नई दि्ल्ली : विश्व हिंदी दिवस और अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के उदघाटन के अवसर पर देश–विदेश के वक्ताओं ने कहा कि वैश्वीकरण के इस युग में हिंदी का वैश्विक प्रसार तेजी से हो रहा है। कार्यक्रम में भारतीय सांस्कृतिक परिषद के महानिदेशकश्री सुरेश गोयल, फिजी के भारत में राजदूत श्री योगेश कर्ण, बुल्गारिया के भारत में राजदूत श्री बोरिस्लाव कीरिलोव कोस्तोव, डॉ. वेद प्रताप वैदिक, अशोक चक्रधर, डॉ. रत्नाकर पांडेय, केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, गृह मंत्रालय के निदेशक डॉ. एस.एन.सिंह, सेल के निदेशक (कार्मिक) बंश बहादुर सिंह, अक्षरम के अध्यक्ष अनिल जोशी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध लेखिका अलका सिन्हा ने किया।
कार्यक्रम में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष श्री सुरेश गोयल ने कहा कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1976 को आयोजित किया गया था उसी स्मृति में विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। उन्हें आयोजकों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि लगातार 10 वर्ष उत्सवों का आयोजन कर आयोजकों ने हिंदी के प्रति निष्ठा और संकल्प शक्ति का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक परिषद ऐसे कार्यक्रमों को निरंतर सहयोग देती रहेगी। फिजी के राजदूत श्री योगेश कर्ण ने कहा कि फिजी में हिंदी के लिए सद्भावपूर्ण वातावरण है। उन्होंने कहा कि भारत में जब आपसी व्यवहार में केवल अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है तो उन्हें कष्ट होता है। रूस के मदनलाल मधु ने कहा भारत में दिए तले अंधेरा है और अंग्रेजी का हर स्थान पर प्रयोग किया जाता है। अमरीका से आईडॉ. अनिता कपूर ने अमेरिका में हिंदी की स्थिति के बारे में जानकारी दी।
डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि चीनी भाषा को दुनिया की सबसे ज्यादा बोले जानी वाली भाषा मानना गलत है क्योंकि चीनी भाषा के कई रूपप्रचलित हैं। उन्होंने भाषा आंदोलन कमज़ोर प़ड़ने पर दुख प्रकट किया और कहा कि हिंदी को वैश्विक रूप से स्थापित करने के प्रयासों में अनिल जोशी का योगदान महत्वपूर्ण है। अशोक चक्रधर ने कहा कि हिंदी के भविष्य को लेकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है । उन्होने भाषा के तकनीकी और प्रोद्योगकीय पक्षों पर ध्यान देने कीआवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आकाश कंप्यूटर में हिंदी उपलब्ध ना होने पर चिंता प्रकट की।
केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. एस.एऩ.सिंह ने अपने सारगर्भित बीज वक्तव्य में हिंदी के विभिन्न स्वरूपों जैसे कलकतिया हिंदी, बंबइया हिंदी की बात करते हुए इसे हिंदी की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी के पास विश्व को देने के लिए मूल्यबोधों से भरी संस्कृति है। अनिल जोशी ने कहा कि भाषाओं को केवल व्यवसाय के संदर्भ में सोचा जा रहा है । सामाजिक जीवन मूल्यों और जीवन दृष्टि को देखते हुए हिंदी का विश्व के भाषाओं के मानचित्र में बहुत महत्व है। डॉ. रत्नाकर पांडेय ने कहा कि इस बात की बहुत आवश्यकता है कि गैर- सरकारी संस्थाएं इन प्रयासों में आगे बढ़ चढ़ कर भाग लें । उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग के सामने चले आंदोलन की चर्चा करते हुए स्वगीर्य राजकरण सिंह का विशेष उल्लेख किया और बताया कि किस प्रकार पुष्पेन्द्र चौहान, राजकरण सिंह और अऩिल जोशी ने उस आंदोलन को सफलतापूर्वक चलाया था। सेल के निदेशक (कार्मिक) ने हिंदी की वैश्विकता का विवरण दिया और दिल्ली में हिंदी के प्रचार – प्रसार में सेल के योगदान का उल्लेख किया। कार्यक्रम में ब्रिटेन, इटली, अमरीका, कनाडा, बुल्गारिया आदि देशों के विद्वान उपस्थित थे। कार्यक्रम का सुरूचिपूर्ण संचालन अलका सिन्हा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन नारायण कुमार जी द्वारा किया गया।
हिंदी उत्सव के अगले दो दिन के कार्यक्रम हंसराज कालेज में होंगे जिनमें विदेशों में हिंदी, हिंदी और रोजगार, प्रवासी साहित्य – दृष्टि और दिशा, राजभाषा – स्थिति और संभावनाएं हैं। एक विशेष आकर्षण 11 जनवरी की शाम का होने वाला नाटक आवारा मसीहा है। यह शरत चन्द्र की जीवनी पर आधारित है और इसका निर्देशन रामजी बाली कर रहे हैं।
प्रेस विज्ञप्ति





