: मेरे बचपन का स्कूल (पार्ट एक) : बेटा, जोर से बोलो- माता एक, पिता दस बारह… मौसी एक, मौसा अट्ठारह.. : दफ्तर में मीटिंग थी और मीटिंग में मास्टर साहबों की खबर पर चर्चा चल रही थी। बातचीत आज के मास्टर साहब और हम लोगों के दौर के मास्टर साहब तक पहुंची। सभी अलग-अलग अनुभव बता रहे थे। गुरुओं की पहले की परम्परा, उनका भय, उनका मान-सम्मान, उनकी संवेदनशीलता पर चर्चा बढ़ रही थी। आज स्कूलों की बुलंद इमारतों और गुरुजी के घटते सम्मान पर भी बातें हो रही थीं। गुरुओं के बहाने सब अपने अपने बचपन में जा रहे थे। अनायास ही मुझे भी अपने गुरुओं की याद आ गई।
तीन साल की उम्र से ही घर वालों ने मुझे भी स्कूल भेजना शुरू कर दिया था। याददाश्त पर जोर डालते हुए सबसे पहले चेहरा याद आता है पंडित जी का। नाम तो उनका श्याम सुंदर पांडेय था, लेकिन ये नाम भी हम लोग प्राइमरी पास करने के बाद ही जान पाए थे। काला रंग, सफेद बाल, मोटी मोटी सफेद मूंछें। प्राइमरी स्कूल था। इमारत नहीं थी, छप्पर भी नहीं था, पेड़ के नीचे बच्चों के बैठने का इंजाम था स्कूल के पास एक कुर्सी थी, जिस पर पंडित जी बैठते थे। दूसरे थे मुंशी जी। दोनों लोग पढ़ाते थे। मुंशी जी पढ़ाने के बाद कुर्सी को पेड़ से बांधकर ताला मार देते थे और रजिस्टर बांधकर अपने घर लेते जाते थे। बड़ी सहोदर परम्परा थी। पांचवीं कक्षा का छात्र चौथी वाले को, चौथी वाला तीसरी वाले को, तीसरी वाला दूसरी और पहली कक्षा वाले को पढ़ाता था, दूसरी या तीसरी कक्षा वाला कोई छात्र बड़ी गोल (आज का यूकेजी) और छोटी गोल (आज का नर्सरी या यूकेजी) को पढ़ाता था। समूह में पहाड़ा रटवाया जाता था। दो दूनी चार, दो तियां छह, दो चौका आठ। पढ़ाने वाला बोलता था, उसके पीछे सारे बच्चे जोर से बोलते थे। हिंदी और गणित यही दो सब्जेक्ट थे। हिंदी में भी क माने कबूतर ख माने खरगोश चलता था। पंडितजी बैठकर सुनते रहते, गलती होने पर खुद बोलकर सही करते थे।
स्कूल जाने की तैयारियां किसी रण पर जाने की तैयारियों से कम नहीं थीं। लकड़ी की काली पटरी को और भी काली करने के लिए खास उपाय होता था। ढिबरी छोटे ताक पर रख देते थे। रात भर काली राख ऊपर जमा हो जाती, उसे पानी में घोलकर पहले पटरी काली की जाती थी। इतने से काम नहीं बनता था। पटरी सूखने के बाद उसे मठारा जाता था। इसके लिए एक शीशी पटरी पर रगड़ी जाती थी। तब तक जब तक कि पटरी चमकने ना लगे। फिर दुद्धी वाली दवात में धागा डुबो कर पटरी पर इधर से उधर लगाकर छिट्टा मारकर लाइन तैयार की जाती थी। इन लाइनों के बीच में ही लिखना होता था। फिर स्कूल की तरफ चल देते थे। ममेरे, फुफेरे मिलाकर छह भाई बहन स्कूल जाते थे। साथ में बारी काका (घर के पुराने कर्मचारी) बोरा और टाट पट्टी बांधकर चलते थे। करीब किलोमीटर भर दूर दूसरे गांव में स्कूल था। सभी पैदल निकलते थे। सुबह प्रार्थना होती थी-
वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।
पर सेवा पर उपकार में हम जग जीवन सफल बना जावें
शाम को छुट्टी होने के बाद पटरी पर जो लिखा होता था, उसे संभालकर घर लाते थे, क्योंकि उसे घर में दिखाने पर शाबाशी मिलती थी।
