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सुख-दुख...

हमारी कोआर्डिनेटर महोदया मुझसे अंग्रेजी में सवाल पूछकर मेरी योग्यता पर सवालिया निशान लगाती रहती हैं

: नस्लभेद जैसा भाषायी भेदभाव : पराई भाषा की कठिनाई को समझिए। अभी हाल में ही मैंने एनसीआर की टॉप वन यूनिवर्सिटी होने का दावा करने वाले एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी हेतु एडमिशन लिया है, हमने सोचा था कि अच्छे विश्वविद्यालय में उच्च स्तरीय ज्ञान मिलेगा, कुछ नया शोध करेंगे। ज्ञान का तो अभी पता नहीं क्योंकि अभी तक केवल एक-दो कक्षा ही अटैंड की है। लेकिन, अंग्रेजी भाषा ने सिर में दर्द कर रखा है। मेरी कोर्स वर्क की क्लास में करीब दर्जन भर से अधिक छात्र हैं। अधिकांश नौकरी पेशा वाले है। कुछेक भारत सरकार के महकमों में उच्च पदस्थ अधिकारी हैं। मुझे छोड़कर सभी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते है।

: नस्लभेद जैसा भाषायी भेदभाव : पराई भाषा की कठिनाई को समझिए। अभी हाल में ही मैंने एनसीआर की टॉप वन यूनिवर्सिटी होने का दावा करने वाले एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी हेतु एडमिशन लिया है, हमने सोचा था कि अच्छे विश्वविद्यालय में उच्च स्तरीय ज्ञान मिलेगा, कुछ नया शोध करेंगे। ज्ञान का तो अभी पता नहीं क्योंकि अभी तक केवल एक-दो कक्षा ही अटैंड की है। लेकिन, अंग्रेजी भाषा ने सिर में दर्द कर रखा है। मेरी कोर्स वर्क की क्लास में करीब दर्जन भर से अधिक छात्र हैं। अधिकांश नौकरी पेशा वाले है। कुछेक भारत सरकार के महकमों में उच्च पदस्थ अधिकारी हैं। मुझे छोड़कर सभी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते है।

बात यहीं तक सीमित होती तो कोई बात नहीं थी। असलियत में मामला इससे बडा है। महिला-पुरूष छात्रों के अलावा हमारी कोआर्डिनेटर महोदया बीच-बीच मुझसे अंग्रेजी में सवाल पूछकर मेरी योग्यता पर सवालिया निशान लगाती रहती हैं। यह अलग बात है कि अंग्रेजी में पूछे गए उऩ प्रश्नों के जवाब में जानता हूं। जब मैं सही जवाब हिंदी में देता हूं तो  जवाब सही होने के बावजूद अंग्रेजी में न होने के कारण उसका वजन कम हो जाता है, ऐसा उनके चेहरों के बदलते भावों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही सहपाठियों की नजरों में भी प्रश्नवाचक चिह्न दिखाई देता है। उनके चेहरे के भाव ऐसे लगते है जैसे नस्लीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित किसी गोरे के बीच में कोई काला बैठा गया हो।

भाषायी भेदभाव को जीवन में पहली बार महसूस किया है। शायद देश में योग्यता और व्यक्तित्व ही काफी नहीं है, अंग्रेजीदां होना भी जरूरी है। क्या किया जाए जब देश ही पराई भाषा में चल रहा है। लुटियन जोन पूरी तरह अंग्रेजी से ग्रसित है। यदि मंत्रालयों के गलियारों में पहुंच बनाना चाहते हैं तो इसके लिए कुछ जरूरी हथकंडे आपके पास होने चाहिए जैसे जुबां पर अंग्रेजी, गले में टाई, बदन पर कोट और भारतीय परंपराओं ओर संस्कृति को तिरस्कारित करने का अनुभव साथ ही विनम्र जुगाड़ु।

दोस्तों, यह अलग बात है कि हिंदी के एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के प्रकाशन ने पत्रकारिता एवं जनसंचार  विषय पर लिखी गई मेरी एक पुस्तक को प्रकाशित करने व करीब साढे तीन लाख रूपये पारिश्रमिक देने का आश्वासन दिया है। पुस्तक जल्दी ही बाजार में उपलब्ध होगी। मैने अपने कैरियर की शुरुआत सन 2010 पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में मास्टर डिग्री करने के बाद हिंदी के एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में बतौर क्राइम रिपोर्टर की थी। स्वास्थ्य बेहद खराब होने के कारण पत्रकारिता छोडकर उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय में  करीब छह महीने अध्यापन किया। अभी सितंबर 2013 में उपरोक्त अंग्रेजीदां विश्वविद्यालय में बतौर पीएचडी छात्र प्रवेश लिया है।

आशीष कुमार

शोध छात्र
पत्रकारिता एवं जनसंचार
09411400108

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