बात उन दिनों की है जब पत्रकारिता का छात्र हुआ करता था. दिल्ली में रहता था. भारत और चीन के बीच विवाद चल रहा था. सारे चैनल उसी में डूबे हुए थे. एक उन्माद की तरह दिखाया जा रहा था कि बस कल चीन भारत पर हमला करेगा और भारत की कहानी खत्म. हम दोस्तों के बीच इसी बात पर रोजाना बहस होती थी, बतकही भी. एक दिन हमारे साथी विकास ने कहा कि यार एक नई साइट है भड़ास, उस पर प्रभात खबर के संपादक हरिवंश का लेख आया है. इसी मामले पर.
मैंने झट से खोला उस पेज को और देखते ही पहली नजर में मेरी प्रतिक्रिया थी- महराज, इतना बड़का लेख कौन पढ़ेगा!
विकास ने दबाव बनाया कि अरे मरदे एक बार पढ़िये तो सही. मैने पढ़ना शुरू किया और सच कह रहा हूं कि बिना रुके पूरा पढ़ गया. और तब से लगातार हरिवंश जी को पढ़ रहा हूं. दिल्ली रहते हुए उन्हें पढ़ने की लत-सी लग गयी. धीरे धीरे समझदारी बढ़ी, अनुभव हुए और हरिवंश जी का कद मेरी नजर में उतना ही बड़ा होता गया. मैं अपने एक साथी को अक्सर कहा करता था कि यार हरिवंश जी तो मेरे लिये पत्रकारिता के अमिताभ बच्चन ही हैं न.
कुछ माह पहले की बात है. तहलका वाले निराला और वे साथ में बनारस जा रहे थे. निरालाजी मेरे साथ ही थे. हरिवंशजी उन्हें लेने पटना में किराये वाले आवास के पास के चौक अनिसाबाद पहुंचे. मैं भी चौक पर निरालाजी को छोड़ने गया. हरिवंशजी से मुलाकात हुई. मैं थोड़ा नर्वस था कि उनसे क्या बात करूंगा. हरिवंशजी मुझसे गर्मजोशी से मिले, बता नहीं सकता, उस वक्त मैं कैसा महसूस कर रहा था. उन्होंने ड्राइवर को कहा था, गाड़ी साइड में कर लो, शशि से पहली बार मिल रहा हूं, थोड़ी देर बातचीत तो कर लूं.

लगभग 10-15 मिनट तक उनसे बातचीत होती रही. मैं सम्मोहित सा हो गया था. मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं इतने बड़े संपादक से मिल रहा हूं. बड़ी ही सहजता से वे पूछ रहे थे क्या चल रहा है शशि तुम्हारे जिले में, क्या राजनैतिक स्थिती है वहां की, क्या खबर लिख रहे हो आदि-इत्यादि. कुछ दिनों बाद वे फिर निरालाजी के साथ ही कहीं जा रहे थे. पटना हाईकोर्ट मोड़ पर फिर उनसे मुलाकात हुई. गाड़ी से उतरते ही उन्होंने गर्मजोशी से मिलते हुए कहा कि चलो उस दिन चाय नहीं पी सके थे हम लोग, अभी कहीं पीते हैं.
मैं बता नहीं सकता, दो मुलाकातों के बाद वे मेरे मानसपटल में किस तरह से रच-बस गये हैं. इतना बड़ा पत्रकार, संपादक क्या हकीकत में इतना सीधा, सरल, सहज हो सकता है. अभिमान से कोसो दूर रहनेवाला…!
कल हरिवंश जी को फिर देखा. लेकिन इस बार जानबूझ कर मिला नहीं, बस दूर से देखा. वे राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा भरने आये थे. वही साधारण वेश-भूषा, शर्ट-पैंट और स्वेटर. इससे पहले भी दो नेताओं को परचा भरते हुए देखा. तमाम लटके-झटके नारेबाजी, माला गाजा-बाजा के साथ पहुंचे हुए. इन सब के बीच हरिवंश जी को देख आश्चर्य हो रहा था. वे उसी तरह धीरे-धीरे जा रहे थे. कार्यकर्ताओं की भीड़ में कहीं पीछे छूट जा रहे थे. एकदम अकेले.
मैं गांव का रहनेवाला हूं, मैंने देखा है कि एक वार्ड कमिश्नर का चुनाव लड़नेवाला भी कितनी तैयारी के साथ जाता है परचा भरने. एक अच्छी पहल आज उन्होंने की, जो उनसे ही उम्मीद की जा सकती थी. उन्होंने आज बिना कुछ छिपाये अपने सम्पत्ति और परिवार का विस्तृत ब्यौरा दिया. जितने विस्तार से उन्होंने बताया है, उसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने विवेक से सब कुछ बताया. बहुतों को बहुत निराशा हुई होगी. सब अनुमान लगाते थे कि हरिवंशजी अरब तक तो कमा ही लिये होंगे लेकिन 37 सालों की नौकरी में जो हिसाब उन्होंने दिये हैं, वह तो बिहार में आजकल कई विभागों के मामूली से क्लर्क भी रखते हैं.
लेखक शशि सागर युवा और प्रतिभावान पत्रकार हैं. उनसे संपर्क shashi sagar [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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