जितना बताया जा रहा है.
यहां काम करने वाले भी उहापोह में हैं. जिन्हें नौकरी मिलेगी वो एबीपी न्यूज से विदाई लेने में तनिक भी नहीं हिचकेगा. स्टार न्यूज के सूत्रों का कहना है कि जिनको कहीं ठिकाना नहीं मिल रहा है, वैसे लोग ही एबीपी न्यूज में काम करने को तैयार हैं. बाकी जिन लोगों के संबंध दूसरे ब्रांडों में हैं वो अपने लिए वहां जगह तलाश रहे हैं. संभावना है कि अगले कुछ महीनों में तमाम लोग एबीपी न्यूज को छोड़कर दूसरे ब्रांडों से जुड़ जाएं. प्रबंधन जोर शोर से प्रचार कर रहा है कि ''नाम बदलने से कुछ नहीं बदलता'' पर उसे अंदरुनी हालात देखकर अच्छी तरह पता चल रहा है कि नाम बदलने से बहुत कुछ बदलता है.
निकट भविष्य में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि अपनी ब्रांड वैल्यू रखने वाले दीपक चौरसिया तथा उनके जैसे कई स्टार पत्रकार कब तक एबीपी न्यूज में टिकते हैं. क्योंकि ब्रांड ही किसी पत्रकार को ब्रांड बनाता है. इसकी झलक प्रभु चावला जैसे पत्रकारों की ओर देखकर समझा जा सकता है. टीवी टुडे जैसे ब्रांड से जुड़े रहे प्रभु चावला पत्रकारिता के जबर्दस्त ब्रांड थे, पर नीरा राडिया प्रकरण के बाद टुडे ग्रुप से निकलकर कहां क्या कर रहे हैं आज किसी को मालूम नहीं है. भले ही उनके कुछ प्रोग्राम कुछ चैनलों पर चल रहे हों, पर उनकी ब्रांडिंग वैसी नहीं है, जैसी आजतक पर सीधी बातचीत के दौरान हुआ करती थी.
एबीपी न्यूज के परेशानी का सबब यह भी है कि रुपर्ट मर्डोक का स्टार समूह द्वारा गैर प्रतिस्पर्धी समय खतम होने के बाद स्टार ब्रांड नेम के साथ ही न्यूज इंडस्ट्री में कदम रखने की संभावना जताई जा रही है. स्टार समूह भी जल्द से जल्द इन डेढ़ सालों के खतम होने का इंतजार कर रहा है. क्योंकि उसके पास अपना एक ब्रांड वैल्यू है, उसे बस एक साझीदार की जरूरत है. और उसे साझीदार मिल गया तो उसको अपने ब्रांडिंग पर खास मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी. उसे पता है कि नाम बदलने से बहुत कुछ बदल जाता है. अब सबको एक जून का इंतजार है, लोग देखना चाहते हैं कि नाम बदलने से कुछ बदला कि नहीं?





