पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें साहस की बुनियाद पर अपना कैरिअर बनता है, ऐसा हम कहा और सुना करते थे और आज ये मानते हैं कि अब शायद इन अल्फाज़ों के कोई मायने नहीं रह गए उसके पीछे वजह राशि और नारी ही है, जिस वासना कि तड़प में राजा महाराजा नहीं रह पाये तो हम आप क्या? फिर भी आज कुछ प्रतिशत ऐसे पत्रकार हैं जो आज भी अपनी कलम का लोहा मनवाए हुए हैं जिनमे हैं भाई तरुण तेजपाल। आज मीडिया कि मंडी में हकीकत में अयोग्य लडकियां अच्छी जगहों पर स्थान बनाये हुए हैं वही होनहार युवा दर दर भटकता नज़र आ रहा है. क्यों? क्यूंकि हर जगह ये अधिकांशत: अपने जिस्म को नुमाइश बनाकर हर बेहतर जगह पर काबिज़ हो चुकी हैं और ओहदेदारों कि प्यास बुझा रही हैं, बावजूद इसके कुर्सी मिली तो वासना एक ज़रुरत और नहीं मिली तो शारीरिक शोषण। ये हकीकत है इसे नकारा नहीं जा सकता।
आज लगभग हर समाचार चैनल और हर समाचार पत्र किसी न किसी पार्टी किसी न किसी नेता का समर्थक है और ऐसी होड़ में महज़ तहलका जैसे कुछ और हैं जो दूर अपना अलग आशियाना बनाये हुए हैं और निर्भीकता से कलमतोड़ लिख रहे हैं जो कि कुकर्मियों की आँख की किरकिरी बने हुए हैं जिसमे तरुण तेजपाल समेत कई अन्य शामिल हैं. रही बात तरुण तेजपाल जी कि तो उन्होंने अपनी गलती को मानते हुए माफ़ी मांगी है और पद से दूर रहने कि बात की है इससे बड़ी और कोई सजा एक पत्रकार के लिए नहीं है। ये खेल ये शोषण हर जगह है बस बात है कि किस हद तक खुलासा होता है किस हद तक नहीं, उन्होंने जो किया वो बेहोशी के हालात में थे, ऐसा हो सकता है। कायदा तो कहता है कि सजा शराब की है तरुण तेजपाल जी कि नहीं। हमारी सरकार खुद खुलेआम खोल रही है और ये भी कहती है कि शराब बुरी चीज़ है, गलती तो सरकार की है जो ऐसी बुरी चीज़ों को बढ़ावा दे रही है कायदे से पियक्कड़ों के अलावा सभी पत्रकारों को इस मय का विरोध करना चाहिए जिसकी वजह से एक ईमानदार पत्रकार पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। फिलहाल ये साजिशन खेल गोआ में विरोधियों ने करवाया हो क्यूंकि एक साधारण पत्रकार के अनगिनत दुश्मन होते हैं तो वो एक सम्पादक हैं कोई मामूली चिड़िया नहीं। हम तरुण तेजपाल जी का सम्पूर्ण समर्थन करते हैं और उनके खिलाफ चल रही साजिश में हम सभी पत्रकार उनका साथ देकर उन्हें बुरी नज़रों के जाल से पाकीज़ा वापस लायेंगे। आमीन।