प्रिय यशवंत जी, राजेश वर्मा की शहादत के बाद से लगातार भड़ास देख पढ़ रहा हूं। आइबीएन वालों का जमीर अब तो जागे। ये सिर्फ एक राजेश वर्मा की कहानी नहीं है, हजारों राजेश वर्मा जो फर्ज के लिए जान न्योछावर करते हैं, इन्हें इनकी कोई परवाह नहीं होती … परवाह बस टीआरपी और पैसों की होती है।
पूरा देश आज इनसे इंसाफ मांग रहा है… आपके साथ पूरा देश खड़ा है । हम सब मिलकर इस आवाज को इतना बुलंद करें कि इन बहरों के कान तक ये आवाज पहुंचे। अगुआ आप बनें, हम सब साथ हैं। एक स्ट्रिंगर के दर्द की बानगी कुछ लाइनों में भेज रहा हूं। हो सके तो इसे पोर्टल पर स्थान दें। आग्रह यह भी कि इन आकाओं के खिलाफ तब तक आवाज उठती रहे जब तक कोई गंगा इस हिमालय से न निकल जाए।
भवदीय
विवेक चन्द्र
लाइफस्टाइल टीवी
पटना
एक स्ट्रिंगर के आंसू…….
-विवेक चंद्र-
मुझसे मत पुछो मेरा दर्द…… बस सिसकने दो मुझे यू ही अनवरत….. सिसकता ही तो आया हूं अब तक…. आज मेरा एक और भाई षहीद हो गया…..पता था मुझे कि फर्ज पर कुर्बान होने के बाद भी आकाओं को एक स्क्रांल तक चलाने का वक्त नहीं मिलेगा। दुख नहीं होता मुझे अब तो आदत हो गई है। खुद के कैमरे से जान पर खेल ब्रेककिंग करने वालों के लिए किसे फुर्सत है। हम टीआरपी देते हैं पर टीआरपी नहीं बन पातें । गलती हमारी ही है हम ने अपने अंदर के पत्रकार को अब तक नहीं मारा। एक धंधेबाज नहीं बन पाए… एक लाइजनर नहीं बन पाए… बन पाते तो आज बाइक पर कैमरा लाद खबरें ढूढने और लाने का जुनून छोड़ एसी स्टुडियेां में ब्रेक के बाद कर रहे होते…. चेहरे
पर मेकअप पुतबा पोलिटिकल डीवेट कर रहे होते और किसी के मौत की वैल्यू टीआरपी के वेट से टटोल रहे होते…. नहीं …नहीं …. नहीं … चाहिए हमें ऐसी खुशी…. नहीं चाहिए वैसा काम ….जहां दिल बस साउंड इफेंकट डाल धड़काया जाता है और कैमरे के सामने चीख चिल्ला कर लाशें बेची जाती हैं, वो भी प्रोफाइल देखकर ….. मेरे हजारों भाइयों ने आज भी अपना जमीर बेचना मुनासिब नहीं समझा … हमें गर्व है कि हम फर्ज के लिए अपनी जान देते हैं…. हां, हम स्ट्रिंगर हैं….. और हमें इसका गुमान है….. हमें गर्व भी है कि आज भी हमने बचा रखी है अपने दिल में धड़कन, आंखों में पानी और चेहरे पर लज्जा। हिम्मत हो तो कभी एसी न्यूज रूम से निकल एक दिन के लिए भी स्ट्रिंगर बनकर देख लेना। सिसकने दो मुझे.. रोने दो मुझे… आज तो मत रोको… बह जाने दो आंसुओं को … मैंने अपने भाई को खोया है……






