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हिंदी में एक ऐसी किताब जो पन्‍ना दर पन्‍ना आपको चकित करती है

Manisha Pandey : हिंदी में जाने कितने बरसों बाद एक ऐसी किताब आई जो पन्‍ना दर पन्‍ना आपको चकित करती है। एक ऐसी किताब, जिसे आप पढ़ते नहीं, किताब खुद को पढ़वा लेती है क्‍योंकि आप लाख चाह लें, एक बार शुरू करके उसे छोड़ नहीं सकते। किताब इतिहास के गलियारों में ले जाती हैं, भाषा के चमत्‍कार से चकित करती है, रुलाती है, अवसाद में डुबो देती है और मुहब्‍बत के सबसे बीहड़ बियाबानों में अकेला भटकने के लिए छोड़ देती है। इस भटकन का सुख तो वही जानते हैं तो किताबों के संग-संग भटके हैं।

Manisha Pandey : हिंदी में जाने कितने बरसों बाद एक ऐसी किताब आई जो पन्‍ना दर पन्‍ना आपको चकित करती है। एक ऐसी किताब, जिसे आप पढ़ते नहीं, किताब खुद को पढ़वा लेती है क्‍योंकि आप लाख चाह लें, एक बार शुरू करके उसे छोड़ नहीं सकते। किताब इतिहास के गलियारों में ले जाती हैं, भाषा के चमत्‍कार से चकित करती है, रुलाती है, अवसाद में डुबो देती है और मुहब्‍बत के सबसे बीहड़ बियाबानों में अकेला भटकने के लिए छोड़ देती है। इस भटकन का सुख तो वही जानते हैं तो किताबों के संग-संग भटके हैं।

जानते हैं ये किताब कौन सी है। ये किताब है उपन्‍यास – कई चांद थे सरे आसमां और इसके राइटर हैं – शम्‍सुर्रहमान फारुखी।

मैं टेन थाउजेंड पर्सेंट कन्विक्‍शन के साथ ये कह रही हूं कि ये किताब पढि़ए। आप निराश नहीं होंगे। लेकिन उससे भी पहले कल शम्‍सुर्रहमान फारुखी जी से खुद मिलिए, उन्‍हें सुनिए, उन्‍हें जानिए। आखिर वो कौन सी निगाह है दुनिया को देखने की, जिससे आग का दरिया और कई चांद थे सरे आसमां जैसे उपन्‍यास जन्‍म लेते हैं। कल से इंडिया हैबिटैट सेंटर में शुरू हो रहे लिटरेचरल फेस्टिवल का उद्घाटन फारुखी जी ही कर रहे हैं और उनके साथ हैं हम सबके प्रिय दीवार में एक खिड़की रहती थी वाले विनोद कुमार शुक्‍ल।

इंडिया टुडे हिंदी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल पर 23 अक्टूबर 2013 को प्रकाशित.

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