इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच द्वारा आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर से जुड़े एक प्रकरण में उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दायर रिट याचिका को सिरे से ख़ारिज कर दिया गया. ठाकुर के खिलाफ एसपी देवरिया के रूप एक विभागीय जांच 2004 में शुरू की गयी थी और 25 मई 2007 को उन्हें चेतावनी देते हुए यह जांच समाप्त कर दिया गया. इसके दो साल बाद शासन द्वारा 26 मई 2009 को यह जांच फिर शुरू कर दी गयी.
दो साल बाद इस तरह से जांच शुरू करना नियम विरुद्ध था क्योंकि अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियमावली के नियम 24 के अनुसार कोई भी विभागीय जांच समाप्त होने के एक साल के अंदर ही दुबारा शुरू की जा सकती है. ठाकुर ने इसके खिलाफ कैट, लखनऊ में वाद संख्या 177/2010 दायर किया. कैट ने उनकी बात सही मानते हुए 08 सितम्बर 2011 को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दुबारा प्रारम्भ किये गए इस जांच को निरस्त कर दिया.
शासन ने कैट के आदेश का पालन नहीं किया तथा इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में रिट याचिका संख्या 2078/ 2011 (एसबी) दायर कर दिया. 20 मार्च 2012 को जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस डीके अरोड़ा की बेंच ने कैट के निर्णय को सही मानते हुए राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया. राज्य सरकार ने इस रिट याचिका के लंबित होने के नाम पर ठाकुर की प्रोन्नति रोकी हुई थी. इस तरह ठाकुर द्वारा कुंवर फ़तेह बहादुर, पूर्व प्रमुख सचिव गृह पर जानबूझ कर प्रताडित करने के आरोप की और अधिक पुष्टि हो गयी.





