वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीयहिंदी विश्वविद्यालय में सोशल साइंस कांग्रेस का भव्य आयोजन हो रहा है। देशभर के विशेषज्ञ जुट रहे हैं। इस खबर से इस विश्वविद्यालय पर कुछ लिखने की इच्छा हुई। पत्रकारिता की दिनचर्या में डेढ़-दो वर्ष पहले वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की नकारात्मक खबरों से मन में यह जानने की उत्सुकता हुई कि क्या सच में महात्मा गांधी की कर्मभूमि पर स्थित यह विश्वविद्यालय इतना बदनाम है। इस संबंध में एक पत्रकार के रूप में कई मामलों की पड़ताल की। कई आश्चर्यजनक पहलू सामने आएं, जो विश्वविद्यालय धीरे-धीरे तरक्की की राह पर रफ्तार पकड़ रहा था, उसे सुनियोजित तरीके से कलंकित करने का प्रयास चल रहा था।
ऐसे लोगों में वे लोग शामिल थे, जो किसी न किसी तरह से विश्वविद्यालय से येन-केन-प्रकारेण लाभ पाने से वंचित रह गए थे। ऐसे लोगों के एक सक्रिय गैंग ने पिछले कुलपति की कार्यशैली को पंगु बना दिया था। लेकिन जब एक पुलिस के ऊंचे ओहदे को संभाल चुके विभूति नारायण राय को यहां की जिम्मेदारी मिली तो, उन्हें अपने इरादों पर पानी फिरता नजर आने लगा। पुलिस अधिकारी के रूप में अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले लोगों का सामना कर चुके व्यक्तित्व की आंखें सहज ही चोर इरादों को पहचान गई। निश्चय ही राय ने ऐसे सक्रिय गुटों के इरादों पर पानी फेरा होगा, तभी तो प्रतिक्रिया स्वरूप सुनियोजित तरीके से कुलपति और विश्वविद्यालय को बदनाम करने का सिलसिला चल पड़ा। कई लोग तो राय के कार्यकाल में यहां जुड़े और विरोधियों के साथ झांसे में आकर उनके साथ खड़े हो गए। कुछ छात्र भी बहक गये।
एक के बाद एक खबरें विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में लाईं। आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया में विश्वविद्यालय से संबंधित जितनी भी नाकारात्मक खबरें आईं अधिकतर एकपक्षीय थीं। पत्रकारीय सिद्धांतों के अनुसार जब भी किसी पर आरोप लगाया जाता है, आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौलिक अधिकार होता है, लेकिन ऐसी खबरों को विश्वविद्यालय का पक्ष रखे बगैर पाठकों के सामने परोस दिया गया था। सबसे ज्यादा अन्याय आनलाइन मीडिया ने किया। जिनके मन में जो आया, वह बगैर हकीकत जाने लिखता चला गया। हकीकत जानने के लिए किसी ने वर्धा आने तक की जहमत नहीं उठाई। एक बड़े वेबापोर्टल पर भी विश्वविद्यालय की कई नकारात्मक खबरें आईं लेकिन एक मौके पर उस पोर्टल के संचालक वर्धा पहुंचे। हकीकत समझ में आई। तो सुनियोजित तरीके से विश्वविद्यालय को बदनाम करने के लिए भेजी जाने वाली नकारात्मक खबरों को रोक कर पश्चाताप किया।
विश्वविद्यालय की प्रकाशित खबरों से संबंधित लोगों के बारे में जब इधर-उधर से जानकारी जुटाई तो मन में यह बात दृढ़ हो गई कि किसी भी व्यक्ति के परिवेश की यथास्थिति में तनिक भी बदलाव उसके मन में असुरक्षा का बोध जन्म दे देती है। लिहाजा, वह बचाव के लिए हर संभव हथकंड़े अपनाने लगता है। इसी तरह बदनाम कर परेशान करने की एक और घेरेबंदी कहानी पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी की एक पुस्तक में मिलती है। जब उन्हें तिहाड़ जेल का प्रभार मिला और उन्होंने उसमें सुधार करना चाहा तो प्रशासनिक महकमा उनके खिलाफ एकजुट हो गया। लेकिन उनके बुलंद इरादों के आगे किसी की नहीं चली। तिहाड़ में किरण बेदी के सुधार कार्यक्रम से इतिहास बन गये। लेकिन इसका बोध आम लोगों को बाद में हुआ। इसी तरह मीडिया के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंची विश्वविद्यालय से संबंधित गलत खबरों से जनता के मन में बनी गलत अवधारणा अब धीरे-धीरे टूटने लगी है। वर्तमान कुलपति विभूति नारायण राय ने यहां की यथास्थिति में विश्वविद्यालय के अवरुद्ध विकास को गति दे दी है। माहौल बदलने लगा है।
