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हिंदी की तकनीकी प्रगति पर संतोष का समय नहीं आया

नई दिल्ली। जाने-माने हिंदी तकनीक विशेषज्ञ और प्रभासाक्षी.कॉम के संपादक बालेन्दु शर्मा दाधीच ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के तहत एक कार्यक्रम में कहा कि कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी में काम तो बहुत हुआ है लेकिन उस पर संतोष करने का समय अभी नहीं आया है। श्री दाधीच ‘सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी’ विषय पर आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। गोष्ठी में बीबीसी हिंदी.कॉम की प्रमुख सलमा जैदी और वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विशेषज्ञ वर्तिका नंदा, भारत सरकार के तकनीकी संस्थान सीडैक के वरिष्ठ अधिकारी, हिंदी के तकनीकी विशेषज्ञों और विद्वानों ने शिरकत की।

नई दिल्ली। जाने-माने हिंदी तकनीक विशेषज्ञ और प्रभासाक्षी.कॉम के संपादक बालेन्दु शर्मा दाधीच ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के तहत एक कार्यक्रम में कहा कि कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी में काम तो बहुत हुआ है लेकिन उस पर संतोष करने का समय अभी नहीं आया है। श्री दाधीच ‘सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी’ विषय पर आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। गोष्ठी में बीबीसी हिंदी.कॉम की प्रमुख सलमा जैदी और वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विशेषज्ञ वर्तिका नंदा, भारत सरकार के तकनीकी संस्थान सीडैक के वरिष्ठ अधिकारी, हिंदी के तकनीकी विशेषज्ञों और विद्वानों ने शिरकत की।

श्री दाधीच ने कहा कि कंप्यूटर पर स्वदेशी भाषाओं में काम करना संभव और आसान हो गया है लेकिन अब इसके आगे की फिक्र किए जाने की जरूरत है। गूगल के सीईओ एरिक श्मिट ने कुछ साल पहले भविष्यवाणी की थी कि इंटरनेट पर हिंदी और मंदारिन भाषाएं अंग्रेजी को बहुत पीछे छोड़ देंगी। मंदारिन तो बढ़ते-बढ़ते इंटरनेट की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है लेकिन हिंदी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। हिंदी उपयोक्ताओं के बीच तकनीकी विषयों पर जागरूकता बढ़ाने की बहुत जरूरत है।

उन्होंने कहा  कि बुनियादी तकनीकी आवश्यकताएं पूरी होने के बाद अब हिंदी  में ई-प्रशासन, ई-सेवाओं, ई-कॉमर्स, ई-शिक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही साथ मोबाइल फोन, हैंडहेल्ड गैजेट्स, एटीएम यहाँ तक कि कैलकुलेटर से लेकर गेमिंग डिवाइसेज और खिलौनों की एलसीडी स्क्रीन्स तक में आम आदमी की भाषा और लिपि आनी चाहिए। श्री दाधीच ने तकनीकी क्षेत्र में मौजूद समस्याओं और चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि मूल रूप से अंग्रेजी में बनी लाखों वेबसाइटों की सामग्री हिंदी में अनूदित की जानी चाहिए। हर बड़ी कंपनी और संगठन की हिंदी में वेब पर मौजूदगी होनी चाहिए। पुराने फॉन्ट्स में पड़े करोड़ों-अरबों हिंदी के डॉक्यूमेंट यूनिकोड में कनवर्ट किए जाने चाहिए। ट्रांसलेशन, स्पीच-टू-टेक्स्ट, ओसीआर जैसी इनोवेटिव तकनीकों के एकाध नहीं बल्कि दर्जनों विकल्प आने चाहिए। हर कीबोर्ड पर हिंदी के अक्षर मुद्रित करने की अनिवार्यता होनी चाहिए।