चौथी क्लास में पहुंचा तो उसी पेड़ के नीचे वाले स्कूल से दो सौ कदम दूर जूनियर हाई स्कूल खुल गया था। आठवीं तक का स्कूल। उसमें ईंट की दीवारें थीं, ऊपर छप्पर। फिर क्या था हम लोग अपना बोरा समेटकर उसमें चले गए। जूनियर स्कूल में प्रिंसिपल साहब थे सहानी जी। ओपी मास्टर साहब बड़ी बड़ी मूंछों वाले थे। बच्चे उनके नाम से डरते थे। अगर कोई बाहर खेल रहा होता और ओपी मास्टर साहब दिख जाते तो भगदड़ मच जाती थी। जो भाग नहीं पाता वो एक ओर मुंह करके ऐसे बैठ जाता था, जैसे बैठकर सूसू कर रहा हो। ओपी मास्टर साहब धोती कुर्ता पहनते थे, यही पहनकर वे फुटबॉल भी खेलते थे, बढ़िया फुटबॉलर थे। बाद में एक बीपत मास्टर साहब आए। उनका नाम ही था बीपत। हाई स्कूल पास थे, बीपत मास्टर साहब हम लोगों को गणित पढ़ाते थे। एक दिन एक सवाल गलत पढ़ा रहे थे, मैंने टोककर उन्हें सही करना चाहा तो वे भड़क गए। स्केल से पीटना शुरू कर दिया। बचपन की बदमाशी का क्या कहेंगे। मैंने उनका नाम लेकर जोर जोर से उन्हें चिढ़ाना शुरू कर दिया-बीपत बीपत बीपत बिपता बिपता…। मार पड़ती रही, बीपत-बिपता का उच्चारण चलता रहा। थके तो बीपत मास्टर साहब। शिकायत घर गई, बची खुची पिटाई घर में हुई।
हम सबने तय किया कि यहां नहीं पढ़ेंगे, फिर क्या, बगल में अब तक करीब करीब सूने पड़ चुके पंडितजी वाले प्राइमरी में चले गए। पंडितजी खुश..। मंगरहिया बाजार वहीं लगता था मंगलवार को, वहां से मंगवाकर शाम को जलेबी भी खिलवाई। लेकिन कहां यहां चींटों के बीच पेड़ के नीचे धूप से बचकर बैठना और कहां छप्पर के नीचे का मजा। उधर सहानी मास्टर साहब को पता चला तो घर पहुंच गए, हम सभी को मनाया और हम लोग वापस जूनियर स्कूल में।
मैं पांचवीं में था, गांव के पंडितजी के भानजे थे दयान भइया वो भी आ गए थे हमारे साथ । मौसी का बेटा भोलू भी हमारे साथ ही था, पहली क्लास में नाम लिखाया था। घर में बड़े भइया ने दो अल्सेसियन कुत्ते पाल रखे थे। एक कुतिया थी लूसी, कुत्ता टॉमी। टॉमी को गुड़ बहुत पसंद था। वो गुड़ की लालच में हम लोगों के साथ ही रहता, सारी बातें मानता। उसका उपयोग हम गधे की तरह करते थे। यानी हम सभी का बस्ता एक दूसरे से बंध जाता और वो लद जाता टॉमी की पीठ पर। टॉमी साथ साथ चलता चलता स्कूल आ जाता, स्कूल के पास आते ही हम लोग बस्ता-पटरी उतार लेते थे, वापसी के वक्त भी यही होता था। बस्ता उतारने के बाद टॉमी को इनाम का गुड़ मिलता। स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में घूरे काका घास काटते करीब करीब रोज मिलते थे। वे हम लोगों से कहवाते थे, बोलो बेटा- माता एक पिता दस बारह..। मौसी एक मौसा अट्ठारह..। हम लोग कह देते थे, फिर वो ठहाके लगाते। एक बार यही जुमला घर में जोर जोर से दोहरा रहे थे हम लोग, अम्मा आई फिर पिटाई भी लगी। गांव के काका लोग मजाक में हम बच्चों से कहते— देखो मौसा मत कहना नहीं तो मैं कुएं में कूद जाऊंगा, फिर क्या था हम लोग मौसा मौसा कहते थे, वो दौड़ लगाते थे। सबका मनोरंजन होता था, गांव की काकियां, चाचियां और मां हम लोगों से कहती थीं कि मौसा नहीं फूफा कहो। हम फूफा कहते तो काका लोग डांटते- …पिता को गाली पड़ती है बाबू, मत बोलो।