जानें विभूति को : विभूति नारायण राय से कभी मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन उनके रचना संसार से उनके व्यक्तित्व का आभास हो गया। कुछ जानकारी मित्रों ने दी। कुछ लोग बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होते हैं। इसी तरह के व्यक्तित्व की धनी एक शख्सियत है- विभूति नारायण राय। 1974 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस विभूति बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। वे अच्छे और ईमानदार पुलिस अधिकारी के साथ ही साहित्य के अनुरागी भी रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हिन्दी में अफसर लेखन की पिछले दशकों में भरमार रही है। ये लेखक अच्छे पोस्ट पर होने की वजह से अपनी रचनाओं को छापने का खुद खर्च उठाकर भी प्रकाशकों को राजी कर लेते हैं। ये अलग बात है कि ऐसी छपी हुई पुस्तकों का कोई खास वजूद नहीं होता। वरना हिंदी साहित्य में अफसर लेखक माटी के माधव ही न बने रहते। ऐसा नहीं है कि साहित्य में अफसर लेखन को दर्जा नहीं मिला। अशोक वाजपेयी और श्रीलाल शुक्ल जैसे हिंदी के जाने-माने लेखक भी उच्च पदस्थ अधिकारी रहे हैं, मगर ये साहित्यिक समाज में अपने स्तरीय लेखन की वजह से सम्मानित हैं।
विभूति नारायण की रचनाओं को पढ़कर सहज ही लग जाता है कि उनके जीवन का साहित्यिक पहलू बाकी चीजों से सर्वथा भिन्न है। उनके लेखन का दायरा बहुआयामी है। साहित्य के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण उनका शोध प्रबंध है, जो साम्प्रदायिक दंगे तथा भारतीय पुलिस नाम से प्रकाशित है। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद विभूति ने इस शोध प्रबंध में दंगों के समय पुलिस की भूमिका को ही कठघरे में खड़ा किया। ये शोध प्रबंध विभूति की निष्पक्ष सोच और लेखन के प्रति निर्भयता का सटीक उदाहरण है। मजेदार बात ये है कि विभूति ने ये शोध पुलिस फेलोशिप प्रोग्राम के तहत किया था। साम्प्रदायिकता के मसले पर विभूति का उपन्यास शहर में कर्फ्यू काफी चर्चित रहा है। इसमें विभूति ने सांप्रदायिक दंगों में फंसे एक परिवार के हालत का बड़ा ही मार्मिक ढंग से चित्रण किया है।
आजमगढ़ के जोकहारा गांव में जन्मे विभूति ने कहानी, व्यंग्य और उपन्यास लिखे हैं। उनकी रचनाओं के पात्र ऐसे आम आदमी है, जिन्हें हम अपने आसपास महसूस कर सकते हैं। रचना के विषय भी ठहराव वाले न होकर प्रवाहमान हैं। उदाहरण के लिए घर नामक उपन्यास में अगर विभूति रामानुज लाल के गरीब परिवार की समस्याओं पर विमर्श प्रस्तुत करते हैं, तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कठघरे में खड़ी नजर आती है। उपन्यास सीधे-सीधे ये सवाल खड़ा करता है कि आजादी के इतने साल बाद भी क्यों नहीं लोगों को पेटभर कर भोजन मिल रहा है। भूखे आदमी के लिए तमाम लोकतांत्रिक अधिकार बेमानी हो जाते हैं, दूसरी तरफ तबादला उपन्यास में विभूति देश में तेजी से फल-फूल रहे तबादला उद्योग पर चोट करते हैं। इसके अलावा विभूति ने एक छात्रनेता का रोजनामचा नाम से एक व्यंग्य संग्रह भी लिखा है। किस्सा लोकतंत का और प्रेम की भूत कथा विभूति की दो चर्चित कृतियां हैं।
मौजूदा समय में विभूति वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में कुलपति के तौर पर अपनी सेवा से हिंदी के समृद्धि की राह मजबूत कर रहे हैं। वर्धा में आने के बाद उन्होंने हबीब तनवीर जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी को विश्वविद्यालय की फैकल्टी बनाया। यही नहीं वे हिंदी की कई जानीमानी हस्तियों और संबंधित पाठ्यक्रमों के विशेषज्ञों को विश्वविद्यालय से किसी न किसी रूप में जोड़ कर विद्यार्थियों का भविष्य को संवार रहे हैं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि विभूति ने अपने गांव में रामानंद सरस्वती नाम से एक पुस्तकालय की स्थापना की है। इसे स्थापित करने के पीछे उनका उद्देश्य लोगों को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना है। मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि 1993 में स्थापित यह पुस्तकालय सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। पुलिस सेवा के बाद यह विश्वविद्यालय विभूति की एक ऐसी कर्मस्थली बनने जा रही है, जहां उनकी कामयाबी में आने वाली रूकावटें स्वत: एक-एक कर समाप्त होती नजर आ रही हैं।
लेखक संजय स्वदेश महाराष्ट्र के पत्रकार हैं. भास्कर समेत कई बड़े संस्थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.