उन्होंने सन 2000 से लेकर 2010 की अवधि को हिंदी  के विकास का ‘तकनीकी स्वर्णकाल’ करार दिया। इस दौरान यूनिकोड नामक स्टैंडर्ड के लोकप्रिय होने के बाद हिंदी में बड़े स्तर पर तकनीकी कार्य हुआ है। इसमें मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ-साथ सीडैक जैसे सरकारी उपक्रमों तथा आईआईटी जैसे शैक्षणिक संस्थानों और निजी कंपनियों का अहम हाथ रहा। लेकिन जिस एक व्यक्ति को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है, वह है दुनिया भर में फैला हुआ हमारा उत्साही युवा, जिसने छोटी-छोटी तकनीकी हिंदी युटिलिटीज और ब्लॉगिंग जैसे रचनात्मक माध्यमों के जरिए हिंदी की राह आसान बनाने में योगदान दिया है। जब भी कोई समस्या आती है, कहीं न कहीं से कोई तकनीक-प्रेमी युवा उसका समाधान लेकर हाजिर हो जाता है

ब्लॉगरों की प्रशंसा करते हुए बालेन्दु दाधीच ने कहा- “मेरा मानना है कि स्वांतः सुखाय होते हुए भी ब्लॉगिंग का हिंदी के लिए अहम योगदान है। पहली बात- ब्लॉगरों ने हिंदी भाषियों में प्रचलित इस धारणा का विश्वव्यापी खंडन किया है कि कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी में काम करना मुश्किल है। हर ब्लॉगर इंटरनेट पर और अपने आसपास हिंदी का एक ‘अनपेड’ एम्बेसडर है। वह हिंदी के हक में बोलता है, उसके लिए बहस करता है, उसके अभियान को ताकत देता है। ब्लॉगिंग हमें अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित कर रही है। वह नए साहित्य सर्जकों को जन्म दे रही है। इन हजारों ब्लॉगरों में से कुछ अवश्य ही हिंदी साहित्य को समृद्ध करेंगे।

वर्तिका नंदा ने कहा कि न्यू मीडिया में  उत्तरदायित्व के बोध की कमी  है। वह बहुत जल्दी निष्कर्ष निकाल लेता है और किसी को भी रातोंरात चर्चित कर कहीं से कहीं पहुंचा देता है, भले ही वह व्यक्ति इसका पात्र हो या नहीं। एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में ब्लॉगिंग और सोशियल नेटवर्किंग के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि आज जबकि मुख्यधारा का मीडिया मैनेज होने लगा है, सूचनाओं के स्वतंत्र संवाहक के रूप में न्यू मीडिया अहम भूमिका निभा सकता है।

सलमा ज़ैदी  ने कहा कि न्यू मीडिया लगातार बदल रहा है और नए रूपों, नई तकनीकों तथा नए माध्यमों को आत्मसात कर रहा है।  बीबीसी में इसे ‘फ्यूचर मीडिया’ कहा जाता है क्योंकि अब वह सिर्फ टेक्स्ट तक सीमित नहीं है बल्कि उसमें इंटरएक्टिविटी और मल्टीमीडिया भी समाहित है। उनका मानना था कि न्यू मीडिया में हर तरह के लोग हैं, जिनमें से अनेक बहुत जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभा रहे हैं। ब्लॉगों पर अपशब्दों और खराब भाषा के प्रयोग से वे व्यथित दिखाई दीं।

तकनीकी विशेषज्ञों- विजय कुमार मल्होत्रा और भारत भूषण ने ब्लॉगिंग और प्रकाशन उद्योग से जुड़े मुद्दे उठाए और उनके समाधान पर जोर दिया। सीडैक के अधिकारियों ने संस्थान द्वारा विकसित किए गए कुछ आधुनिक अनुप्रयोगों  का प्रदर्शन किया जिनमें श्रुतलेखन (डिक्टेशन सॉफ्टवेयर) और वाचांतर (टाइप की गई सामग्री को ध्वनि में बदलने का सॉफ्टवेयर) शामिल थे। संगोष्ठी में यह निष्कर्ष निकल कर आया कि हालाँकि हिंदी में तकनीकी स्तर पर बहुत कार्य हुआ है लेकिन अब इस भाषा को तकनीकी विकास के दूसरे चरण के लिए तैयार किए जाने की जरूरत है। साथ ही साथ, आम लोगों के बीच कंप्यूटर पर हिंदी में काम करने के प्रति जागरूकता पैदा करनी होगी।

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