खैर, हम लोगों का स्कूल जाना और आना बेहद आराम का मामला हो गया था। बस्ता ढोते थे टॉमी उस्ताद.. और हम लोग फ्री। एक दिन स्कूल से लौट रहे थे, गरमी का मौसम था, अल्सेसियन प्रजाति के टॉमी महाराज को भी शायद लग गई गरमी। जनाब हम सबके बस्ते और भोलू की पटरी समेत बंधे के नीचे उतरकर गड़ही में उतर गए। जब तक हम लोग मना करते, चिल्लाते, टॉमी महाराज ने आखिरकार कुत्तापन कर दिया। हम लोगों के बस्ते और भोलू की पटरी को वहीं पर प्रवाहित करके बाहर निकल आया। अब पहले जो डूबा है, उसे बचाएं या फिर टॉमी को उसके किए की सजा दें। खैर दयान भइया ने पजामा उतारा, पटरे वाली जांघिया में आए और गड़ही में घुसकर बस्ता पटरी निकालकर बाहर आए। जस्ते के कागज की कॉपियों पर नरकट की कलम से लिखी इबारतें पन्नों की सीमा तोड़ चुकी थीं। पानी से मिलकर पानी हो चली थीं। किताबें तेजी से लुगदी का आकार ले रही थीं। लेकिन भोलू का दुख सबसे बड़ा था। हर रोज मां को पटरी दिखाता, मिठाई पाता। वो जोर जोर से रोने लगा। ये धमकी भी दी कि मां को सब सच सच बता दूंगा कि आप लोग कुत्ते की पीठ पर बस्ता लादते हो।
एक तो किताब-कापी बरबाद होने के खतरे से स्कूल में सहानी और ओपी मास्टर का डर और ऊपर से भोलू ने और भी डरा दिया। जल्दी जल्दी सारी किताब-कॉपी बंधे पर फैलाई, शाम चार बजे, धूप कड़क थी, पन्ने थोड़े बहुत सूख रहे थे, लेकिन कितना सूखते। हम लोग बहाना सोच रहे थे कि घर जाकर क्या कहेंगे, लेकिन भोलू ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। घर आते ही सारी कहानी मां के सामने दे मारी। अंजाम वही पुराना। जमकर पिटाई हुई। भोलू को सच बोलने की शाबाशी मिली और मिठाई भी। स्कूल में ओपी मास्टर साहब ने मुझे तो बख्श दिया, लेकिन दयान भाई खूब पिटे। इस क्रांतिकारी घटना के बाद हम लोगों ने अपनी टीम से टॉमी को बर्खास्त कर दिया।
घर में शुक्ला पंडितजी का आगमन हो चुका था। शुक्ला पंडित जी मेरे गांव से तीन किलोमीटर दूर तिल्लहिया हाई स्कूल में टीचर बनकर आए थे। बड़े भाई बहन अब वहीं पढ़ते थे। शुक्ला पंडितजी का गांव स्कूल से बहुत दूर था। पिताजी उन्हें बड़े आदर के साथ घर लाए थे। गोरा रंग, नुकीली मूंछें, कभी जोर का हंसना तो कभी खूब गुस्सा होना। पंडितजी हमें मानते बहुत थे, लेकिन थे बहुत सख्त। कोई बहाना नहीं चलने देते थे। हम लोग शाम ढलने के बाद लालटेन जलाकर उसके चारों तरफ बैठकर पढ़ते थे। सात आठ लोगों की गोल थी। कई बार उसमें शुक्ला पंडितजी की पिटाई से बचने के उपायों पर चर्चा होती थी। रास्ता सिर्फ एक ही था कि खूब जमकर पढ़ो, लेकिन इस रास्ते पर कोई मन से चलने को तैयार नहीं था।
मैं दिद्दा (ताई, जिन्होंने मुझे पाला है) का दुलारा था। शुक्ला पंडितजी जब मुझे पीटते तो दिद्दा उन्हें खूब बुरा भला कहतीं- बाबू शुकुलवा के लाइल बाटें लड़िकन के जान लेवे खातिर। मनई है कि कसाई, बताव लड़िका के देहिं पर साटि पड़ि गइल (बाबू इस शुक्ला को बच्चों की जान लेने के लिए लाए हैं, ये आदमी है या कसाई, बताओ लड़के के बदन पर निशान पड़ गए)। लेकिन जब शुक्लाजी हम लोगों को पीटते तो पिताजी और मां दोनों को खुशी मिलती थी। उन्हें लगता था कि मन से पढ़ा रहे हैं पंडितजी। रात में उन्हें मिलने वाले दूध की मात्रा बढ़ जाती थी। शाम को पढ़ाई के लिए बैठते तो इंतजार रहता कि कब खाने के लिए बुलावा आए तो पढ़ाई से छुट्टी मिले। पेट दर्द, सिर दर्द, दांत दर्द जैसे बहाने शुक्ला पंडितजी के सामने नहीं चलते थे। छोटे भइया ने एक दिन पेट पकड़कर बहाना किया कि उन्हें जोर से …लगी है। मिल गई छुट्टी, लोटा लेकर गए और लौटे करीब आधे घंटे बाद। शुक्ला पंडितजी नल पर ही मिल गए। बोले चलो दिखाओ कहां गए थे, मैं चेक करूंगा। भइया उन्हें कहां लेकर जाते। नतीजा फिर वही खजूर का डंडा, फिर वही पिटाई। खाने के वक्त पैर न धोने पर पैर पर डंडे पड़ते थे। दिया हुआ पाठ याद न करने पर हाथ पर डंडा पड़ता था और हाथ छिपाया तो पीठ पर तो शुक्ला पंडितजी का ही हक था। शुक्ला पंडितजी हम लोगों को मानते भी थे, लेकिन उनका प्यार उनके खौफ के भीतर हमेशा दबा रहता था। वैसे भी हम लोग सीधा सीधा प्यार जानते पहचानते थे, किसे फुरसत थी कि दिल में घुसकर प्यार तलाशे।
इधर हमारे स्कूल में बीपत मास्टर साहब हट गए थे, राम दया मास्टर साहब आ गए थे। स्कूल आने से पहले उनके अफसाने आ गए थे, एक बार चोरी करते रंगे हाथ पकड़ाए थे, जेल भी गए थे। उनके बारे में ये भी चर्चा थी कि वे डकैतों के एक गिरोह में भी कुछ दिन थे। खैर रामदया मास्टर साहब बड़े दबंग थे। पांचवीं क्लास की गणित पढ़ाने का जिम्मा उनके पास ही था। पढ़ाते बढ़िया था, मुझसे बहुत खुश रहते थे, क्योंकि शुरू से ही गणित का माहौल मेरे पास था। चौथी क्लास में ही पांचवीं के सारे सवाल मैंने हल कर लिए थे। रामदया मास्टर साहब बाकी बच्चों से छिपकर मुझसे एक दो सवाल हल करवाकर समझते थे। फुटबॉल वो भी बढ़िया खेलते थे। बरगदहा हाई स्कूल की टीम से मैच हुआ तो हमारे स्कूल को जीत मिली, रामदया मास्टर साहब ने अकेले आठ गोल दागे थे। रामदया मास्टर साहब ने किसी लड़के की पिटाई तो नहीं की, लेकिन एक दिन सहानी मास्टर साहब से झगड़ा हो गया, रामदया मास्टर साहब ने उन्हें पीट दिया। नतीजा ये हुआ कि स्कूल से बाहर हो गए।
पांचवीं पास करके मैं भी छठीं में तिल्लहिया हाई स्कूल पहुंच गया। स्कूल के करीब करीब सारे अध्यापक मेरे घर आते जाते थे, सभी दुलारते थे, प्यार करते थे, और अब ये सब मेरे गुरुजी बनने वाले थे।
….जारी…..
लेखक विकास मिश्र टीवी जर्नलिस्ट हैं. वे दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों में लंबी पारी खेलने के बाद टीवी की तरफ मुड़े और आजतक, आईबीएन7, न्यूज24 जैसे चैनलों से होते हुए आजकल महुआ ग्रुप के साथ जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. विकास के लिखे इसके पहले के लेख-आलेख-संस्मरण आदि को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें…





